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हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर फिल्ममेकर संजय गुप्ता का शुक्रवार रात 59 साल की उम्र में निधन हो गया. बताया जा रहा है कि वह शुक्रवार रात में अपने घर के बाथरूम में गिर गए थे, जिससे उनके सिर पर गंभीर चोट लगी. संजय गुप्ता ने अपने करियर में एक से बढ़कर एक फिल्में दी है. संजय गुप्ता ने साल 1994 में फिल्म 'आतिश: फील द फायर' से संजय दत्त के साथ बतौर डायरेक्टर अपने करियर की शुरुआत की थी. जिसके बाद दोनों ने 'कांटे', 'मुसाफिर', 'जिंदा' और 'शूटआउट एट लोखंडवाला' जैसी कई फिल्मों में एक साथ काम किया.
'शूटआउट एट लोखंडवाला' को गुप्ता ने प्रोड्यूस भी किया था और इसके सह-लेखक भी थे . साल 1991 के लोखंडवाला कॉम्प्लेक्स शूटआउट की घटना पर आधारित थी. इसके बाद उन्होंने 'शूटआउट एट वडाला' (2013) का निर्देशन किया, जो असल जिंदगी की घटनाओं से प्रेरित एक और क्राइम ड्रामा थी.
संजय गुप्ता उन निर्देशकों में से एक थे, जिन्होंने कोरियाई फिल्मों से इंस्पिरेशन लेकर अपनी अलग पहचान बनाई. हालांकि, पिछले कुछ सालों में उनके काम की क्वालिटी काफी गिर गई थी. फिर भी वे चर्चा में बने रहे, सिर्फ इसलिए क्योंकि उनमें सवाल उठाने की हिम्मत थी. 2002 में जब 'कांटे' रिलीज हुई, तो वह एक बड़ी हिट साबित हुई. फिल्म में अमिताभ बच्चन के नेतृत्व में बॉलीवुड सितारों का 'स्लो-मोशन' में चलना, जिसमें उनके साथ संजय दत्त, सुनील शेट्टी और अन्य कलाकार शामिल थे. एक यादगार पल बन गया. इससे पहले तक यह अंदाज अजय देवगन की पहचान माना जाता था. लेकिन 'कांटे' के बाद यह एक ऐसा स्टाइल बन गया जिसे अपनाना किसी भी 'असली विलेन' के लिए अपनी धाक जमाने की कसौटी बन गया.
ऐसा नहीं है कि उनसे पहले के निर्देशकों ने क्राइम थ्रिलर नहीं बनाई थीं, लेकिन गुप्ता की एक खास तरह की खुरदरी और मैली-सी शैली, उनका ग्रे-हरा रंग-रूप और उसमें शामिल किरदारों की एक-दूसरे को मारने-काटने वाली तेज-तर्रार हरकतें जिन पर क्वेंटिन टारनटिनो और दक्षिण कोरियाई सिनेमा का गहरा असर था. इन सब को मिलाकर उनकी अपनी एक अलग पहचान बन गईं.
बता दें कि संजय गुप्ता ने साल 1994 में फिल्म 'आतिश: फील द फायर' से बतौर डायरेक्टर अपने करियर की शुरुआत की थी. इस फिल्म में संजय दत्त और आदित्य पंचोली मुख्य भूमिकाओं में थे. इसके बाद उन्होंने 'राम शास्त्र', 'हमेशा', 'जंग' और 'खौफ' जैसी फिल्मों का निर्देशन किया.
साल 2002 में आई उनकी फिल्म 'कांटे' उनके करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक रही. इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, संजय दत्त और सुनील शेट्टी समेत कई कलाकार नजर आए थे. उन्होंने अपने करियर में संजय दत्त के साथ कई फिल्मों में काम किया. दोनों की जोड़ी 'मुसाफिर', 'जिंदा' और 'शूटआउट एट लोखंडवाला' जैसी फिल्मों के लिए जानी जाती है.
उन्होंने 'काबिल' और 'मुंबई सागा' जैसी फिल्मों का निर्देशन किया. डायरेक्शन के अलावा संजय गुप्ता ने प्रोड्यूसर और स्क्रीनराइटर के तौर पर भी काम किया. उन्होंने 'दस कहानियां', 'प्लान', 'वुडस्टॉक विला', 'एसिड फैक्ट्री' और 'पंख' जैसी फिल्मों को प्रोड्यूस किया था. उनके आखिरी कामों में 'द मिरांडा ब्रदर्स' शामिल है, जो 2025 में रिलीज हुई थी. इस फिल्म में हर्षवर्धन राणे और मीजान जाफरी नजर आए थे.
कई दशकों के अपने करियर में गुप्ता ने हिंदी सिनेमा में एक खास जगह बनाई. उन्होंने शानदार एक्शन सीन क्राइम ड्रामा और मुंबई के अंडरवर्ल्ड पर आधारित कहानियों के जरिए अपनी पहचान कायम की. इस बेहतरीन फिल्म निर्माता को याद करते हुए आइए उनके कुछ बेहतरीन कामों पर एक नजर डालते हैं.
कांटे (2002)
अमिताभ बच्चन, संजय दत्त, सुनील शेट्टी और महेश मांजरेकर स्टारर फिल्म 'कांटे' में छह लोगों की कहानी दिखाई गई है, जो लॉस एंजिल्स में बैंक लूटने की प्लानिंग बनाते हैं. यह फिल्म अपनी बेहतरीन स्टार कास्ट, शानदार एक्शन और एक गंभीर व डार्क माहौल के लिए जानी जाती है. हिंदी क्राइम थ्रिलर पसंद करने वालों के बीच इस फिल्म को एक खास मुकाम (कल्ट स्टेटस) हासिल है.
शूटआउट एट लोखंडवाला (2007)
मुंबई के लोखंडवाला कॉम्प्लेक्स में 1991 में हुई गोलीबारी (शूटआउट) पर आधारित इसकी कहानी गैंगस्टरों के एक समूह के खिलाफ पुलिस ऑपरेशन के इर्द-गिर्द घूमती है. विवेक ओबेरॉय, संजय दत्त और अमिताभ बच्चन स्टारर इस फिल्म में जबरदस्त एक्शन के साथ-साथ वास्तविक घटनाओं से प्रेरित कहानी को दिखाया गया है. मुंबई के अंडरवर्ल्ड को जिस तरह से इसमें पेश किया गया है, वह गुप्ता की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक मानी जाती है.
काबिल (2017)
ऋतिक रोशन और यामी गौतम स्टारर 'काबिल' एक अलग तरह की बदला लेने की कहानी थी. इसमें ऋतिक रोशन ने एक नेत्रहीन व्यक्ति का किरदार निभाया है, जो अपनी पत्नी की मौत का बदला लेने निकलता है.
शूटआउट एट वडाला (2013)
जॉन अब्राहम, अनिल कपूर और मनोज बाजपेयी अभिनीत यह क्राइम ड्रामा गैंगस्टर मान्या सुर्वे के उभार और मुंबई पुलिस के साथ उसके टकराव को दिखाता है. असल जिंदगी की घटनाओं से प्रेरित इस फिल्म में गुप्ता के काम की खासियत स्टाइलिश हिंसा और दमदार कहानी कहने का अंदाज देखने को मिलता है.
जिंदा (2006)
संजय दत्त, जॉन अब्राहम और लारा दत्ता स्टारर 'जिंदा' एक ऐसे आदमी की कहानी है जिसे अगवा कर लिया जाता है और 14 सालों तक कैद में रखा जाता है. इसके बाद उसे आज़ाद कर दिया जाता है, ताकि वह अपने सवालों के जवाब ढूंढ सके और बदला ले सके.
-खास विजुअल स्टाइल और कलर पैलेट: उनकी फिल्मों में अक्सर एक खास 'सेपिया' (भूरा-पीला) या 'ग्रंजी ग्रीन' (धुंधला हरा) टोन वाला फिल्टर इस्तेमाल होता है, जो दृश्यों को एक गहरा, खुरदरा और प्रभावशाली माहौल देता है.
-क्राइम, अंडरवर्ल्ड और गैंगस्टर ड्रामा: उनकी ज्यादातर फिल्में जैसे 'कांटे', 'शूटआउट एट वडाला', 'शूटआउट एट लोखंडवाला' और 'मुंबई सागा' मुंबई के अंडरवर्ल्ड, पुलिस एनकाउंटर और सत्ता के संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती हैं.
-अंतरराष्ट्रीय और हॉलीवुड थ्रिलर : वे विदेशी और हॉलीवुड की क्राइम/एक्शन फिल्मों को अपने अंदाज में ढालने या उनसे काफी प्रेरणा लेने के लिए जाने जाते हैं.
-नैतिक रूप से जटिल और बागी किरदार: उनकी फिल्मों के मुख्य पात्र अक्सर 'एंटी-हीरो' या विजिलेंटे होते हैं. ये ऐसे लोग होते हैं जो गहरे दुख, धोखे, वफादारी या अपने तरीके से न्याय पाने की चाहत से प्रेरित होते हैं.
-बड़ी स्टार कास्ट और बार-बार साथ काम करना: वे अक्सर कुछ खास बड़े अभिनेताओं और सितारों के साथ काम करते हैं, जिनमें संजय दत्त और जॉन अब्राहम प्रमुख हैं.
-जोरदार संवाद और दमदार एक्शन: उनकी फिल्मों के दृश्यों में तीखी बहस, नाटकीय अंदाज में बोले गए संवाद और बड़े पैमाने पर फिल्माए गए एक्शन सीक्वेंस देखने को मिलते हैं.
-बेहतरीन एडिटिंग और स्टाइलिश संगीत: तनावपूर्ण या गंभीर माहौल होने के बावजूद उनकी फिल्मों में एक आकर्षक, म्यूजिक-वीडियो जैसी शैली होती है, जिसमें तेज कट और एक स्टाइलिश गति (पेसिंग) देखने को मिलती है.
गुप्ता की अहमियत न केवल उनके द्वारा चुने गए विषयों में है, बल्कि उन्हें पेश करने के उनके अंदाज में भी है. उनकी फिल्मों में तीखे टकराव, खास तरह के एक्शन, शहरी माहौल और भारी दबाव में काम करने वाले किरदार देखने को मिलते थे. इस सोच ने उनके काम को एक अलग पहचान दी. खासकर उस दौर में जब हिंदी सिनेमा पारंपरिक 'स्टार-केंद्रित' कहानियों और नए तरह की जॉनर-आधारित फिल्मों के बीच संतुलन बना रहा था. उनके सिनेमा ने मुंबई पर आधारित क्राइम कहानियों की लगातार बनी लोकप्रियता में भी योगदान दिया.
हिंसा, सत्ता और महत्वाकांक्षा जैसी वास्तविक दुनिया की चिंताओं को आम दर्शकों के लिए सुलभ 'मेनस्ट्रीम' ड्रामा में बदलकर गुप्ता ने कमर्शियल हिंदी सिनेमा में 'क्राइम थ्रिलर' को बनाए रखने में मदद की. उनकी कहानियों का इमोशनल और नाटकीय असर अक्सर सीधा होता था, जबकि उन्हें पेश करने का उनका अंदाज एकदम अनोखा और उनका अपना होता था.