कभी हमारे सिनेमा में ये पक्का माना जाता था कि अगर किसी फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर टिकना है, तो पोस्टर पर किसी बड़े मेल एक्टर का चेहरा होना ही चाहिए. एक दौर ऐसा भी रहा जब फिल्मों में फीमेल स्टार्स के रोल सिर्फ कहानी को रंग भरने, गाना गाने या हीरो के दर्द में आंसू बहाने तक सिमट कर रह जाते थे. पर्दे पर उनके होने का मतलब सिर्फ हीरो के सफर को आसान या रोमांटिक बनाना होता था, लेकिन बदल समय के साथ ये पुरानी सोच भी बहुत तेजी से बदल चुकी है.
आज कहानी बिल्कुल अलग है और इसकी शुरुआत ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ जैसी ब्लॉकबस्टर से साफ नजर आई, जिसने दिखाया कि एक अकेली महिला भी पूरे सिस्टम और समाज को अपनी शर्तों पर झुका सकती है. इसी सिलसिले को अब ‘अक्का’ और ‘ईठा’ जैसी नई कहानियां आगे बढ़ा रही हैं. कीर्ति सुरेश, राधिका आप्टे और श्रद्धा कपूर जैसी बड़ी एक्ट्रेसेस अब सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे खुद पूरी कहानी की नींव और उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आ रही हैं.

हिंदी फिल्मों का पुराना इतिहास उठाकर देखें तो ज्यादातर फिल्मों में एक्ट्रेस का रोल सिर्फ रोमांस और लव अफेयर्स तक ही हुआ करते थे. उनकी अपनी कोई पर्सनल दुनिया, बड़ी सोच या इंडिपेंडेंट आइडेंटिटी कहानी में जगह नहीं बना पाती थी. दशकों तक ऑडियंस ने पर्दे पर फीमेस स्टार्स को बस एक रोमांटिक रोल में ही देखा है, लेकिन बदलते जमाने के साथ लोगों की पसंद बदली और समाज में भी औरतों की भूमिका को लेकर नजरिया काफी हद तक बदलने लगा है.
जब समाज की सोच में खुलापन आया, तो उसका सीधा असर सिनेमा के राइटर्स और डायरेक्टर्स पर भी पड़ा. फिल्ममेकर्स की नई जमात ने ये समझा कि आज की औरत किसी की परछाई बनकर खुश नहीं रह सकती. उन्होंने ऐसे किरदार लिखने शुरू किए, जो असल जिंदगी की तरह जटिल, बेहद मजबूत और सीधे दिल को छूने वाले थे. अब फीमेल रोल किसी इमोशनल सहारे के बजाय पूरी स्क्रीनप्ले को खुद अपनी सोच और ताकत से आगे ले जाने वाली सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं.
आज की समझदार ऑडियंस अब सिर्फ घिसे-पिटे फैमिली ड्रामे या लाचार दिखने वाले किरदार देखने के मूड में बिल्कुल नहीं है. लोग ऐसी कहानियां देखना पसंद कर रहे हैं, जहां महिलाएं बड़े फैसले लेती हैं, अपने हक के लिए लड़ती हैं और खुद सत्ता को संभालती हैं. यही वजह है कि आज की फीमेल स्टार्स सिर्फ पर्दे पर सुंदर दिखने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी फिल्म को अपने दम पर बॉक्स ऑफिस और लोगों के दिलों में चलाने का दम रखती हैं, जो अब देखने को भी मिल रहा है.
2022 में रिलीज हुई आलिया भट्ट की फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ ने फीमेल-लीड सिनेमा को एक नई ऊंचाई और पहचान देने में सबसे बड़ा किरदार निभाया है. इस फिल्म में गंगूबाई सिर्फ अपनी पर्सनल लाइफ की मुश्किलों से ही नहीं लड़ी, बल्कि अपने पूरे समुदाय के अधिकारों के लिए सीधे दिल्ली के तख्त तक पहुंच जाती है. पर्दे पर दिखे इस फीयरलेस रोल ने पूरी दुनिया को ये दिखा दिया कि अगर कहानी और एक्टिंग में दम हो, तो एक महिला की गाथा भी सिनेमाघरों में भारी भीड़ जुटा सकती है.
इस ब्लॉकबस्टर फिल्म की सबसे खास बात ये रही कि पूरी कहानी में फीमेल किरदार को किसी भी मेल किरदार के सहारे खड़ा नहीं दिखाया गया. गंगूबाई की अपनी जंग थी, अपनी जिद थी और उसकी जीत भी पूरी तरह उसकी अपनी मेहनत का नतीजा थी. किसी भी मोड़ पर वे किसी हीरो की मदद की मोहताज नहीं दिखी. यही वजह रही कि आम जनता से लेकर बड़े-बड़े फिल्म क्रिटिक्स ने इस कहानी और इसके बेबाक अंदाज की खुले दिल से जमकर तारीफ की, जो ऑडियंस को भी खूब पसंद आया.
गंगूबाई की इस शानदार कामयाबी के बाद फिल्म इंडस्ट्री के बड़े-बड़े डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स का नजरिया पूरी तरह से बदल गया. बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों ने ये बात साबित कर दी कि फीमेल लीड मूवीज सिर्फ नाम के लिए नहीं बनतीं, बल्कि वे बहुत बड़ा मुनाफा भी कमा सकती हैं. इस फिल्म ने वो दरवाजा खोल दिया, जहां से आगे चलकर दूसरी फीमेल लीड कहानियों को बड़े बजट और पूरे सम्मान के साथ बनने का हौसला मिला, जो अब काफी हद तक देखने को भी मिल रहा है और हो रहा है.

आने वाले प्रोजेक्ट्स में ‘अक्का’ को लेकर लोगों के बीच काफी ज्यादा बज और एक्साइटमेंट देखने को मिल रही है, क्योंकि इसका पूरा ताना-बाना महिलाओं पर आधारित है. हाल ही में इसका टीजर भी जारी किया गया है, जिसको काफी पसंद किया जा रहा है. इस सीरीज में कीर्ति सुरेश और राधिका आप्टे जैसी मंझी हुई एक्ट्रेसेस आमने-सामने नजर आने वाली हैं.
इस सीरीज में सत्ता, इलाके पर अपना हक और अपने वजूद को बचाने की एक बेहद दिलचस्प और रोंगटे खड़े कर देने वाली जंग दिखाई देगी. इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खूबी ये है कि इसमें औरतें किसी जुल्म का शिकार होकर रोने वाली नहीं हैं, बल्कि वे खुद सत्ता की कुर्सी पर बैठी नजर आती हैं. हमारे देश के सिनेमा में बहुत लंबे समय से डॉन, बाहुबली और सियासत के दांव-पेच सिर्फ मर्दों के इर्द-गिर्द बुने जाते रहे हैं.
ऐसे में जब दो औरतें सत्ता की उस गद्दी पर बैठकर पूरे खेल को अपने इशारों पर नचाएंगी, तो ये बदलाव वाकई देखने लायक होगा. ‘अक्का’ आज की महिलाओं की कगानी दिखाई गई है, जहां वे अत्याचार झेलती नहीं, बल्कि ताकत के दम पर सत्ता को कंट्रोल करने की हिम्मत रखती है.
‘अक्का’ के अलावा श्रद्धा कपूर की आने वाली फिल्म ‘ईठा’ को लेकर भी सोशल मीडिया पर फैंस के बीच जबरदस्त बज देखने को मिल रहा है. इस फिल्म की कहानी भी इस बात का पक्का सबूत हैं कि फीमेल लीड सिनेमा का दायरा अब बहुत तेजी से फैलता जा रहा है. अब फिल्म बनाने वाले ऐसी कहानियां चुन रहे हैं, जिनमें औरतें सिर्फ घर-परिवार की परेशानियों में नहीं उलझी हैं, बल्कि वे समाज, राजनीति और कानूनी पेंचों से भी दो-दो हाथ करती दिख रही हैं.
आज के दौर में ये समझना जरूरी है कि महिलाएं हर फील्ड में अपनी मजबूत पकड़ बना चुकी हैं. इस तरह के बड़े प्रोजेक्ट्स के जरिए आज की नई पीढ़ी की एक्ट्रेसेस को अपनी अदाकारी का सबसे बेहतरीन रूप दिखाने का पूरा मौका मिल रहा है. वे पुराने ढर्रे वाले रोल्स से बाहर निकलकर ऐसे किरदार चुन रही हैं, जिनमें खतरा उठाने, बड़े फैसले लेने और वक्त आने पर पूरी बाजी पलट देने का हौसला होता है. इस तरह की कहानियां लोगों को खींच लेती हैं.
जब पर्दे पर श्रद्धा कपूर जैसी एक्ट्रेस आती हैं, तो वे अपनी इमेज से परे जाकर एक मजबूत छाप छोड़ते हैं. यही वजह है कि आज फीमेल लीड प्रोजेक्ट्स सिर्फ किसी एक दिन का फैशन नहीं रह गए हैं, बल्कि ये पूरी इंडस्ट्री का एक बड़ा मूवमेंट बन चुके हैं. जब भी कोई नया प्रोजेक्ट आता है, तो लोग उसे पूरे मन से अपनाते हैं. मेकर्स तो भी अब समझ आ चुका है कि जनता को अब बिना किसी बनावट के सिर्फ रियल, डेरिंग और मजबूत इंसानी कहानियां ही पर्दे पर देखनी हैं.

पिछले कुछ सालों की सिनेमैटिक जर्नी पर नजर डालें तो एक बात आईने की तरह साफ हो चुकी है कि औरतों की जगह पूरी तरह बदल चुकी है. अब वे किसी की कहानी में सिर्फ रंग भरने नहीं आतीं, बल्कि वही पूरी कहानी की असली मालिक और उसको रास्ता दिखाने वाली ताकत बन चुकी हैं. उनकी अपनी चाहतें, उनके अपने बड़े सपने और उनके फैसले अब सिनेमा के बीचों-बीच पूरी शान के साथ चमक रहे हैं.
फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ ने इस नए दौर की जो पक्की नींव रखी थी, आज ‘अक्का’ और ‘ईठा’ जैसी नई कहानियां उसी रास्ते को और भी बड़ा और चमकदार बना रही हैं. इन सभी नई कहानियों में फीमेल किरदार किसी की मददगार बनकर पीछे नहीं खड़ी हैं, बल्कि वे खुद बदलाव का चेहरा बनी हुई हैं. वे अपनी जिंदगी की कमान किसी और के हाथ में देने के बजाय खुद अपने रास्ते तय कर रही हैं.
अब ये बिना किसी झिझक के कहा जा सकता है कि हमारे हिंदी सिनेमा में अब सिर्फ सिंपल हीरोइनों का वक्त नहीं रहा, बल्कि ये दौर पूरी तरह से ‘फीमेल पावर सेंटर’ बन चुका है, जिस हिम्मत और हौसले की शुरुआत संजय लीला भंसाली की गंगूबाई ने की थी, वो आग अब हर नई कहानी के साथ और भी ज्यादा तेजी से फैल रही है, जिसे रोकना अब किसी के बस की बात नहीं है.
सिनेमाघरों के टिकट काउंटर्स के साथ-साथ अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने भी इस बदलाव को बहुत ज्यादा रफ्तार देने का काम किया है. डिजिटल दुनिया के आने से ऐसी कहानियों को देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में बहुत बड़ा और समझदार ऑडियंस आसानी से मिल गया है. आज किसी भी नई सीरीज या फिल्म की जीत किसी बड़े स्टार के नाम पर नहीं, बल्कि उसके अंदर मौजूद दम और सच्चाई पर टिकी होती है.
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की सबसे अच्छी बात ये रही कि इसने राइटर्स और डायरेक्टर्स को खुलकर नए एक्सपेरिमेंट करने की पूरी आजादी दे दी. अब उन्हें दो घंटे में कहानी समेटने की मजबूरी नहीं होती, जिसका सबसे ज्यादा फायदा फीमेल किरदारों को गहराई से तराशने में मिला है. अब उनके दर्द, उनकी एम्बिशन, उनके गुस्से और उनकी जीत को कई एपिसोड्स में बहुत बारीकी और सुकून के साथ परदे पर दिखाया जा रहा है.
ऑडियंस ने भी बार-बार ये साबित कर दिया है कि अगर कंटेंट बढ़िया हो, तो वे हर उस कहानी का दिल खोलकर स्वागत करेंगे, जो ईमानदारी से कही गई हो. यही वजह है कि आज डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर फीमेल लीड मूवीज और वेब सीरीज की लाइन लगी हुई है. लोग इन्हें सिर्फ देख ही नहीं रहे हैं, बल्कि सोशल मीडिया पर इन किरदारों की जमकर चर्चा भी कर रहे हैं.