अक्षय कुमार ने बदले किरदार और फिल्में, लेकिन नहीं बदला ये फॉर्मूला; 35 साल के करियर में बार-बार दिखा एक पैटर्न
अक्षय कुमार के 35 साल से ज्यादा लंबे करियर में फिल्मों और किरदारों के जॉनर लगातार बदलते रहे, लेकिन एक पैटर्न कायम रहा. उनकी कई फिल्मों में कोई बड़ी समस्या और उससे जूझता नायक नजर आया. एक्शन से सोशल इश्यू तक यही संघर्ष उनकी स्क्रीन पहचान बनता गया.
बॉलीवुड के खिलाड़ी कुमार यानी अक्षय कुमार ने अपने तीन दशक से ज्यादा लंबे करियर में एक्शन, रोमांस, कॉमेडी, देशभक्ति, सामाजिक मुद्दों और ऐतिहासिक फिल्में दी है. एक्टर ने टाइम से साथ उनकी फिल्मों का जॉनर बदला, उनकी स्क्रीन इमेज में कई बदलाव आए और दर्शकों की पसंद के हिसाब से उन्होंने खुद को भी ढाला. वैसे अगर अक्षय के पूरे करियर पर गौर करें तो उनके इन बदलावों के बीच उनकी फिल्मों में एक पैटर्न लगातार बनता नजर आता है. उनकी फिल्मों की कहानियों में अक्सर कोई बड़ी समस्या होती है, जिसके सामने उनका किरदार खड़ा होता है. जो किसी न किसी तरीके से उस मुश्किल का रास्ता निकालने की कोशिश करता है. इसके अलावा कभी अपराध और खतरे से लड़ता है, तो कभी किसी उलझी हुई परिस्थिति में फंसता है, तो कभी देश, समाज या आम लोगों से जुड़ी किसी बड़ी समस्या का समाधान तलाशता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यही अक्षय कुमार के लंबे करियर का असली स्क्रीन फॉर्मूला है?
अक्षय कुमार का जन्म 9 सितंबर 1967 को हुआ था और उनका बचपन दिल्ली के चांदनी चौक इलाके में बीता. उनका असली नाम राजीव हरिओम भाटिया है. उनके पिता सेना में थे और बचपन से ही अक्षय को खेल-कूद और कुश्ती में दिलचस्पी थी. उन्होंने मुंबई के खालसा कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन पढ़ाई बीच में छोड़ दी. इसके बाद उन्होंने मार्शल आर्ट सीखने का फैसला किया और पिता की मदद से बैंकॉक चले गए. बैंकॉक में अक्षय ने मार्शल आर्ट सीखा. साथ ही, उन्होंने अपना खर्च चलाने के लिए एक रेस्टोरेंट में वेटर और कुक के तौर पर काम किया. दिन में काम और खाली समय में मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग उनका रोज का जीवन बन गया था. अक्षय कई इंटरव्यू में बता चुके हैं कि उनके पिता ने उन्हें बैंकॉक भेजने के लिए पैसे जुटाए थे और इस सफर ने उनकी जिंदगी को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई. भारत लौटने के बाद भी अक्षय ने तुरंत ही बॉलीवुड में एंट्री नहीं ली.
उन्होंने कुछ टाइम के लिए दिल्ली में आर्टिफिशियल ज्वेलरी बेचने का भी काम किया. फिर मुंबई लौटकर वह मार्शल आर्ट सिखाने लगे. इसी दौरान उनके एक स्टूडेंट के पिता ने उन्हें मॉडलिंग करने की सलाह दी. अक्षय ने उनकी बात मानी और एक फर्नीचर स्टोर के लिए मॉडलिंग की. उन्होंने बताया कि उस एक काम के लिए उन्हें 21 हजार रुपए मिले, जबकि वह पूरे महीने मार्शल आर्ट सिखाकर करीब 5 हजार रुपए कमाते थे. यहीं से उन्हें लगा कि मॉडलिंग के रास्ते से वह आगे बढ़ सकते हैं.
एक्टिंग में हाथ आजमाने से पहले अक्षय ने फोटोग्राफर जयेश सेठ के साथ लाइट असिस्टेंट के तौर पर भी काम किया. इस दौरान उन्हें गोविंदा, रेखा, जैकी श्रॉफ और संगीता बिजलानी जैसे बड़े सितारों के फोटोशूट देखने का मौका मिला. अक्षय ने अनुपम खेर के शो में बताया था कि गोविंदा ने एक दिन उन्हें देखकर पूछा था कि वह खुद हीरो क्यों नहीं बनते. इसके बाद अक्षय ने फिल्मों की तरफ कदम बढ़ाया और 1987 की फिल्म 'आज' में छोटे रोल से उनकी स्क्रीन पर शुरुआत हुई.
अक्षय कुमार का 35 साल का सफर
अक्षय कुमार ने हिंदी सिनेमा में कदम ऐसे दौर में रखा, जब पर्दे पर एक्शन हीरो की अपनी अलग पहचान हुआ करती थी. ये उनके लिए काफी फायदेमंद रहा. उन्हें मार्शल आर्ट्स और स्टंट्स में पहले ही दिलचस्पी थी. ऐसे में इस टैलेंट ने एक्टर को शुरुआत से ही दूसरे स्टार्स से अलग बनाया. शुरुआत में उन्होंने खुदको एक्शन स्टार के तौर पर प्रेजेंट किया. लेकिन फिर जैसे-जैसे वक्त बीता उनकी पहचान ऐसे हीरो की बनने लगी, जो पर्दे पर मुश्किल परिस्थितियों से लड़ सकता है. शुरुआती दौर में उनकी फिल्मों में अपराध, बदला, साजिश और खतरे जैसे तत्व प्रमुख रहे. यानी उनके करियर की शुरुआत ही ऐसे किरदारों से हुई, जिनके सामने कोई न कोई चुनौती मौजूद थी. अक्षय ने लंबे समय तक खुद को सिर्फ एक्शन तक सीमित नहीं रखा.
उन्होंने रोमांटिक फिल्मों में काम किया और फिर कॉमेडी में ऐसा प्रयोग किया, जिसने उनकी पूरी स्क्रीन इमेज बदल दी. 'हेरा फेरी' जैसी फिल्मों ने साबित किया कि अक्षय सीरियस एक्शन के अलावा कॉमिक किरदारों में भी दर्शकों को खूब पसंद आ सकते हैं. इसके बाद गरम मसाला, भूल भुलैया और कई दूसरी फिल्मों ने उनकी कॉमिक टाइमिंग और अलग-अलग तरह के किरदार निभाने की क्षमता को मजबूत किया. करियर के आगे बढ़ने के साथ अक्षय ने देशभक्ति और सामाजिक मुद्दों वाली फिल्मों की तरफ भी रुख किया. बेबी, एयरलिफ्ट, हॉलिडे और केसरी जैसी फिल्मों में उनके किरदारों का संघर्ष व्यक्तिगत दायरे से निकलकर देश और लोगों की सुरक्षा तक पहुंचा. वहीं टॉयलेट: एक प्रेम कथा, पैडमैन और OMG 2 जैसी फिल्मों में उन्होंने सामाजिक समस्याओं को कहानी का हिस्सा बनाया.
अक्षय कुमार के बारे में बात करते हुए फिल्म के जानेमाने क्रिटिक्स कोमल नाहटा कहते हैं, 'ये कहना पड़ेगा कि अक्षय ने आपने आप को एक ही मोल्ड में डाल कर नहीं रखा है, जिसकी वजह से वो फिल्मी दुनिया में इनती लॉन्ग इनिंग प्ले कर रहे हैं और अभी चल रहा है. एक्टर ने हमेशा खुद को री-इन्वेंट किया है. ये बहुत मुश्किल हैं. बहुत से एक्टर्स ये नहीं कर पाते हैं.'
'खिलाड़ी' दौर में मुश्किल से भिड़ता हीरो
अक्षय कुमार के करियर के शुरुआती दौर की बात हो तो खिलाड़ी सीरीज का जिक्र सबसे पहले आता है. खिलाड़ी ने अक्षय को एक्शन हीरो के तौर पर पहचान दिलाई और इसके बाद उनकी फिल्मों में खतरा, अपराध, साजिश और मुकाबला जैसे तत्व लगातार दिखाई देने लगे. मोहरा और सबसे बड़ा खिलाड़ी जैसी फिल्मों में भी उनके किरदार ऐसी परिस्थितियों में नजर आए, जहां उनके सामने कोई बड़ी चुनौती थी.
इस दौर में अक्षय के किरदारों की ताकत उनकी फिजिकल और मुश्किल से सीधे भिड़ने की क्षमता थी. कहानी में कोई अपराधी या खतरनाक परिस्थिति सामने आती थी और अक्षय का किरदार उससे मुकाबला करता था. यानी उस समय समस्या का समाधान अक्सर एक्शन के जरिए होता था. यहां से अक्षय की स्क्रीन इमेज की पहली मजबूत परत तैयार हुई. दर्शकों को पर्दे पर ऐसा अभिनेता दिखाई देने लगा, जो मुश्किल हालात में घबराने के बजाय उनका सामना करता है. आगे चलकर यही इमेज उनके अलग-अलग जॉनर वाले किरदारों में भी किसी न किसी रूप में दिखाई देती रही.
कॉमेडी के दौर में भी नहीं बदला संघर्ष वाला फॉर्मूला
अक्षय कुमार के करियर का सबसे दिलचस्प बदलाव उनका कॉमेडी की तरफ जाना रहा. हेरा फेरी ने उन्हें एक ऐसे अभिनेता के तौर पर स्थापित किया, जो बिना एक्शन किए भी दर्शकों को उतना ही प्रभावित कर सकता है. राजू का किरदार किसी ताकतवर या आदर्श हीरो की तरह नहीं था. वह एक आम बेरोजगार युवक था, जिसके सामने पैसे और जिंदगी की परेशानियां थीं. ऐसे में खिलाड़ी में जहां उनका किरदार अपराध और खतरों से लड़ रहा था, वहीं हेरा फेरी में वह रोजमर्रा की परेशानियों और कॉमेडी परिस्थितियों में फंसा हुआ है.
फिर गरम मसाला में भी अक्षय का किरदार झूठ और उलझे रिश्तों के ऐसे जाल में फंसता है, जिससे निकलना लगातार मुश्किल होता जाता है. भूल भुलैया में उनका किरदार मनोवैज्ञानिक रहस्य को समझने और उसके पीछे की सच्चाई तक पहुंचने की कोशिश करता है. यानी कॉमेडी और मनोरंजन का अंदाज बदल गया, लेकिन समस्या और उसे सुलझाने की कोशिश कहानी के केंद्र में बनी रही. इस दौर ने यह भी साबित किया कि अक्षय की स्क्रीन पर्सनैलिटी सिर्फ मारधाड़ पर निर्भर नहीं थी. वह परिस्थितियों के दबाव में फंसे किरदार को भी प्रभावी तरीके से निभा सकते थे. यही वजह है कि उनके लिए संघर्ष का मतलब सिर्फ किसी से लड़ना नहीं रहा. कई बार संघर्ष का मतलब किसी मुश्किल परिस्थिति से निकलना भी हो गया.
एक्टर ये करियर के बारे में बात करते हुए कोमल कहते हैं, 'पहले अक्षय सिर्फ एक्शन रोल करते थे, फिर जब वो कॉमेडी में आए वो दौर बहुत अच्छा था. इसके बाद जब वो देशभक्ति फिल्मों में आए जैसे 'एयरलिफ्ट' और 'रुस्तम', 'केसरी' ये सब फिल्मों का दौर उनके लिए अच्छा था. ये वो दौर था जब उनकी लगभग हर फिल्म हिट हो जाती थी. हालांकि, कोविड के बाद उनका टाइम अच्छा नहीं था. लेकिन जब वो पर्पज वाली फिल्म लेकर आए वो दौर उनके लिए अच्छा था.'
देश और सुरक्षा वाली फिल्मों में अक्षय
अक्षय कुमार के करियर में एक ऐसा दौर भी आया, जब उनकी फिल्मों के संघर्ष का दायरा पर्सनल समस्याओं से निकलकर देश और राष्ट्रीय सुरक्षा तक पहुंच गया. इसमें बेबी, हॉलिडे, एयरलिफ्ट और केसरी जैसी फिल्मों में उनके किरदारों के सामने ऐसी परिस्थितियां थीं, जिनका असर सिर्फ उन पर नहीं बल्कि बड़ी संख्या में लोगों पर पड़ता है. फिल्म 'बेबी' में अक्षय का किरदार आतंकवाद के खिलाफ काम करने वाली टीम का हिस्सा है. फिर 'हॉलिडे' में भी आतंकवादी साजिश के खिलाफ लड़ाई दिखाई गई है. इस तरह अक्षय का एक्शन हीरो वाला पुराना अवतार अब एक बड़ी जिम्मेदारी निभाने वाले किरदार में बदल जाता है.
एयरलिफ्ट में यह बदलाव और साफ दिखाई देता है. रंजीत कात्याल एक कारोबारी है, लेकिन युद्ध जैसे हालात उसे हजारों भारतीयों को सुरक्षित निकालने की जिम्मेदारी के सामने खड़ा कर देते हैं. वह कोई पारंपरिक सैनिक नहीं है, फिर भी परिस्थितियां उसे ऐसा काम करने के लिए मजबूर करती हैं, जिसमें साहस के साथ-साथ सूझबूझ और नेतृत्व की जरूरत है. अक्षय के स्क्रीन फॉर्मूले का अहम बदलाव है. शुरुआती फिल्मों में उनका हीरो खुद को बचाने या दुश्मन को हराने के लिए लड़ता था. इन फिल्मों में वही हीरो दूसरों को बचाने के लिए लड़ता दिखाई देता है. संघर्ष वही है, लेकिन उसके पीछे की जिम्मेदारी बड़ी हो गई है. 'केसरी' में भी अक्षय का किरदार एक कठिन और ऐतिहासिक संघर्ष के बीच खड़ा दिखाई देता है. अक्षय के किरदारों में 'मुश्किल से लड़ने वाला आदमी' अब 'मुश्किल में जिम्मेदारी उठाने वाला आदमी' बन चुका है.
सामाजिक मुद्दों वाली फिल्मों में सिस्टम को चुनौती
अक्षय कुमार के करियर में सामाजिक मुद्दों पर बनी फिल्मों का दौर उनके स्क्रीन फॉर्मूले को एक नया अर्थ देता है. टॉयलेट: एक प्रेम कथा, पैडमैन और OMG 2 जैसी फिल्मों में दुश्मन कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक समस्या, सोच या सामाजिक व्यवस्था है.
टॉयलेट: एक प्रेम कथा में केशव के सामने शौचालय और स्वच्छता से जुड़ी समस्या आती है. शुरुआत में यह उसके अपने वैवाहिक जीवन की परेशानी है, लेकिन धीरे-धीरे यह समस्या समाज के बड़े सवाल में बदल जाती है. फिल्म का नायक किसी अपराधी से नहीं लड़ रहा. वह एक ऐसी व्यवस्था और सोच को बदलने की कोशिश कर रहा है, जिसे लोग लंबे समय से सामान्य मानते आए हैं.
पैडमैन में भी कहानी एक निजी समस्या से शुरू होती है. अपनी पत्नी के लिए सस्ता और सुरक्षित सैनिटरी पैड बनाने की कोशिश करने वाला लक्ष्मीकांत धीरे-धीरे उस सामाजिक झिझक से टकराता है, जिसके कारण माहवारी जैसे विषय पर खुलकर बात नहीं की जाती. यहां संघर्ष शारीरिक नहीं है. उसे लोगों की सोच, शर्म और सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ता है. OMG 2 में शिक्षा और सेक्स एजुकेशन जैसे संवेदनशील मुद्दे के जरिए सामाजिक सोच पर सवाल उठाए जाते हैं. यहां भी कहानी किसी पारंपरिक विलेन की तलाश नहीं करती. टकराव विचारों और व्यवस्था के स्तर पर है.
'पैडमैन' से 'टॉयलेट' तक बदलाव का संदेश
अक्षय कुमार की सामाजिक फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने गंभीर विषयों को सीधे डॉक्यूमेंट्री की तरह पेश करने के बजाय उन्हें मेनस्ट्रीम कहानी के भीतर रखा. टॉयलेट: एक प्रेम कथा में शादी और पति-पत्नी का रिश्ता है. पैडमैन में परिवार और रिश्तों का भावनात्मक पक्ष है. इन कहानियों के बीच सामाजिक समस्या धीरे-धीरे दर्शक के सामने आती है.
इस तरीके का फायदा यह होता है कि दर्शक सिर्फ किसी समस्या के बारे में सुनता नहीं, बल्कि उसे एक किरदार की जिंदगी के जरिए देखता है. टॉयलेट में शौचालय का मुद्दा एक महिला के लिए शादी और सम्मान से जुड़ता है. पैडमैन में सैनिटरी पैड की जरूरत एक पति को अपनी पत्नी की समस्या समझने के लिए मजबूर करती है.
यहां अक्षय का किरदार एक सामान्य व्यक्ति के रूप में शुरू होता है और समस्या को समझते-समझते बदलाव की कोशिश करने लगता है. यही उनकी कई सामाजिक फिल्मों की कहानी का मूल ढांचा है.
'अक्षय की फिल्मों में बार-बार क्यों लौटता है 'आम आदमी बनाम बड़ी समस्या' वाला पैटर्न?
अक्षय कुमार की फिल्मों को एक साथ रखकर देखने पर 'आम आदमी बनाम बड़ी समस्या' वाला पैटर्न सबसे ज्यादा नजर आता है. हालांकि उनकी पूरी फिल्मोग्राफी को इसी एक फॉर्मूले में बांधना सही नहीं होगा, लेकिन उनकी कई चर्चित फिल्मों में यह संरचना दिखाई देती है. इसकी सबसे बड़ी वजह शायद उनकी स्क्रीन इमेज है. अक्षय का व्यक्तित्व ऐसा रहा है कि वह पर्दे पर एक ऐसे व्यक्ति को आसानी से निभा सकते हैं जो शारीरिक रूप से फिट है, लेकिन जरूरी नहीं कि कहानी की शुरुआत में वह असाधारण स्थिति में हो. परिस्थितियां उसे असाधारण कदम उठाने के लिए मजबूर करती हैं.
तीन दशक में बदले Genre, लेकिन स्क्रीन पर अक्षय क्यों नहीं बदले?
अक्षय कुमार के 35 साल से ज्यादा लंबे करियर को देखें तो सबसे बड़ा बदलाव उनके जॉनर में दिखाई देता है. एक्शन से शुरू हुआ सफर कॉमेडी, रोमांस, देशभक्ति, सामाजिक ड्रामा, ऐतिहासिक फिल्म और विज्ञान आधारित कहानी तक पहुंचा. लेकिन जॉनर बदलने के बावजूद अक्षय की स्क्रीन पर्सोना में एक निरंतरता बनी रही.
खिलाड़ी दौर में उनका हीरो अपराधियों और खतरों का सामना करता है. कॉमेडी फिल्मों में वह उलझी परिस्थितियों में फंसा व्यक्ति है. देशभक्ति वाली फिल्मों में वह देश और लोगों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदारी उठाता है. सामाजिक फिल्मों में वह व्यवस्था या सोच के खिलाफ खड़ा होता है. इसलिए अगर सिर्फ जॉनर देखा जाए तो अक्षय का करियर कई हिस्सों में बंटा नजर आता है. लेकिन अगर किरदार के व्यवहार और संघर्ष को देखा जाए तो इन हिस्सों के बीच एक मजबूत कड़ी दिखाई देती है.
अक्षय कुमार का असली स्क्रीन फॉर्मूला क्या है?
एक्टर अक्षय कुमार के करियर का असली स्क्रीन फॉर्मूला सिर्फ एक्शन, कॉमेडी या देशभक्ति को कहना शायद सही नहीं होगा. इन सभी जॉनर के पीछे जो चीज बार-बार दिखाई देती है, वह है संघर्ष और समाधान. उनकी फिल्म मी कहानी में कोई समस्या होती है. अक्षय का किरदार उस समस्या के बीच खड़ा होता है. फिर कहानी उसके संघर्ष और समाधान खोजने की प्रक्रिया के जरिए आगे बढ़ती है. इसके अलावा वो कभी अपराधियों से लड़ते हैं, कभी पैसों की परेशानी में फंसे होते हैं, तो कभी आतंकवाद से मुकाबला करते हैं
इस लिहाज से अक्षय कुमार के करियर को 'जॉनर बदलने वाले अभिनेता' के बजाय 'एक ही मूल संघर्ष को अलग-अलग जॉनर में निभाने वाले अभिनेता' के तौर पर भी देखा जा सकता है. उनके करियर में समय के साथ लड़ाई का मैदान जरूर बदला है, लेकिन लड़ने वाला किरदार बना रहा. तीन दशक से ज्यादा समय में दर्शकों ने अक्षय को कई रूपों में देखा है. खिलाड़ी, कॉमेडियन, सैनिक, कारोबारी, सामाजिक बदलाव की कोशिश करने वाला आम आदमी और वैज्ञानिक मिशन का हिस्सा बनने वाला किरदार. लेकिन इन सभी चेहरों के पीछे एक चीज लगभग हमेशा मौजूद रही है.
अक्षय ने कई बड़े सम्मान अपने नाम किए. उन्हें 2009 में भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया. 'रुस्तम' के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला और 'पैडमैन' के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला. फिल्मफेयर समेत कई बड़े पुरस्कार उनके नाम हैं. तीन दशक से ज्यादा लंबे करियर में वह 100 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके हैं.
(Ians Input)