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कन्नड़ सिनेमा के दिग्गज अभिनेता अनंत नाग को अब भारतीय सिनेमा का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान मिलने जा रहा है. केंद्र सरकार ने उन्हें साल 2024 के दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की है.
यह सम्मान 22 सितंबर 2026 को गुजरात के एकता नगर (केवड़िया) में आयोजित होने वाले 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में दिया जाएगा.
किसी अभिनेता के लिए पुरस्कार उसकी उपलब्धियों की सूची में एक और नाम हो सकता है लेकिन अनंत नाग के मामले में दादा साहेब फाल्के सम्मान एक ऐसी यात्रा पर मुहर है जिसकी शुरुआत किसी स्टार बनने के सपने से नहीं हुई थी.
बल्कि एक ऐसे लड़के से हुई थी जिसका मन पढ़ाई में नहीं लगता था और जिसे कभी यह भी नहीं लगा था कि अभिनय ही उसकी जिंदगी का रास्ता बन सकता है.
वेबसाइट scroll.in को दिए एक इंटरव्यू में अनंत नाग ने अभिनेता की अपनी परिभाषा देते हुए कहा था कि एक अभिनेता को पानी की तरह होना चाहिए, अहंकार से मुक्त. पानी जिस बर्तन में जाता है उसी का आकार ले लेता है.
अनंत नाग का अभिनय भी कुछ ऐसा ही रहा. राजा, आम आदमी, खलनायक, हास्य किरदार, बुजुर्ग, पिता, बीमारी से जूझता व्यक्ति या किसी कहानी का शांत सूत्रधार हर जगह वो दिखाई दिए लेकिन किरदार पर कभी खुद को हावी नहीं होने दिया.
अनंत नाग का जन्म 4 सितंबर 1948 को हुआ. उनका बचपन कर्नाटक के तटीय इलाके में बीता. शुरुआती जीवन का एक हिस्सा आश्रम के वातावरण में गुजरा. बाद में पढ़ाई के लिए उन्हें मुंबई भेजा गया.
भारत सरकार की आधिकारिक जीवनी के मुताबिक उनके जीवन के शुरुआती 12 साल आनंदाश्रम और श्री चित्रापुर मठ के वातावरण में बीते, जहां कर्म, ध्यान और सेवा की सीख ने उनके व्यक्तित्व को प्रभावित किया.
परिवार चाहता था कि वह पढ़-लिखकर डॉक्टर या इंजीनियर बनें. लेकिन पढ़ाई और अनंत नाग की दोस्ती ज्यादा लंबी नहीं चली.
खुद अनंत नाग ने बताया है कि कन्नड़ माध्यम से अंग्रेजी माध्यम में आने के बाद पढ़ाई उनके लिए मुश्किल होती गई और उनका मन उसमें नहीं लगा. अभिनय की तरफ उनका जाना किसी सोची-समझी करियर रणनीति का हिस्सा नहीं था.
18 साल की उम्र में उन्हें चैतन्य महाप्रभु के जीवन पर आधारित एक नाटक में मुख्य भूमिका मिली. इसके बाद बुद्ध और पुनर्जन्म की स्मृतियों वाले एक युवक जैसे किरदार निभाए.
अगले पांच सालों में उन्होंने 50 से अधिक नाटकों में काम किया. कन्नड़, कोंकणी, मराठी और हिंदी रंगमंच ने उनके अभिनय की बुनियाद तैयार की. यही रंगमंच बाद में उनके फिल्मी अभिनय की सबसे बड़ी ताकत बना.
1973 में अनंत नाग ने कन्नड़ फिल्म 'संकल्प' से फिल्मों में कदम रखा. उस दौर में भारतीय सिनेमा में समानांतर फिल्मों की एक नई लहर थी.
श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी जैसे फिल्मकार सामाजिक यथार्थ को पर्दे पर ला रहे थे. अनंत नाग इस सिनेमा का महत्वपूर्ण चेहरा बने.
श्याम बेनेगल की फिल्मों में उन्होंने लगातार महत्वपूर्ण भूमिकाएं कीं. 'अंकुर', 'निशांत', 'मंथन', 'भूमिका', 'कोंडुरा' और 'कलयुग' जैसी फिल्मों ने उन्हें गंभीर अभिनेता के तौर पर पहचान दी.
लेकिन अनंत नाग की खासियत यह थी कि उन्होंने खुद को केवल 'आर्ट फिल्म एक्टर' बनाकर सीमित नहीं किया.
1974 में 'देवरा कन्नु' जैसी कमर्शियल फिल्म और फिर 1976 में आई 'बयलुदारी' ने उनके करियर की दिशा बदल दी.
'बयलुदारी' बड़ी हिट साबित हुई और उसके बाद व्यावसायिक फिल्मों के प्रस्ताव आने लगे. अनंत नाग समझ चुके थे कि केवल समानांतर सिनेमा के सहारे अभिनेता के रूप में टिके रहना मुश्किल है. इसलिए उन्होंने दोनों धाराओं के बीच संतुलन बनाया.
दिलचस्प बात यह है कि पांच दशक से ज्यादा समय तक अभिनय करने के बावजूद अनंत नाग खुद को 'फिल्म स्टार' मानने में सहज नहीं रहे.
एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उन्हें समझ ही नहीं आता कि 'फिल्म स्टार' आखिर होता कौन है. उनके लिए अभिनेता का काम किरदार के भीतर जाना है, स्टार बनने की कोशिश करना नहीं.
2023 में एक इंटरव्यू में उन्होंने यह भी कहा कि वह अपनी फिल्में तक नहीं देखते. उनका मानना था कि एक अभिनेता महीनों किसी किरदार के साथ जीता है, इसलिए उसे दोबारा पर्दे पर देखकर अपने काम का फैसला करने की जरूरत नहीं. उनकी मान्यता थी कि उनके काम की असली कसौटी दर्शक हैं.
शायद यही वजह है कि उनका अभिनय अक्सर अभिनय कम और जिंदगी ज्यादा लगता है.
नई पीढ़ी के बड़े हिस्से ने अनंत नाग को 'केजीएफ: चैप्टर 1' के जरिए फिर से खोजा. प्रशांत नील की इस फिल्म में वह कथावाचक के रूप में दिखाई दिए.
पांच दशक पुराने अभिनेता को एक नई पीढ़ी ने देखा और पहचाना.'केजीएफ' ने उनके अभिनय को उस दर्शक वर्ग तक पहुंचाया जिसके लिए शायद उनका 1970 और 1980 के दशक का समानांतर सिनेमा दूर की चीज थी.
इसके पहले भी वह लगातार काम करते रहे थे. 2016 की 'गोधी बन्ना साधारण मायकट्टु' में अल्जाइमर से पीड़ित व्यक्ति का किरदार उनके करियर के उल्लेखनीय प्रदर्शनों में गिना गया.
उन्होंने इस भूमिका की स्क्रिप्ट पढ़ते ही निर्देशक हेमंत राव से कहा था कि अगर कागज पर लिखी बात पर्दे पर उतर गई, तो फिल्म क्लासिक बन सकती है.
अनंत नाग का जीवन सिर्फ सिनेमा तक सीमित नहीं रहा. 1970 और 1980 के दशक में फिल्मों के साथ-साथ वह राजनीति की तरफ भी आकर्षित हुए.
जयप्रकाश नारायण के विचारों का उन पर प्रभाव पड़ा. वह जनता पार्टी से जुड़े, विधान परिषद और विधानसभा के सदस्य रहे. वह 1994 में विधानसभा सदस्य बने और बाद में (1996-1999 के दौरान) जे.एच. पटेल सरकार में मंत्री भी रहे.
हालांकि 1990 के दशक के अंत में मंत्री पद का कार्यकाल समाप्त होने और बाद के चुनावों में सक्रियता कम होने के बाद वे मुख्यधारा की चुनावी राजनीति से धीरे-धीरे दूर हो गए.
आखिरी बार 2004 में जेडी(एस) के टिकट पर चुनाव लड़ा. 2023 में उनके भाजपा में शामिल होने की खबर थी लेकिन औपचारिक रूप से वो पार्टी में शामिल नहीं हुए.
खुद अनंत नाग के मुताबिक, राजनीति में अत्यधिक गुटबाजी और अहंकार का टकराव बढ़ गया था. हालांकि उन्होंने राजनीति के अनुभव को अपनी जिंदगी की महत्वपूर्ण सीख माना.
2025 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया. आधिकारिक प्रशस्ति में उन्हें पांच दशकों से अधिक समय से भारतीय सिनेमा में योगदान देने वाला बहुमुखी कन्नड़ अभिनेता बताया गया. अब उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार दिया जा रहा है.
यह संयोग भी कम दिलचस्प नहीं है कि दादा साहेब फाल्के पुरस्कार उस अभिनेता को मिल रहा है, जिसकी सबसे बड़ी पहचान किसी एक भाषा, एक शैली या एक तरह के किरदार से नहीं बनी है.
वह कन्नड़ सिनेमा के अभिनेता हैं लेकिन उनका काम हिंदी, मराठी, मलयालम और अन्य भाषाओं तक फैला है.
2023 तक उनकी 300 से ज्यादा फिल्मों की यात्रा दर्ज की जा चुकी थी जिनमें 250 से अधिक कन्नड़ फिल्में थीं.
अनंत नाग की कहानी को सिर्फ एक महान अभिनेता को मिला बड़ा पुरस्कार कह देना शायद उनके साथ न्याय नहीं होगा. यह उस अभिनेता की कहानी है जिसने स्टार बनने की बजाय अभिनेता बने रहने को चुना है .
दादा साहेब फाल्के पुरस्कार उनके सफर का अंत नहीं बल्कि उस लंबे सफर की सार्वजनिक स्वीकृति है जिसमें उन्होंने बार-बार साबित किया कि अभिनय सिर्फ संवाद बोलना नहीं है. अभिनय खुद को पीछे हटाकर किसी दूसरे इंसान को सामने लाने की कला है.
अगर अनंत नाग के पूरे करियर को एक लाइन में समेटना हो तो शायद वह यह होगी कि उन्होंने अभिनेता बनने की कोशिश नहीं की, उन्होंने किरदारों को सच्चा बनाने की कोशिश की.
अब उनकी इस लंबी सिनेमाई यात्रा पर दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की वह रोशनी पड़ने जा रही है, जिसकी चमक सिर्फ आज के लिए नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए है.