World Polio Day: 'दो बूंद जिंदगी की' का वो दौर! कभी भारत पर था बड़ा खतरा, ऐसे डॉक्टरों और 'आशा वर्करों' ने बनाया पोलियो-मुक्त भारत
World Polio Day 2026: हर साल 24 अक्टूबर को विश्व पोलियो दिवस मनाया जाता है. एक दौर था जब भारत समेत अन्य देशों के लिए पोलियो की बीमारी एक गंभीर समस्या थी, जिससे निपटने के लिए भारत में डॉक्टर, एएनएम और आशा वर्कर्स का खास रोल रहा.
World Polio Day 2026: एक दौर था जब पोलियो को भी कोरोना वायरस की तरह ही एक भयानक महामारी के रूप में देखा जाता था. भारत समेत पूरी दुनिया में ये बीमारी तेजी से फैल रही थी, जिसे रोकने का एकमात्र सहारा वैक्सीनेशन बना. इससे निपटने के लिए भारत समेत अन्य देशों ने पहल की. भारतीय लोगों के बीच 90 के दशक की हर रविवार की सुबह एक देशव्यापी जागरूकता अभियान की याद के साथ है, जब टीवी पर महानायक अमिताभ बच्चन की दमदार आवाज गूंजती थी- 'एक भी बच्चा छूटा, सुरक्षा चक्र टूटा.' इसके अलावा गांव की चौपालों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर पीले रंग के डिब्बे गले में लटकाए स्वास्थ्यकर्मी हर बच्चे को 'दो बूंद जिंदगी की' पिलाते नजर आते थे.
खासतौर पर 5 साल या उससे कम उम्र के मासूमों को निशाना बनाने वाला ये वायरस, सही समय पर वैक्सीन न मिलने पर बच्चों को जिंदगी भर के लिए पैरालिसिस का शिकार बना देता था. आज हर साल 24 अक्टूबर को मनाया जाने वाला विश्व पोलियो दिवस न केवल इतिहास के पन्नों पर जमी धूल को हटाता है, बल्कि ये याद दिलाता है कि कैसे एकजुटता और जागरूकता से इतनी बड़ी बीमारी को हराया गया.
किसने और कब से की विश्व पोलियो दिवस की शुरुआत?
हर साल 24 अक्टूबर को विश्व पोलियो दिवस को मनाया जाता है जिसकी शुरुआत रोटरी इंटरनेशनल ने की थी. अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. जोनास साल्क ने पोलियो की पहली सफल वैक्सीन, इनएक्टिवेटेड पोलियो वैक्सीन (IPV) की खोज की थी और उनके जन्मदिन (24 अक्टूबर) के सम्मान में विश्व पोलियो दिवस मनाया जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य पोलियो को लेकर वैश्विक जागरूकता है.
भारत में नामुमकिन था पोलियो का खात्मा
दुनिया भर में पोलियो के मामले 1990 के दशक की शुरुआत में तेजी से बढ़ रहे थे, जिसमें अकेले भारत की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से भी ज्यादा थी. हर साल इस खतरनाक वायरस से संक्रमित बच्चे बुखार, उल्टी, सिरदर्द, गर्दन और कमर में अकड़न जैसी गंभीर तकलीफों के साथ अपंगता का शिकार हो रहे थे. कई बार तो शुरुआती लक्षणों की पहचान भी नहीं हो पाती थी और देखते-देखते बच्चा लकवे का शिकार हो जाता था.
भारत के लिए ये समस्या तब एक विकराल चुनौती बन गई जब देश की घनी आबादी, अस्वच्छता और दुर्गम ग्रामीण इलाकों तक पहुंचना असंभव सा प्रतीत होता था. स्थिति इतनी गंभीर थी कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के विशेषज्ञों ने भी यहां तक मान लिया था कि भारत से पोलियो को मिटाना दुनिया की सबसे कठिन स्वास्थ्य चुनौती है.
1995 में शुरू हुआ पल्स पोलियो अभियान
भारत सरकार ने पोलियो से मुक्ति पाने के लिए 'पल्स पोलियो प्रोग्राम' को पेश किया था.1995 में इस अभियान के तहत एक ही दिन में देश के सभी 5 साल तक के बच्चों को पोलियों की ड्रॉप पिलानी थी. 'दो बूंद, जिंदगी की' इसके तहत सभी 5 साल या उससे कम उम्र के बच्चों को पोलियो की बूंद पिलाई जानी लगी और ये भारत के इतिहास का सबसे बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान बन गया.
पोलियो से बचाव का जरिया बना टीकाकरण
पोलियो जैसी लाइलाज बीमारी से बचाव के लिए दो तरह के टीकों की शुरुआत की गई. पहली इनेक्टिवेटेड पोलियो वैक्सीन (IPV) है, जो आमतौर पर बच्चों के जन्म के बाद दी जाती है, जिससे भविष्य में पोलियो का खतरा न रहे. वहीं, दूसरी ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV) है यानी मुंह से पिलाई जाने वाली दो बूंद, जिसे भारत समेत दुनिया भर के बच्चों को बड़े पैमाने पर पिलाया गया.
आशा वर्कर और डॉक्टर ने जीती पोलियो से जंग
पोलियो जैसी विकराल समस्या से निपटने में अगर किसी का सबसे खास रोल रहा, तो वो देश के डॉक्टर, एएनएम और 10 लाख से अधिक आशा वर्कर थे. खराब रास्ते, उफनती नदियां, बर्फबारी और कड़कड़ाती धूप की परवाह किए बिना हमारी आशा बहनों ने गांव-गांव, गली-गली और हर घर तक पहुंचकर दवा पहुंचाई. पोलियो की दवा खराब न हो, इसका ख्याल रखने के लिए उन्होंने कंधों पर भारी 'वैक्सीन आइस-बॉक्स' लादकर दिन-रात ट्रैकिंग की. यही नहीं, कई ग्रामीण इलाकों में फैली भ्रांतियों और अफवाहों का डटकर सामना किया, लोगों का दिल जीता और हर बच्चे तक 'दो बूंद जिंदगी की' खुराक सुनिश्चित की.
2014 में भारत की पोलियो से ऐतिहासिक जीत
13 जनवरी 2011 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में भारत का आखिरी पोलियो मामला सामने आया था. इसके बाद लगातार तीन साल तक देश में पोलियो का एक भी नया मामला दर्ज नहीं किया गया. यही वो निर्णायक दौर था जिसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 27 मार्च 2014 को भारत को आधिकारिक रूप से 'पोलियो-मुक्त' घोषित कर दिया. डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और आशा वर्करों की अटूट मेहनत और सामूहिक कोशिशों ने ही भारत को इस गंभीर बीमारी से हमेशा के लिए मुक्त कराया.
कौन बन सकता है आशा वर्कर?
भारत में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत राज्य सरकारों द्वारा जिला और ग्राम पंचायत स्तर पर 'आशा वर्कर' (ASHA) की भर्ती आयोजित की जाती है. ये पद सिर्फ योग्य महिला उम्मीदवारों के लिए होता है. न्यूनतम 8वीं या 10वीं पास और 25 से 45 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाएं इस भर्ती के लिए पात्र होती हैं.
चयन प्रक्रिया:- आशा वर्कर का चयन बिना किसी लिखित परीक्षा के, स्थानीय समुदाय और ग्राम पंचायत की भागीदारी से किया जाता है. प्राप्त आवेदनों में से योग्य उम्मीदवारों की सूची तैयार की जाती है. इसके बाद ग्राम सभा के अनुमोदन और जिला चिकित्सा अधिकारी (CMO/BMO) की अंतिम मंजूरी मिलने पर चयन फाइनल होता है. चयनित महिलाओं को स्वास्थ्य विभाग की ओर से 23 दिनों का इंडक्शन ट्रेनिंग मॉड्यूल कराया जाता है.
आवेदन कैसे करें:- भर्ती निकलने पर योग्य उम्मीदवार अपने नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC), ग्राम पंचायत कार्यालय या ANM से फॉर्म लेकर ऑफलाइन आवेदन कर सकते हैं. इसके अलावा कुछ राज्यों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के आधिकारिक पोर्टल के जरिए ऑनलाइन आवेदन की सुविधा भी उपलब्ध होती है.
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