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भारत में हथकरघा और कपड़ा निर्माण की परंपरा सदियों पुरानी है. देश के अलग-अलग हिस्सों में बनने वाली साड़ियां, रेशमी कपड़े, सूती वस्त्र और दूसरे हथकरघा उत्पाद अपनी खास बुनाई, डिजाइन और स्थानीय पहचान के लिए जाने जाते हैं. इनमें से कई उत्पादों को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग मिला हुआ है. आधिकारिक भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री में तमिलनाडु के कई पारंपरिक वस्त्र और साड़ियां पंजीकृत हैं. इनमें कांचीपुरम सिल्क, भवानी जामक्कलम, मदुरै सुंगुड़ी, अरनी सिल्क, कोवई कोरा कॉटन साड़ी, सलेम सिल्क और कई अन्य वस्त्र शामिल हैं.
तमिलनाडु की हथकरघा परंपरा को राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों की विशिष्ट बुनाई से पहचान मिलती है. आधिकारिक रिकॉर्ड में यहां के कई वस्त्रों को हस्तशिल्प श्रेणी के तहत पंजीकृत किया गया है. कांचीपुरम अपनी रेशमी साड़ियों के लिए जाना जाता है, भवानी जामक्कलम अपनी पारंपरिक बुनाई के लिए, जबकि मदुरै सुंगुड़ी अपनी रंगाई और बांधनी शैली के लिए प्रसिद्ध है. अरनी, सलेम, कोयंबटूर क्षेत्र और नेगमम जैसे स्थानों की भी अपनी अलग वस्त्र पहचान है.
जीआई टैग क्या होता है?
भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग किसी ऐसे उत्पाद की पहचान करता है जिसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेषता किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है. यह पहचान कृषि उत्पादों, खाद्य पदार्थों, हस्तशिल्प, वस्त्रों और अन्य उत्पादों को दी जा सकती है. जीआई पंजीकरण किसी उत्पाद और उसके क्षेत्रीय संबंध को आधिकारिक पहचान देने की व्यवस्था है.
कांचीपुरम सिल्क क्यों प्रसिद्ध है?
कांचीपुरम सिल्क तमिलनाडु के सबसे प्रसिद्ध जीआई पंजीकृत वस्त्रों में शामिल है. आधिकारिक रजिस्ट्री के अनुसार इसका आवेदन संख्या 15 है और इसे 2004 में पंजीकृत किया गया था. यह हस्तशिल्प श्रेणी में दर्ज है और इसका भौगोलिक क्षेत्र तमिलनाडु है. इसकी पहचान पारंपरिक रेशमी बुनाई और विशिष्ट डिजाइनों से जुड़ी हुई है. आधिकारिक रिकॉर्ड में इसका पंजीकरण अभी भी दर्ज है.
भवानी जामक्कलम की क्या पहचान है?
भवानी जामक्कलम भी तमिलनाडु का पंजीकृत जीआई उत्पाद है. आधिकारिक रिकॉर्ड में इसे वस्त्र और वस्त्र उत्पाद की श्रेणी में दर्ज किया गया है. इसका आवेदन संख्या 16 है और इसे 2004 में पंजीकरण मिला था. यह नाम भवानी क्षेत्र की पारंपरिक वस्त्र बुनाई से जुड़ा हुआ है.
मदुरै सुंगुड़ी किसलिए जानी जाती है?
मदुरै सुंगुड़ी तमिलनाडु की पारंपरिक वस्त्र परंपरा का एक प्रमुख उदाहरण है. आधिकारिक जीआई रिकॉर्ड में इसे हस्तशिल्प के रूप में पंजीकृत किया गया है. इसकी पहचान पारंपरिक बांधनी और रंगाई की तकनीक से जुड़ी है. इसका पंजीकरण 2005 में दर्ज किया गया था.
अरनी सिल्क की क्या खासियत है?
अरनी सिल्क भी तमिलनाडु का पंजीकृत जीआई उत्पाद है. आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार इसका आवेदन संख्या 92 है और इसे 2007 में पंजीकृत किया गया था. यह हस्तशिल्प श्रेणी में दर्ज है और इसका भौगोलिक क्षेत्र तमिलनाडु बताया गया है. अरनी क्षेत्र लंबे समय से रेशमी वस्त्र और साड़ी बुनाई की परंपरा से जुड़ा रहा है.
तमिलनाडु की कौन-कौन सी सूती साड़ियां प्रसिद्ध हैं?
तमिलनाडु में रेशमी वस्त्रों के साथ कई सूती साड़ियों को भी जीआई पहचान मिली हुई है. आधिकारिक सूची में कोवई कोरा कॉटन साड़ी, कंडांगी साड़ी, नेगमम कॉटन साड़ी और चेदिबुट्टा साड़ी जैसे नाम दर्ज हैं. नेगमम कॉटन साड़ी का पंजीकरण 2021 में दर्ज है, जबकि कंडांगी साड़ी का पंजीकरण 2013 में हुआ था.
सलेम सिल्क को कब मिली पहचान?
सलेम सिल्क, जिसे आधिकारिक रिकॉर्ड में सलेम सिल्क नोन ऐज़ सलेम वेनपट्टू के नाम से दर्ज किया गया है, तमिलनाडु का पंजीकृत जीआई उत्पाद है. इसका आवेदन संख्या 94 है और इसे 2007 में पंजीकृत किया गया था. यह भी हस्तशिल्प श्रेणी में दर्ज है.
तमिलनाडु के प्रमुख जीआई वस्त्र कौन से हैं?
तमिलनाडु के कई पारंपरिक वस्त्रों को जीआई पहचान मिली हुई है. प्रमुख नामों में कांचीपुरम सिल्क, भवानी जामक्कलम, मदुरै सुंगुड़ी, अरनी सिल्क, कोवई कोरा कॉटन साड़ी, सलेम सिल्क, कंडांगी साड़ी, तिरुभुवनम सिल्क साड़ियां, चेदिबुट्टा साड़ी और नेगमम कॉटन साड़ी शामिल हैं. आधिकारिक रजिस्ट्री में तिरुभुवनम सिल्क साड़ियों का पंजीकरण 2014 और नेगमम कॉटन साड़ी का पंजीकरण 2021 में दर्ज है.
| जीआई पंजीकृत वस्त्र | क्षेत्र |
|---|---|
| कांचीपुरम सिल्क | कांचीपुरम |
| भवानी जामक्कलम | भवानी |
| मदुरै सुंगुड़ी | मदुरै |
| अरनी सिल्क | अरनी |
| कोवई कोरा कॉटन साड़ी | कोयंबटूर क्षेत्र |
| सलेम सिल्क | सलेम |
| कंडांगी साड़ी | तमिलनाडु |
| तिरुभुवनम सिल्क साड़ियां | तिरुभुवनम |
| चेदिबुट्टा साड़ी | तमिलनाडु |
| नेगमम कॉटन साड़ी | नेगमम |
आधिकारिक जीआई रजिस्ट्री में तमिलनाडु के इन उत्पादों के साथ कई अन्य हस्तशिल्प भी दर्ज हैं. इसलिए जीआई टैग वाले वस्त्रों की बात करें तो तमिलनाडु भारत की प्रमुख पारंपरिक हथकरघा पहचान वाले राज्यों में सामने आता है. हालांकि जीआई सूची समय के साथ नए पंजीकरणों के कारण बदल सकती है, इसलिए किसी भी संख्या या राज्यवार तुलना के लिए नवीनतम आधिकारिक रजिस्ट्री देखना जरूरी है.