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1989 से घर में सिर्फ संस्कृत! कर्नाटक के इस परिवार की तीन पीढ़ियां आज भी इसी भाषा में करती हैं बातचीत

कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ में एक परिवार 1989 से संस्कृत को अपनी रोजमर्रा की घरेलू भाषा के रूप में इस्तेमाल कर रहा है. तीन पीढ़ियों से जारी है ये अनोखी पहल.

1989 से घर में सिर्फ संस्कृत! कर्नाटक के इस परिवार की तीन पीढ़ियां आज भी इसी भाषा में करती हैं बातचीत
Image Credit: 1989 से घर में संस्कृत, तीन पीढ़ियों की अनोखी कहानी

कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ इलाके में एक परिवार ने संस्कृत को सिर्फ पढ़ने और धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे अपने घर की रोजमर्रा की भाषा बना दिया है. बंटवाल तालुक के कालडका में रहने वाले वसंत माधव और उनकी पत्नी सावित्री पिछले 37 वर्षों से अपने परिवार में संस्कृत का इस्तेमाल कर रहे हैं. उनके घर को संस्कृत में ‘संस्कृत गृह’ कहा जाता है, जहां तीन पीढ़ियां इसी भाषा में आपस में बातचीत करती हैं.

इस पहल की शुरुआत 1989 में हुई थी. वसंत ने श्री रामा विद्या केंद्र में पढ़ाई की थी और बाद में संस्कृत भारती की स्वयंसेवक सावित्री से उनका विवाह हुआ. शादी से पहले सावित्री ने उनसे कहा था कि वे घर पर संस्कृत में बातचीत करें. इसके लिए वसंत ने संस्कृत में बातचीत करने की क्षमता बढ़ाने वाले शिविरों में हिस्सा लिया और धीरे-धीरे इस भाषा में सहज होते गए.

घर में संस्कृत कैसे बनी रोजमर्रा की भाषा?

शुरुआती दौर में दंपति ने घर की दीवारों और रसोई के अलग-अलग हिस्सों पर संस्कृत के नाम लिखे. इसका मकसद घर में इस्तेमाल होने वाली चीजों के संस्कृत शब्दों से परिवार को परिचित कराना था. जब उनका बेटा पैदा हुआ तो उसने संस्कृत को किसी अलग विषय की तरह नहीं, बल्कि अपने आसपास सुनी जाने वाली सामान्य भाषा के रूप में सीखा.

बेटे को कन्नड़ भी क्यों सिखानी पड़ी?

परिवार की संस्कृत के प्रति प्रतिबद्धता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उनका बेटा प्राथमिक स्कूल में गया तो शिक्षकों को उसके माता-पिता से कन्नड़ सिखाने का अनुरोध करना पड़ा. उस समय बच्चा संस्कृत में ही बातचीत कर पाता था. परिवार की यह भाषा परंपरा आगे भी जारी रही और आज उनके पोते-पोतियां भी संस्कृत में बातचीत करते हैं.

सावित्री की भूमिका क्या रही?

संस्कृत भारती से जुड़े कार्यकर्ता विश्वास महोदया के अनुसार, सावित्री संगठन के शुरुआती दिनों से ही इससे जुड़ी रही थीं और उन्होंने पूर्णकालिक कार्यकर्ता के तौर पर भी काम किया. उन्होंने संस्कृत भाषा में प्रशिक्षण लिया और इसमें गहरी रुचि विकसित की. कई वर्षों तक उन्होंने संभाषण शिविरों और बोलचाल की भाषा से जुड़े कार्यक्रमों के जरिए संगठन के काम में योगदान दिया.

परिवार ने घर को ‘संस्कृत गृह’ क्यों बनाया?

विश्वास महोदया के मुताबिक, वसंत से शादी के बाद सावित्री और उनके पति ने अपने घर को एक वास्तविक ‘संस्कृत गृह’ में बदलने का महत्वपूर्ण फैसला लिया. वसंत का मानना है कि अगर प्राचीन ज्ञान और परंपरा की जड़ में मौजूद भाषा को बोलचाल की भाषा बनाया जाए तो इसका सकारात्मक असर हो सकता है.

क्या संस्कृत आज भी घर में जीवित है?

इस परिवार की कहानी दिखाती है कि कोई भाषा केवल किताबों, कक्षाओं या औपचारिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहती. जब उसे परिवार की रोजमर्रा की बातचीत में जगह मिलती है तो वह अगली पीढ़ी तक स्वाभाविक रूप से पहुंच सकती है. 1989 से शुरू हुई वसंत और सावित्री की पहल आज तीन पीढ़ियों तक पहुंच चुकी है और संस्कृत उनके परिवार की दैनिक बातचीत का हिस्सा बनी हुई है.

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About the Author

Shivam Tiwari

Shivam Tiwari

शिवम तिवारी, जी न्यूज में डिजिटल कंटेंट राइटर हैं और पत्रकारिता में करीब 2 साल से अधिक का अनुभव रखते हैं. यूपी के प्रयागराज के रहने वाले शिवम ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया है. खबरों की नब्ज पकड़कर उन्हें आसान और साफ भाषा में पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं. शिवम शिक्षा और रोजगार से जुड़े विषयों पर खास फोकस रखते हैं. इनमें स्कूल-कॉलेज एडमिशन, बोर्ड परीक्षाएं, प्रवेश परीक्षाएं, सरकारी नौकरियां, रिजल्ट, कॉम्पिटिटिव एग्जाम, करियर टिप्स, करेंट अफेयर्स और जनरल नॉलेज जैसे टॉपिक्स शामिल हैं.इसके अलावा शिवम, टीचर्स, प्रोफेसर्स, एक्सपर्ट्स और करियर काउंसलर्स की सलाह के आधार पर कंटेंट तैयार करते हैं. ये IIT-JEE, NEET, GATE, CLAT और CUET जैसे नेशनल लेवल एंट्रेंस एग्जाम से जुड़े विषयों पर गहराई से काम करते हैं और छात्रों के लिए उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराते हैं. शिवम तिवारीर से संपर्क करने के लिए आप उन्हें shivam.tiwari@india.com पर ईमेल कर सकते हैं.
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