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स्कूल बंद, कमरे खाली… क्या पहाड़ों से बच्चों का पलायन हो रहा है?

हिमाचल और उत्तराखंड में पलायन व घटती छात्र संख्या से स्कूलों की स्थिति प्रभावित हुई है. हिमाचल में 177 स्कूल बिना भवन चल रहे हैं, जबकि 1,526 स्कूल बंद या पुनर्गठित हुए. उत्तराखंड में 826 स्कूल बंद हुए. सरकार विलय, नए भवन और शिक्षकों की नियुक्ति कर रही है.

Written By Shivam Tiwari
Published: Sep 05, 2026, 12:03 PM IST | Updated: Sep 05, 2026, 12:09 PM IST
Image Credit: कितने स्कूलों के पास अपनी इमारत नहीं?
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पहाड़ों में कभी बच्चों की आवाजों से गूंजने वाले स्कूल अब कई जगह खाली कमरों की कहानी कह रहे हैं. कहीं स्कूल का अपना भवन नहीं है, तो कहीं बच्चों की संख्या इतनी कम हो गई कि स्कूल को दूसरे संस्थान में मर्ज करना पड़ा. हिमाचल प्रदेश में 177 सरकारी स्कूल अपनी इमारत के बिना चल रहे हैं, जबकि पिछले तीन साल में 1,526 स्कूल बंद या पुनर्गठित किए गए.

वहीं, दूसरी ओर उत्तराखंड में 2020 से 2025 के बीच 826 प्राथमिक स्कूल बंद हुए. दोनों राज्यों में सरकार इसकी बड़ी वजह कम नामांकन और पलायन बता रही है. लेकिन सवाल सिर्फ स्कूल बंद होने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि पहाड़ों से परिवार और बच्चे आखिर क्यों दूर हो रहे हैं और उन्हें रोकने के लिए क्या किया जा रहा है.

पहाड़ों में स्कूलों की तस्वीर इतनी बदली क्यों?

हिमाचल प्रदेश में 177 सरकारी स्कूल फिलहाल अपने भवन के बिना चल रहे हैं. इनकी कक्षाएं रेस्ट हाउस, पंचायत भवन, सामुदायिक केंद्र, महिला मंडल भवन, निजी परिसरों और दूसरे सरकारी स्कूलों की इमारतों में लग रही हैं. शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने विधानसभा में भाजपा विधायक इंद्र दत्त लखनपाल के सवाल के जवाब में यह जानकारी दी. इनमें 12 स्कूल ऐसे हैं, जिनके पुराने भवन प्राकृतिक आपदा के बाद असुरक्षित घोषित किए गए. इससे पता चलता है कि पहाड़ी इलाकों में स्कूलों की समस्या केवल विद्यार्थियों की संख्या तक सीमित नहीं है. आपदा, भवन और जमीन की उपलब्धता भी शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर रही है.

चंबा में 99 बच्चे चार कमरों में क्यों पढ़ रहे हैं?

चंबा जिले के कुनरा स्थित राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय का मामला इसकी गंभीरता दिखाता है. आपदा के बाद स्कूल का मूल भवन असुरक्षित घोषित कर दिया गया था. इसके बाद स्कूल को लोक निर्माण विभाग के रेस्ट हाउस में स्थानांतरित किया गया. फिलहाल यहां चार कमरों में 99 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं. नए भवन के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन इसके पूरा होने की निश्चित समयसीमा सरकार ने नहीं बताई है. पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसे मामलों में केवल भवन बनाना ही चुनौती नहीं है. सुरक्षित जमीन तलाशना, जमीन का अधिग्रहण करना और इसके बाद निर्माण पूरा करना भी लंबी प्रक्रिया बन जाती है.

कितने स्कूलों के नए भवन बन रहे हैं?

सरकार के अनुसार हिमाचल में 28 स्कूल भवनों का निर्माण चल रहा है, जबकि 14 अन्य भवनों के लिए धनराशि जारी की जा चुकी है. कई दूसरे स्कूलों के मामलों में जमीन उपलब्ध नहीं होने या भूमि अधिग्रहण लंबित होने से निर्माण आगे नहीं बढ़ पाया है. यानी समस्या केवल बजट की नहीं है. पहाड़ी राज्य में उपयुक्त जमीन मिलना और अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होना भी बड़ी चुनौती है. सरकार स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के लिए केंद्र की समग्र शिक्षा योजना के तहत नए भवन, अतिरिक्त कमरे, मरम्मत और आपदा से क्षतिग्रस्त भवनों के पुनर्निर्माण जैसे काम कर रही है.

क्या स्कूल बंद होने की वजह बच्चों का कम होना है?

हिमाचल में पिछले तीन वर्षों में 1,526 स्कूल बंद या पुनर्गठित किए गए. सरकार का तर्क है कि कम नामांकन वाले स्कूलों के विलय और युक्तिकरण से संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है. शिक्षा विभाग के पास 1,473 स्कूल भवन हैं, जिनमें से 577 भवन दूसरे विभागों और सामुदायिक संस्थाओं को दिए जा चुके हैं. इनका इस्तेमाल पंचायत, महिला मंडल, युवक मंडल, आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य, आयुष और पशुपालन जैसी गतिविधियों में हो रहा है. वहीं उत्तराखंड में 2020 से 2025 के बीच 826 प्राथमिक स्कूल बंद हुए. टिहरी में 262, पौड़ी गढ़वाल में 120 और पिथौरागढ़ में 104 स्कूल बंद हुए.

क्या सिर्फ स्कूल मर्ज करने से समस्या खत्म होगी?

शिक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक स्कूलों की स्थिति को केवल भवन या मर्जर के आंकड़ों से नहीं देखा जा सकता. हिमाचल के 2025-26 समग्र शिक्षा दस्तावेज में 3,462 एकल-शिक्षक स्कूलों और कम नामांकन वाले स्कूलों की स्थिति पर भी ध्यान दिया गया है. ऐसे में बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए शिक्षक, सुरक्षित परिवहन, डिजिटल सुविधाएं और बुनियादी सुविधाएं जरूरी हैं.

 उत्तराखंड में कम छात्र संख्या वाले स्कूलों के बच्चों को नजदीकी बड़े स्कूलों में भेजने की व्यवस्था की जा रही है और 808 हेडमास्टरों की नियुक्ति प्रक्रिया चल रही है. विशेषज्ञों के नजरिए से असली चुनौती यह है कि बच्चों को बेहतर सुविधाएं देने के साथ उन्हें अपने गांव और पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा से जोड़े रखा जाए.

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About the Author

शिवम तिवारी, जी न्यूज में डिजिटल कंटेंट राइटर हैं और पत्रकारिता में करीब 2 साल से अधिक का अनुभव रखते हैं. यूपी के प्रयागराज के रहने वाले शिवम ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया है. खबरों की नब्ज पकड़कर उन्हें आसान और साफ भाषा में पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं. शिवम शिक्षा और रोजगार से जुड़े विषयों पर खास फोकस रखते हैं. इनमें स्कूल-कॉलेज एडमिशन, बोर्ड परीक्षाएं, प्रवेश परीक्षाएं, सरकारी नौकरियां, रिजल्ट, कॉम्पिटिटिव एग्जाम, करियर टिप्स, करेंट अफेयर्स और जनरल नॉलेज जैसे टॉपिक्स शामिल हैं.इसके अलावा शिवम, टीचर्स, प्रोफेसर्स, एक्सपर्ट्स और करियर काउंसलर्स की सलाह के आधार पर कंटेंट तैयार करते हैं. ये IIT-JEE, NEET, GATE, CLAT और CUET जैसे नेशनल लेवल एंट्रेंस एग्जाम से जुड़े विषयों पर गहराई से काम करते हैं और छात्रों के लिए उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराते हैं. शिवम तिवारीर से संपर्क करने के लिए आप उन्हें shivam.tiwari@india.com पर ईमेल कर सकते हैं.
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