MPSC Success Story of Mala Papalkar: जरा सोचिए... एक नन्ही सी जान, जो अभी-अभी इस दुनिया में आई ही थी और उसकी आंखों में रोशनी नहीं थी. उस वक्त उसे संभालने के लिए किसी अपने का साथ होना चाहिए था, लेकिन इसके ठीक उलट हुआ. कोई जालिम उस मासूम को गंदे कूड़ेदान में फेंककर बदबू के हवाले कर गया. जलगांव रेलवे स्टेशन के उस कचरे के ढेर में तड़पती, रोती उस नवजात बच्ची के पास न कोई पहचान थी. साथ था भी तो बस वो अंधेरा जो जन्म से ही उसकी किस्मत में लिख दिया गया था. किस्मत ने तो पहले ही दिन उस बेजुबान को मात दे दी थी, लेकिन किसे पता था कि कूड़ेदान के उस भयानक अंधेरे से निकलकर एक दिन वही बच्ची सफलता का ऐसा सूरज उगाएगी, जिसकी चमक पूरा देश देखेगा.
माला पापलकर के सफर की कहानी सिर्फ अनाथालय से नागपुर कलेक्ट्रेट तक का नहीं है, ये दास्तान उस टूटे हुए भरोसे की है, जो शंकर बाबा के निस्वार्थ स्नेह से फिर जुड़ा. समाज की बेरुखी और अपनी दृष्टिहीनता पर आंसुओं में बहाने के बजाय, माला ने संघर्ष और MPSC परीक्षा को ही अपनी ढाल बना लिया. आइए माला पापलकर की सफलता की पूरी कहानी जानते हैं.
कहते हैं, जिसका कोई नहीं होता उसका ईश्वर होता है और वो किसी न किसी रूप में मदद के लिए अपना ही कोई बंदा भेज देता है. कुछ ऐसा ही जलगांव रेलवे स्टेशन के उस गंदे कूड़ेदान में मिली नन्ही बच्ची के साथ हुआ. पुलिस ने जब उस मासूम को बचाया, तो उसे अमरावती के वझर स्थित अनाथालय के संचालक शंकर बाबा पुंडलीकराव पापलकर को सौंप दिया. माला के लिए शंकर बाबा केवल एक अनाथालय संचालक नहीं, बल्कि साक्षात पिता बनकर आए. उन्होंने माला को अपनी बेटी की तरह पाला और उसे अपना सरनेम 'पापलकर' दिया.
भले ही जन्म से आंखों की रोशनी नहीं थी, लेकिन माला ने ब्रेल लिपि के माध्यम से अपनी पढ़ाई की नींव रखी और कभी हार नहीं मानी. अनाथालय में रहकर उन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई जारी रखी. उन्होंने डॉ. भिवापुरकर अंध विद्यालय से स्कूली शिक्षा हासिल की. उसके बाद विदर्भ ज्ञान विज्ञान संस्थान से ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की. इसके बाद आगे भी पढ़ाई की और पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने प्रतियोगी परीक्षा में भी हिस्सा लिया.
माला पापलकर ने अपनी अटूट मेहनत और बुलंद हौसलों के दम पर वो मुकाम हासिल किया, जो कई लोगों के लिए एक मिसाल बन गया है. उन्होंने महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीशन (MPSC) की क्लर्क-कम-टाइपिस्ट (ग्रुप-सी) परीक्षा में शानदार सफलता हासिल की. इसके बाद उन्हें नागपुर कलेक्ट्रेट में राजस्व सहायक के पद पर नियुक्ति पत्र मिला.
जिसे जन्म लेते ही अपनों ने बदबूदार कूड़ेदान में फेंक दिया था, आज वही बेटी नागपुर कलेक्ट्रेट में बैठकर प्रशासनिक जिम्मेदारी संभाल रही है. अनाथालय की सीमित दीवारों से निकलकर कलेक्ट्रेट तक पहुंचे इस सफर ने साबित कर दिया कि हालात चाहे जितने भी कठिन हों, अगर इरादे मजबूत हों तो किस्मत भी घुटने टेक देती है.