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आज Yale University का नाम दुनिया की प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थाओं में लिया जाता है, लेकिन इसकी शुरुआती कहानी अमेरिका से कहीं ज्यादा दूर भारत के मद्रास से जुड़ती है. करीब 300 साल पहले भारत में काम करने वाले ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी Elihu Yale ने अमेरिका के एक छोटे से कॉलेज को ऐसा दान दिया, जिसने उसके विकास की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई. खास बात यह है कि इस दान में किताबों और शाही सामान के साथ भारत से जुड़े वस्त्र भी शामिल थे.
Elihu Yale साल 1672 में मद्रास पहुंचे थे. उस समय मद्रास ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था. Yale ने कंपनी में काम करते हुए धीरे-धीरे अपना प्रभाव बढ़ाया और आखिरकार Fort St George के Governor बने. उन्होंने 1687 से 1692 तक इस पद पर काम किया.
भारत में बिताए वर्षों के दौरान Yale ने व्यापार और प्रशासन से जुड़ी गतिविधियों के जरिए काफी संपत्ति अर्जित की. हालांकि, उनकी संपत्ति की विरासत पूरी तरह निर्विवाद नहीं है. ऐतिहासिक शोध में उनकी संपत्ति को औपनिवेशिक व्यापार और ईस्ट इंडिया कंपनी की गुलामी से जुड़ी गतिविधियों के संदर्भ में भी देखा जाता है.
भारत से लौटने के बाद Elihu Yale अमेरिका के Connecticut में मौजूद Collegiate School of Connecticut के समर्थक बने. यह संस्थान 1701 में स्थापित हो चुका था और 1716 में New Haven स्थानांतरित हुआ.
साल 1718 में Yale ने कॉलेज को एक बड़ा दान भेजा. इसमें 417 किताबें, King George I का चित्र, शाही प्रतीक और कई गांठों में सामान शामिल था. इनमें भारत से आए वस्त्र भी थे. यही वह बिंदु है जहां भारत और भविष्य के Yale University के इतिहास का रिश्ता बेहद दिलचस्प हो जाता है.
Yale द्वारा भेजे गए सामान को बेचने से कॉलेज को महत्वपूर्ण रकम हासिल हुई. ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, इन सामानों की Boston में बिक्री से 562 पाउंड और 12 शिलिंग मिले. यह रकम Elihu Yale के अनुमानित 300 पाउंड के मूल्य से भी अधिक थी.
यानी भारत में अर्जित संपत्ति और भारत से जुड़े सामान अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका में एक शैक्षणिक संस्थान की शुरुआती आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में शामिल हुए. वहीं, Yale द्वारा भेजी गई किताबें और King George I का चित्र कॉलेज ने अपने पास सुरक्षित रखा.
यहां सबसे बड़ा भ्रम सामने आता है. Elihu Yale ने Yale University की स्थापना नहीं की थी. जब उन्होंने दान दिया, तब Collegiate School of Connecticut पहले ही 1701 में स्थापित हो चुका था.
असल में Yale का नाम बाद में इस संस्थान से जुड़ा. उनके योगदान और आर्थिक मदद के सम्मान में 1718 में कॉलेज का नाम Yale College रखा गया. बाद में यही संस्थान विकसित होकर Yale University बना.
Yale का नाम अपनाने के पीछे उनके दान की बड़ी भूमिका थी. कॉलेज के Trustees उनके योगदान से प्रभावित थे और उम्मीद थी कि यह संबंध आगे भी आर्थिक सहयोग का रास्ता खोल सकता है.
इस तरह एक ब्रिटिश अधिकारी, जिसने अपने करियर का महत्वपूर्ण हिस्सा भारत में बिताया था, उसका नाम अमेरिका के एक कॉलेज की पहचान बन गया. समय के साथ यही नाम वैश्विक शिक्षा के सबसे प्रसिद्ध नामों में शामिल हो गया.
Yale के इतिहास को केवल एक महान विश्वविद्यालय के निर्माण की कहानी के तौर पर देखना अधूरा होगा. इसके पीछे ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन, ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार, भारत में अर्जित संपत्ति और उस दौर की वैश्विक व्यापार व्यवस्था भी मौजूद थी.
इसीलिए Elihu Yale की विरासत को लेकर इतिहास में दो अलग पहलू दिखाई देते हैं. एक तरफ उनका कॉलेज को दिया गया महत्वपूर्ण दान है, वहीं दूसरी तरफ उनकी संपत्ति के स्रोत और औपनिवेशिक व्यवस्था से उनका संबंध भी इतिहासकारों के अध्ययन का विषय है.
Yale University का नाम सुनते ही आमतौर पर अमेरिका का Connecticut और New Haven याद आता है. लेकिन इसकी शुरुआती कहानी में चेन्नई यानी तत्कालीन मद्रास की एक महत्वपूर्ण कड़ी छिपी है.
भारत में काम करने वाला एक औपनिवेशिक अधिकारी, भारत से जुड़ा सामान, भारतीय वस्त्रों की बिक्री और उससे मिलने वाली रकम. ये सभी घटनाएं मिलकर उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का हिस्सा बनीं, जिसमें Yale College ने अपनी पहचान बनाई.
इस नजरिए से देखें तो Yale की कहानी केवल एक विश्वविद्यालय के नाम की कहानी नहीं है. यह उस दौर की वैश्विक कड़ी की कहानी है, जिसमें भारत का व्यापार, ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था और अमेरिका की शुरुआती उच्च शिक्षा एक-दूसरे से जुड़ रहे थे.