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Bastar Former Maoist Pass 10th: कहते हैं ‘जब जागो तभी सवेरा’ और इसका जीवंत उदाहरण बस्तर के तीन पूर्व माओवादी बने हैं. एक समय था जब इनकी जिंदगी बस्तर के जंगलों में बंदूकों की गूंज से तय होती थी, लेकिन एक सही फैसले ने उनकी दुनिया बदल दी. बंदूक छोड़ किताबें थामने का उनका ये सफर हर किसी के लिए प्रेरणादायक है. कभी माओवादी संगठन का हिस्सा रहे गीता नरोटे, अर्जुन ओयाम और संतोष आचला ने आत्मसमर्पण के बाद पढ़ाई की राह चुनी और नतीजा ये रहा कि तीनों ने छत्तीसगढ़ राज्य ओपन स्कूल की 10वीं की परीक्षा फर्स्ट डिविजन से पास कर ली. आइए इन तीनों पूर्व माओवदियों के आत्मसमर्पण के बाद शिक्षा पर जोर की कहानी जानते हैं.
दरअसल, छत्तीसगढ़ के ओपन स्कूल की 10वीं परीक्षा का आयोजन अगस्त 2026 में किया गया था. उस दौरान बस्तर संभाग के आठ आत्मसमर्पित माओवादी कैडर ने भी एग्जाम में हिस्सा लिया. अब इस परीक्षा का रिजल्ट आ चुका है जिसमें आठों माओवादियों ने सफलता हासिल की है.
सफल हुए इन आठ आत्मसमर्पित माओवादियों में से सात लोगों ने अक्टूबर 2025 में आत्मसमर्पण किया था जो 210 माओवादियों के समूह का हिस्सा थे. फर्स्ट डिविजन से पास हुए तीन लोगों की जिंदगी की कहानी सिर्फ परीक्षा तक नहीं, बल्कि उनकी बदलाव की कहानी है, जिन्होंने लंबे समय तक संघर्ष और हिंसा के माहौल में रहने के बाद अब शिक्षा और सामान्य जीवन को अपना रास्ता बनाया है.
माओवादी संगठन का हिस्सा रहीं 35 साल की गीता नरोटे ने कक्षा 6वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी. पारिवारिक परिस्थितियों और कम उम्र में आई जिम्मेदारियों ने उन्हें शिक्षा से दूर किया था. इसके बाद वो लगभग 20 साल तक संगठन के साथ रहीं. उस दौरान उन्होंने माओवादी संगठन की मेडिकल टीम में काम किया था, वो घायल कैडरों को इलाज के तौर पर टांके लगाती थीं. साथ ही इंजेक्शन देना और दवाइयां उपलब्ध कराने जैसी जिम्मेदारियां भी निभाती थीं.
माओवादी संगठन में गीता को 'डॉक्टर चंपा' के नाम से पुकारते थे. हालांकि, अपने अधूरे सपने को पूरा करने के लिए उन्हें संगठन को छोड़ने का फैसला लिया और साल 2025 में उन्होंने आत्मसमर्पण कर अधूरी पढ़ाई पूरी करने का फैसला लिया. दोबारा पढ़ने का अवसर मिलने के कारण वो काफी खुश हुई हैं और आगे चलकर नर्स बनने का सपना पूरा करना चाहती हैं. उन्हें पढ़ाई करने के लिए पुनर्वास योजना के तहत आर्थिक मदद भी मिल रही है. कक्षा 10वीं की परीक्षा की तैयारी के लिए उन्होंने खुद पढ़ाई की और पुराने प्रश्नपत्रों को हल कर फर्स्ट डिवीजन के साथ सफलता हासिल की.
31 साल के संतोष आचला, माओवादी संगठन में एरिया कमेटी मेंबर (ACM) के तौर पर काम करते थे. साल 2025 में उन्होंने आत्मसमर्पण के बाद फिर से पढ़ाई करने का फैसला लिया. काफी समय से शिक्षा से दूरी उनके लिए 10वीं की परीक्षा की तैयारी के सफर को आसान नहीं बना रही थी लेकिन फिर भी उन्होंने मेहनत की और कक्षा 10वीं की परीक्षा में सफलता हासिल की. उन्होंने बताया कि वो भविष्य में खेती और कारोबार से संबंधित क्षेत्र में जाना चाहते हैं.
32 साल के अर्जुन ओयाम के लिए भी फिर से पढ़ाई करने का सफर आसान नहीं था, उनके जीवन में बचपन से ही कई संघर्ष रहे. बीजापुर जिले के तोड़का गांव के रहने वाले अर्जुन का घर जला दिया गया था और उस समय उनकी सारी किताबें भी जल गई थीं. सलवा जुडूम के दौर में पूरे इलाके में माओवादी गतिविधियां काफी बढ़ गई और वो आगे पढ़ाई नहीं कर पाए. उसके बाद वो खुद साल 2010 में माओवादी संगठन का हिस्सा बन गए.
संगठन में रहते हुए उन्होंने माओवादियों के राजनीतिक स्कूल में शिक्षा हासिल की और दूसरे लोगों को हिंदी, गणित और पर्यावरण अध्ययन भी पढ़ाया. वो सरकारी स्कूल में शिक्षक के तौर पर पढ़ाना चाहते थे, मगर उन्हें गिरफ्तार होने का डर था इसलिए ऐसा नहीं कर पाए. हालांकि, आत्मसमर्पण के बाद उन्हें दोबारा पढ़ाई शुरू की और भविष्य में शिक्षक बनने के साथ अपने गांव लौटकर बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं.