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AI भी हुआ फेल... 99 साल की गणितज्ञ और 22 साल की भारतीय मूल की छात्रा ने कैसे सुलझाई एक सदी पुरानी ब्रेड थ्योरी?

99 साल के गणितज्ञ जोन बिरमन और 22 वर्षीय भारतीय मूल की गणितज्ञ वसुधा भरतराम ने 2026 में ब्रेड समूह से जुड़ी करीब एक सदी पुरानी गणितीय समस्या का समाधान किया. जानिए कैसे चार-धागों वाली ब्रेड की यह पहेली दशकों तक गणितज्ञों को उलझाए रही.

Written By Shivam Tiwari
Published: Sep 07, 2026, 11:42 AM IST | Updated: Sep 07, 2026, 12:06 PM IST
Image Credit: 99 साल की उम्र में किया वो काम, जो दशकों से अटका था
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कभी-कभी गणित की बड़ी पहेली किसी मुश्किल सवाल से नहीं, बल्कि एक छोटे से संदेह से शुरू होती है. इस बार मामला उन धागों जैसा है जिन्हें हम चोटी बनाते समय एक-दूसरे के ऊपर से घुमाते हैं. गणित में कई धागों को आपस में उलझाने से बनने वाली ऐसी संरचना को ब्रेड यानी चोटी जैसी आकृति कहा जाता है.

दशकों से गणितज्ञ यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि इन उलझे हुए धागों को जब संख्याओं की एक खास तालिका में बदला जाता है, तो क्या उनकी असली पहचान पूरी तरह सुरक्षित रहती है. तीन धागों और पांच या उससे ज्यादा धागों के मामले में जवाब मिल चुका था, लेकिन चार धागों वाला मामला लंबे समय से अटका था. जुलाई 2026 में शोधकर्ताओं ने इस पहेली का जवाब खोज लिया.

ब्रेड में आखिर ऐसा क्या खास है?

साधारण भाषा में समझें तो यहां ब्रेड का मतलब रोटी नहीं, बल्कि कई धागों को आपस में लपेटने से बनने वाली गणितीय आकृति है. किसी चोटी में धागे ऊपर-नीचे और दाएं-बाएं एक-दूसरे को पार करते हैं. गणितज्ञ इन सभी गतिविधियों को नियमों और समीकरणों के जरिए समझ सकते हैं.

1930 के दशक में जर्मन गणितज्ञ वर्नर बुराउ ने इन उलझी हुई धागों की संरचनाओं को संख्याओं की एक खास तालिका के रूप में समझने का तरीका विकसित किया. इस तालिका को मैट्रिक्स कहा जाता है. इसे आसान भाषा में संख्याओं को एक तय तरीके से सजाने वाली ग्रिड समझ सकते हैं.

इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या हर अलग ब्रेड की पहचान इस संख्यात्मक तालिका में भी अलग बनी रहती है. अगर दो अलग-अलग ब्रेड एक ही तालिका में बदल जाएं, तो इसका मतलब होगा कि ब्रेड की कुछ जानकारी बदलते समय खो गई. इसी सवाल को बुराउ की गणितीय विधि से जुड़ी बड़ी समस्या माना गया.

चार धागों वाला मामला इतना मुश्किल क्यों था?

गणितज्ञों ने धीरे-धीरे इस पहेली के अलग-अलग हिस्सों को सुलझाया. एक और दो धागों वाले मामलों में यह साबित हो चुका था कि संख्याओं की तालिका ब्रेड की पहचान को सही तरीके से बनाए रखती है. तीन धागों के मामले में भी यही बात साबित हो गई.

दूसरी तरफ पांच या उससे ज्यादा धागों के मामले में पता चला कि संख्याओं की तालिका ब्रेड की पूरी जानकारी नहीं बचा पाती. यानी अलग-अलग ब्रेड एक जैसी गणितीय तालिका दे सकती हैं.

ऐसे में चार धागों वाला मामला बीच में अटक गया. करीब एक सदी तक गणितज्ञ यह साबित नहीं कर पाए कि चार धागों के मामले में बुराउ की यह गणितीय विधि ब्रेड की पहचान को पूरी तरह सुरक्षित रखती है या नहीं. कई शोधकर्ताओं को लगता था कि शायद चार धागों में भी जानकारी खो जाती होगी. इसलिए वे ऐसी मिसाल खोज रहे थे, जिसमें दो अलग ब्रेड एक ही तालिका दें. लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली.

99 साल की गणितज्ञ और युवा शोधकर्ता कैसे साथ आए?

इस कहानी में जोन एस. बिरमन, वसुधा भरतराम और तारा ई. ब्रेंडल की साझेदारी सबसे खास रही. जुलाई 2026 में इन तीनों ने साबित किया कि चार धागों वाले मामले में बुराउ की गणितीय विधि ब्रेड की पहचान को पूरी तरह सुरक्षित रखती है.

जोन बिरमन लंबे समय से ब्रेड और टोपोलॉजी यानी आकृतियों और उनके आपसी संबंधों का अध्ययन करने के क्षेत्र में काम कर रही हैं. 1970 के दशक में उन्होंने Braids, Links, and Mapping Class Groups नाम की महत्वपूर्ण किताब लिखी थी. इस किताब ने इस समस्या को गणित की दुनिया में फिर से चर्चा में ला दिया.

युवा गणितज्ञ वसुधा भरतराम और तारा ब्रेंडल के साथ काम करते हुए बिरमन ने इस पुरानी समस्या को नए तरीके से देखा. तीनों ने मिलकर उस धारणा पर ही सवाल उठाया, जिसके कारण कई शोधकर्ता इतने वर्षों से गलत दिशा में समाधान खोज रहे थे.

AI से नहीं मिली मदद तो इंसानी सोच ने क्या किया?

इस गणितीय पहेली को हल करने की कोशिश में आधुनिक AI की भी मदद ली गई. साइंटिफिक अमेरिकन की रिपोर्ट के अनुसार, गणितज्ञ इमैनुएल ब्रेउलार्ड और ऑलेक्ज़ेंडर कोस्याक की टीम ने अलग-अलग AI चैटबॉट्स से समाधान खोजने की कोशिश की.

करीब छह महीने तक उन्होंने AI से अलग-अलग तरीकों से इस समस्या का जवाब निकालने की कोशिश की, लेकिन कोई सफल समाधान नहीं मिला. इसके बाद शोधकर्ताओं ने समस्या को देखने का तरीका बदला.

वसुधा भरतराम ने यह संभावना उठाई कि शायद चार धागों वाले मामले को ऐसा मानना ही गलत है जिसमें जानकारी खो जाती है. यानी हो सकता है कि अब तक गणितज्ञ जिस चीज को गलत मानकर चल रहे थे, वही असल में सही हो.

इसके बाद टीम ने पुराने ज्यामितीय तरीके को उलटी दिशा में इस्तेमाल किया. उनका लक्ष्य यह साबित करना था कि चार धागों में भी ब्रेड की पहचान पूरी तरह सुरक्षित रहती है. आखिरकार यही तरीका सफल रहा.

कागज पर बने बिंदुओं और गोल घेरों से कैसे समझें समाधान?

तारा ब्रेंडल ने इस प्रमाण को आसान तरीके से समझाने के लिए कागज का उदाहरण दिया. मान लीजिए कि एक कागज पर कई बिंदु बनाए गए हैं. अब इन बिंदुओं के चारों तरफ अलग-अलग तरह के गोल घेरे बना दिए जाते हैं.

इन बिंदुओं को ब्रेड के धागों की तरह समझ सकते हैं. वहीं, गोल घेरे इन धागों के बीच होने वाली अलग-अलग गतिविधियों को समझने में मदद करते हैं. इन घेरों के अंदर के हिस्सों से यह पता लगाया जा सकता है कि संबंधित संख्यात्मक तालिका कैसी होगी.

जितने ज्यादा धागे होंगे, उतने ही ज्यादा तरह के घेरे बनाए जा सकते हैं. इससे संभावनाएं भी बढ़ती जाती हैं. शोधकर्ताओं ने इन्हीं अलग-अलग संभावनाओं का अध्ययन किया और देखा कि क्या दो अलग आकृतियां एक ही गणितीय परिणाम दे सकती हैं.

अलग दिखने वाली ब्रेड एक जैसी क्यों लग सकती है?

शोधकर्ताओं ने पाया कि जैसे-जैसे धागों की संख्या बढ़ती है, अलग-अलग आकृतियों और घेरों की संख्या भी तेजी से बढ़ती है. ऐसे में यह संभावना बढ़ जाती है कि देखने में अलग लगने वाली दो संरचनाएं संख्याओं की तालिका में एक जैसा परिणाम दें.

यानी ब्रेड को संख्याओं में बदलते समय कुछ जानकारी गायब हो सकती है. पांच या उससे ज्यादा धागों में यही समस्या सामने आती है. लेकिन तीन धागों के मामले में संभावनाएं बहुत सीमित हैं. इसलिए वहां संख्याओं की तालिका ब्रेड की पहचान को सुरक्षित रखती है.

चार धागों में स्थिति थोड़ी कठिन है. यहां कई पेचीदा मामले सामने आते हैं, लेकिन शोधकर्ताओं ने सभी संभावनाओं को संभालते हुए साबित किया कि आखिर में जानकारी नहीं खोती. यानी चार धागों की ब्रेड के लिए भी संख्याओं की तालिका उसकी असली पहचान को बनाए रखती है.

चार धागों वाला मामला इतना खास क्यों रहा?

धागों की संख्याक्या स्थिति थीबुराउ की विधि का नतीजासरल भाषा में मतलब
1एक धागापहचान सुरक्षित संख्याओं की तालिका से ब्रेड की पहचान में कोई जानकारी नहीं खोती।
2दो धागेपहचान सुरक्षित अलग-अलग ब्रेड को उनकी गणितीय तालिका से पहचाना जा सकता है।
3तीन धागेपहचान सुरक्षित ब्रेड को संख्याओं में बदलने पर उसकी मूल पहचान बनी रहती है।
4चार धागेअब साबित हुआ लंबे समय तक यह मामला अनसुलझा था। जुलाई 2026 में साबित हुआ कि यहां भी पहचान सुरक्षित रहती है।
5+पांच या ज्यादा धागेजानकारी खो सकती है अलग दिखने वाली दो ब्रेड एक ही गणितीय तालिका दे सकती हैं।
खास बात: चार धागों वाला मामला तीन और पांच धागों के बीच का आखिरी बड़ा अनसुलझा मामला था। नए प्रमाण ने दिखाया कि चार धागों में भी बुराउ की गणितीय विधि ब्रेड की असली पहचान को सुरक्षित रखती है।

 

चार धागों वाला मामला इस पूरी पहेली का सबसे खास हिस्सा था. तीन धागों तक सब कुछ सही रहता है, जबकि पांच या उससे ज्यादा धागों में जानकारी खोने लगती है. लेकिन चार धागों में मामला बिल्कुल बीच का है.

तारा ब्रेंडल ने इसकी तुलना पानी के जमने से पहले होने वाले बदलाव से की. जैसे तापमान बदलने पर पानी एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाता है, वैसे ही ब्रेड में चार धागों का मामला एक महत्वपूर्ण मोड़ जैसा दिखाई देता है.

जोन बिरमन ने भी कहा कि उन्हें हैरानी है कि इस समाधान को इतना ध्यान मिल रहा है. कई गणितज्ञ लंबे समय से इस समस्या को हल करने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन उनमें से कई लोग यह मानकर चल रहे थे कि चार धागों में जरूर कोई ऐसी मिसाल मिलेगी, जहां जानकारी खो जाती है. इसी धारणा ने उन्हें सही दिशा से दूर रखा.

इस खोज का असली मतलब क्या है?

इस उपलब्धि का मतलब यह है कि करीब एक सदी से खुले पड़े चार धागों वाले मामले का जवाब अब मिल गया है. शोधकर्ताओं ने साबित किया कि इस मामले में बुराउ की गणितीय विधि ब्रेड की मूल पहचान को सुरक्षित रखती है.

इसका संबंध ग्रुप थ्योरी यानी गणितीय समूहों के नियमों के अध्ययन और नॉट थ्योरी यानी गांठों की गणित जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से है. शोध के अनुसार, इसका एक और महत्वपूर्ण नतीजा चार धागों वाले मामले में जोन्स की गणितीय विधि के सही रहने से जुड़ा है.

इस खोज की खास बात यह भी है कि समस्या करीब एक सदी पुरानी थी, लेकिन उसका समाधान किसी एक पुराने तरीके को दोहराकर नहीं मिला. असली बदलाव तब आया, जब शोधकर्ताओं ने यह सोचा कि शायद अब तक जिस बात को गलत माना जा रहा था, वही सही हो सकती है.

कागज पर बने बिंदुओं और घेरों से कैसे समझी गई यह पहेली?

तारा ब्रेंडल ने इस मुश्किल गणित को समझाने के लिए कागज और पेन का आसान उदाहरण दिया. मान लीजिए, एक कागज पर कई बिंदु बनाए गए हैं. अब इन बिंदुओं के आसपास अलग-अलग तरह के गोल घेरे बना दिए जाएं. यहां हर बिंदु को ब्रेड के एक धागे की तरह समझ सकते हैं. वहीं, गोल घेरे बताते हैं कि ये धागे किस तरह एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं. इन घेरों के अंदर बनने वाली अलग-अलग आकृतियों की मदद से गणितज्ञ मैट्रिक्स तैयार करते हैं. जैसे-जैसे धागों की संख्या बढ़ती है, वैसे-वैसे गोल घेरे बनाने के तरीके भी बढ़ जाते हैं. फिर गणितज्ञ देखते हैं कि अलग-अलग आकृतियां मैट्रिक्स पर क्या असर डालती हैं.

अलग दिखने वाली ब्रेड एक जैसी कैसे हो सकती है?

शोधकर्ताओं को पता चला कि जब धागों की संख्या बढ़ती है तो उन्हें अलग-अलग पहचानना भी मुश्किल होने लगता है. आसान भाषा में कहें तो देखने में दो ब्रेड बिल्कुल अलग हो सकती हैं, लेकिन उन्हें संख्याओं की तालिका में बदलने पर दोनों का जवाब एक जैसा आ सकता है. ऐसे में ब्रेड की कुछ जानकारी रास्ते में खो जाती है. पांच या उससे ज्यादा धागों वाली ब्रेड में यही समस्या देखने को मिलती है. लेकिन तीन धागों के मामले में ऐसी संभावना बहुत कम है. चार धागों में मामला थोड़ा पेचीदा जरूर है, लेकिन शोधकर्ताओं ने साबित कर दिया कि यहां भी ब्रेड की असली पहचान सुरक्षित रहती है.

चार धागों वाला मामला इतना खास क्यों था?

चार धागों वाला मामला इसलिए खास था क्योंकि यह तीन और पांच धागों के बीच का मामला था. तीन धागों में गणितज्ञ पहले ही साबित कर चुके थे कि ब्रेड की पहचान सुरक्षित रहती है. पांच या उससे ज्यादा धागों में यह साबित हो चुका था कि जानकारी खो सकती है. लेकिन चार धागों को लेकर कोई पक्का जवाब नहीं था. लंबे समय तक कई गणितज्ञों को लगता रहा कि शायद चार धागों में भी जानकारी खो जाएगी. इसलिए वे ऐसी मिसाल खोजते रहे, जो इसे गलत साबित कर सके. लेकिन ऐसी मिसाल नहीं मिली. आखिरकार शोधकर्ताओं ने सोच बदली और यह साबित किया कि चार धागों में भी मैट्रिक्स ब्रेड की असली पहचान को सुरक्षित रखता है.

इस खोज का विज्ञान में क्या महत्व है?

यह सिर्फ एक पुरानी गणित की पहेली का जवाब नहीं है. ब्रेड से जुड़ी इस तरह की गणित का इस्तेमाल विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में भी होता है. इसका संबंध प्रोटीन के मुड़ने और स्ट्रिंग थ्योरी जैसे विषयों से भी है. हालांकि इस खोज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि करीब एक सदी से चला आ रहा एक सवाल आखिरकार हल हो गया. इस काम में जोआन बिरमन, वसुधा भरतराम और तारा ब्रेंडल ने मिलकर काम किया. तीनों अलग-अलग जगहों से इस शोध पर काम कर रही थीं. जब उन्हें सफलता मिली तो उन्होंने कोई बड़ा जश्न नहीं मनाया. उनके लिए इतने लंबे समय से उलझी इस गणितीय पहेली का जवाब मिल जाना ही सबसे बड़ी खुशी थी.

 

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About the Author

शिवम तिवारी, जी न्यूज में डिजिटल कंटेंट राइटर हैं और पत्रकारिता में करीब 2 साल से अधिक का अनुभव रखते हैं. यूपी के प्रयागराज के रहने वाले शिवम ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया है. खबरों की नब्ज पकड़कर उन्हें आसान और साफ भाषा में पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं. शिवम शिक्षा और रोजगार से जुड़े विषयों पर खास फोकस रखते हैं. इनमें स्कूल-कॉलेज एडमिशन, बोर्ड परीक्षाएं, प्रवेश परीक्षाएं, सरकारी नौकरियां, रिजल्ट, कॉम्पिटिटिव एग्जाम, करियर टिप्स, करेंट अफेयर्स और जनरल नॉलेज जैसे टॉपिक्स शामिल हैं.इसके अलावा शिवम, टीचर्स, प्रोफेसर्स, एक्सपर्ट्स और करियर काउंसलर्स की सलाह के आधार पर कंटेंट तैयार करते हैं. ये IIT-JEE, NEET, GATE, CLAT और CUET जैसे नेशनल लेवल एंट्रेंस एग्जाम से जुड़े विषयों पर गहराई से काम करते हैं और छात्रों के लिए उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराते हैं. शिवम तिवारीर से संपर्क करने के लिए आप उन्हें shivam.tiwari@india.com पर ईमेल कर सकते हैं.
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