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Union Public Service Commission 100 Years: देश की सबसे प्रतिष्ठित भर्ती संस्थाओं में से एक संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने अपने 100 साल का ऐतिहासिक सफर पूरा कर लिया है. इस खास अवसर पर नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में दो दिवसीय 'मंथन' कार्यक्रम का आयोजन किया गया है. इस शताब्दी समारोह में सिर्फ आयोग के अब तक के सफर पर चर्चा नहीं हुई, बल्कि ये भी भी विचार किया गया कि बदलती तकनीक और प्रशासनिक जरूरतों के बीच आने वाले सालों की सिविल सेवा कैसी होनी चाहिए.
इस कार्यक्रम में देश के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, विषय विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं ने हिस्सा लिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस शताब्दी समारोह में शामिल होकर एक विशेष स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी करेंगे और देश को संबोधित करेंगे.
शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए UPSC के चेयरमैन अजय कुमार ने आयोग के भविष्य के लिए तीन सबसे महत्वपूर्ण आधार बताए जो भरोसा, पारदर्शिता और टेक्नोलॉजी है. उन्होंने स्पष्ट किया कि समय के साथ संस्थाओं के कार्य करने का तरीका बदल सकता है, लेकिन संवैधानिक जिम्मेदारियों और मूल सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं होना चाहिए. इसका मतलब है कि आने वाले समय में आयोग के सामने चुनौती सिर्फ नई AI और डिजिटल तकनीक को अपनाने की नहीं है, बल्कि तकनीक के साथ-साथ परीक्षा प्रक्रिया में निष्पक्षता और जन-विश्वास को बनाए रखने की भी होगी.
इस कार्यक्रम के पहले सत्र में 'विकसित भारत में अफसरों की भूमिका'’ विषय पर चर्चा हुई. UPSC सदस्य सुमन शर्मा की अध्यक्षता में हुए इस सत्र में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एनएस राजा सुब्रमणि, राज्यसभा सांसद और पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष संजय श्रीनेत शामिल हुए. कार्यक्रम के दौरान ये बात सामने आई कि प्रशासन की सफलता को सिर्फ सरकारी योजनाओं पर हुए खर्च से नहीं, बल्कि उन योजनाओं का आम लोगों की जिंदगी पर पड़ने वाले असर से भी देखा जाना चाहिए.
सुमन शर्मा ने प्रशासन में ऐसे सिस्टम की जरूरत बताई, जिसमें अधिकारी समस्याओं को टालने के बजाय उनके समाधान के लिए आगे बढ़कर काम करें. जनरल एनएस राजा सुब्रमणि ने अलग-अलग विभागों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत बताई. उन्होंने तेजी से बदलते माहौल में अधिकारियों से फैसले लेने और समस्याओं का व्यावहारिक समाधान खोजने की क्षमता विकसित करने पर जोर दिया.
मंथन में यूपीएससी के इतिहास और संवैधानिक भूमिका पर भी चर्चा हुई. उस दौरान अशोक लाहिड़ी ने बताया कि भारत में सरकारी नियुक्तियों की व्यवस्था लंबे समय में कई बदलावों से गुजरी. साल 1926 में लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई थी. इसके बाद 1937 में संघीय लोक सेवा आयोग की अवधारणा आई और संविधान लागू होने के बाद 1950 में यूपीएससी को संवैधानिक संस्था की स्थापना मिली. समय के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं, योग्यता आधारित चयन, निष्पक्षता और पारदर्शिता को सरकारी भर्ती व्यवस्था के प्रमुख आधारों के रूप में विकसित किया गया.
यूपीएससी के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कोई बिल्कुल नया बदलाव नहीं है. आयोग ने 1978 में कंप्यूटर का इस्तेमाल शुरू किया था. इसके बाद धीरे-धीरे परीक्षा और प्रशासन से जुड़े कामों में डिजिटल टेक्नोलॉजी का दायरा बढ़ता गया. इस साल 2026 में सिविल सर्विसेस प्रारम्भिक परीक्षा के लिए भुवनेश्वर, कानपुर और मेरठ में नए परीक्षा केंद्र जोड़े गए. इसके अलावा NDA & NA (II) परीक्षा के लिए हिसार, अलवर और किन्नौर में भी नए परीक्षा केंद्र बनाए गए.
ये ही नहीं, परीक्षा की प्रक्रिया में प्रोविजिनल आंसर की और QPRep Portal जैसे कदम भी शामिल किए गए हैं. आयोग ने बताया कि डिजिटल सिस्टम को मजबूत करने के साथ ही साइबर सुरक्षा पर भी काम किया जा रहा है. इसके अलावा यूपीएससी के अधिकारियों को AI जैसी टेक्नोलॉजी की भी ट्रेनिंग दी जा रही है. आयोग ने IT इंफ्रास्ट्रक्चर और साइबर सिक्योरिटी से जुड़े मामलों के लिए हाई-लेवल नेटवर्क कमेटी भी बनाई गई है.
जानकारी के लिए बता दें कि यूपीएससी सिर्फ आईएएस-आईपीएस भर्ती करने का काम नहीं करता, बल्कि इसकी जिम्मेदारियां हर जगह व्यापक हैं. आयोग द्वारा सरकार भर्ती नियमों, पदोन्नति, विभागीय पदोन्नति समितियों, अखिल भारतीय सेवाओं में विशिष्ट और विशिष्ट मामलों में भी सलाह दिया जाता है. साल 2023-24 के दौरान आयोग ने प्रमोशन से जुड़े 24,581 अधिकारियों के रिकॉर्ड पर काम किया था. उस दौरान अखिल भारतीय सेवाओं में 532 अधिकारियों को शामिल किया गया था.