अमेरिका टैरिफ वसूलेगा तो अब चुप नहीं रहेगा भारत! तीखे बयान से दे दिया संकेत, जानिए यूएस को कैसे घुटने पर लाएगा India
Impact of Trump Tariffs on India: अगर अमेरिका भारत से आयात होने वाले सामान पर 100 प्रतिशत टैरिफ वसूलेगा तो क्या अबकी बार भारत ने उसे जवाब देने का मन बना लिया है. क्या वह उसके साथ सारे रिश्ते तोड़ देगा. आपको टैरिफ पर ट्रंप को दिए भारत के अल्टीमेटम के मायने समझने चाहिए.
How India Respond to Trump Tariffs? संविधान निर्माता डॉ भीम राव आंबेडकर कहा करते थे, सहनशीलता की एक सीमा होती है, उसके बाद प्रतिरोध ही एकमात्र धर्म बन जाता है. डॉनल्ड ट्रंप की बार-बार धमकी और टैरिफ वाली दादागीरी के सामने भारत की सहनशीलता जवाब दे गई. इस बार नई दिल्ली का पलटवार जितना जोरदार है, उसकी उम्मीद व्हाइट हाउस ने नहीं की होगी. आज आप जानेंगे, कैसे भारत ने अमेरिका और प्रेसिडेंट ट्रंप के लिए नई लक्ष्मण रेखा खींच दी है. इस रेखा को पार करने का मतलब होगा कि भारत अब यूएस से दूरी बनाने में कोई संकोच नहीं करेगा.
भारत को चेतावनी देने की जरूरत क्यों पड़ी?
आज आपको भारत की इस चेतावनी का मतलब समझना चाहिए. ये भी जानना चाहिए कि चेतावनी देने की जरूरत क्यों पड़ी? अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बुधवार को वो बिल पास हो गया, जिससे ट्रंप को रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की शक्तियां मिल गईं. इस बिल के पास होते ही अमेरिका के सीनेटर्स ने रूस से तेल खरीदने पर भारत और चीन को धमकाना शुरू कर दिया है . लेकिन इस बार अमेरिका की संसद में पास हुए बिल से ज्यादा इस पर भारत की सख्त प्रतिक्रिया दुनिया की सुर्खियां बनी हैं.
भारत ने इस बिल पर अमेरिका को सख्त चेतावनी दी है. अमेरिका को अल्टीमेटम दिया है. टैरिफ की वजह से भारत और अमेरिका के रिश्तों पर बुरा असर पड़ सकता है. आज आपको समझना चाहिए ट्रंप के 100 प्रतिशत टैरिफ वाले बिल पर भारत इतना ज्यादा क्यों भड़का और अमेरिका के संभावित टैरिफ प्लान ने निपटने की भारत ने क्या तैयारी की है.
अमेरिका सिर्फ टैरिफ से नहीं अपनी आर्थिक नीतियों से दुनिया भर में महंगाई बढ़ाने की तैयारी कर रहा है. अमेरिका के केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों को बढ़ाने का ऐलान किया है. आज आपको जानना चाहिए इसका पूरी दुनिया पर और खुद आप पर क्या असर पड़ सकता है.
अमेरिका की युद्धनीति ने भी दुनिया के कई मुल्कों की हालत खराब कर दी है. इंडोनेशिया, इटली, सीरिया, पोलैंड और पाकिस्तान से लेकर खुद अमेरिका में लोग तेल की कीमत बढ़ने से परेशान हैं. आपको जानना चाहिए कि भारत इस चुनौती से कैसे निपट रहा है. सबसे पहले आप समझिए कि भारत ने ट्रंप के टैरिफ बिल पर अमेरिका को क्या अल्टीमेटम दिया.
रूस से दोस्ती का भुगत रहा खामियाजा
अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ जो बिल पास किया है. उसे आधिकारिक तौर पर लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 नाम दिया गया है. अमेरिकी संसद में इसके पक्ष में 262 और विरोध में 159 वोट पड़े.
बड़ी संख्या में अमेरिका की विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने इस बिल का विरोध भी किया. उनका तर्क था कि यह बिल राष्ट्रपति ट्रंप को अत्यधिक और अनियंत्रित 'टैरिफ अधिकार' दे देगा. जिसका दुरुपयोग अमेरिकी राष्ट्रपति दूसरे देशों के खिलाफ कर सकते हैं. अमेरिका में इस बिल के विरोधियों ने इसकी तुलना ट्रोजन हॉर्स से की.
यानी इससे रूस पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन अमेरिकी नागरिकों पर महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ जाएगा. लेकिन इस बिल के समर्थन में अमेरिका के लगभग 50 विपक्षी सांसदों ने पार्टी लाइन से अलग हटकर भी वोट दिया है यानी बिल के समर्थन में वोट किया है.
डॉनल्ड ट्रंप के साइन के बाद ये बिल कानून बन जाएगा. इसका मतलब इस बिल का कानून बनना अब सिर्फ औपचारिकता है. अब ट्रंप को रूस से अधिक तेल खरीदने वाले भारत समेत 5 देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की ताकत मिल गई है. अभी ट्रंप ने भारत पर टैरिफ लगाने का कोई फैसला नहीं किया है. लेकिन बिल के पास होते ही अमेरिकी सीनेटर भारत और चीन को धमका रहे हैं.
बिल पास हुआ तो भारत को धमकाने लगा सीनेटर
अमेरिका में बिल पास होने के बाद वरिष्ठ सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल के हौसले काफी बुलंद हैं. ये सीधे रूस, चीन और भारत को धमका रहे हैं. वे भारत को अल्टीमेटम दे रहे हैं कि अपना तेल कहीं और से खरीदो. ये बिल पास होने के बाद इनको लग रहा है कि अब डोनाल्ड ट्रंप तय करेंगे कि भारत किस देश से कितना तेल खरीदेगा और किस देश से तेल नहीं खरीदेगा.
सोचिए, अमेरिका का एक सीनेटर चीन को धमका रहा है. वो भारत को बता रहा है कि रूस से तेल खरीदकर वो अपना काम ठीक ढंग से नहीं कर रहा है. हालांकि भारत के विदेश मंत्रालय के बयान ने अमेरिका के इस सीनेटर का सारा जोश ठंडा कर दिया. आज आपको भी इस बिल पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया जाननी चाहिए.
भारत सरकार ने अमेरिका की संसद में पास हुए इस बिल का संज्ञान लिया है. इसके बाद विदेश मंत्रालय ने बाकायदा एक आधिकारिक बयान भी जारी किया है. इस बयान में भारत ने साफ कर दिया कि वह अपने 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. यह भी कहा कि ऊर्जा की जरूरतें किसी बाहरी दबाव में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित और बदलती बाजार स्थितियों के आधार पर तय होंगी.
भारत ने यह भी कहा कि अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर हुई बैठकों में इस बात को बहुत स्पष्ट कर दिया गया था कि इस तरह के प्रतिबंधों का द्विपक्षीय संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. यानी भारत ने साफ कर दिया है उस पर अमेरिका की तरफ से उच्च टैरिफ लगाए गए तो दोनों देशों के संबंध बिगड़ सकते हैं.
इस बार क्यों बदले हुए हैं भारत के सुर?
भारत ने अमेरिका को ये संदेश भी दिया है कि अगर रूस से तेल खरीदने पर पाबंदी लगाई गई तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. यानी दुनिया में तेल के दाम और बढ़ सकते हैं. भारत ने इस बार साफ कर दिया है वो अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने को तैयार है. इस दिशा में घरेलू व्यापार व उद्योग संगठनों के साथ मिलकर काम किया जाएगा. यानी भारत ने अमेरिका के संभावित टैरिफ से निपटने की तैयारी भी शुरू कर दी है.
भारत का रुख बता रहा है कि भले ही अमेरिका की संसद में रूस से तेल खरीदने वाले टॉप 5 देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ वाला बिल पास हो गया हो. लेकिन इसका भारत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. भारत अपने ऊर्जा हितों को ध्यान में रखते हुए रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा. भारत ने इस बिल पर प्रतिक्रिया देते हुए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया है. उसे पश्चिमी और मिडिल ईस्ट की मीडिया अमेरिका को भारत की वार्निंग यानी चेतावनी कह रही है.
यानी दुनिया भी इस बात को समझ रही है कि भारत पर अमेरिकी टैरिफ थोपा गया तो इस बार प्रतिक्रिया अलग हो सकती है. अब तक भारत, अमेरिका के साथ विवाद को बढ़ाने का पक्षधर नहीं रहा है . लेकिन इस बार भारत का रुख अलग है. आज आपको भारत के इस बदले रूख की वजह भी समझनी चाहिए.
भारत का रुख इस बार इसलिए भी कड़ा है क्योंकि अमेरिका-ईरान संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट के बाधित होने के कारण रूसी क्रूड अब केवल सस्ते तेल का विकल्प नहीं, बल्कि भारत के लिए ऊर्जा की जीवनरेखा बन चुका है. सप्लाई संकट के चलते जुलाई में भारतीय क्रूड आयात में रूस की हिस्सेदारी बढ़कर रिकॉर्ड 51% हो गई.
रूस से तेल खरीद विकल्प नहीं बल्कि जरूरत
इस दौरान भारत ने रूस से लगभग 25 लाख बैरल प्रतिदिन तेल खरीदा. अभी भी भारत रूस से जरूरत का 40 प्रतिशत तेल खरीद रहा है. इससे पहले फरवरी 2026 में अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीदने पर लगाया गया अतिरिक्त 25% टैरिफ हटा दिया था. उस वक्त अमेरिका ने भारत के सामने रूस से तेल खरीदना कम करने की शर्त रखी थी.
लेकिन मिडिल ईस्ट के संकट की वजह से अब रूस के तेल खरीदना भारत के लिए विकल्प नहीं जरूरत है. इस वक्त मिडिल ईस्ट पर ऊर्जा के लिए निर्भर देशों की तेल और गैस की कमी से हालत खराब है.
अब आपको समझना चाहिए कि भारत के पास अमेरिका टैरिफ का जवाब देने के क्या विकल्प हैं. साथ ही, रूस से तेल खरीदना क्यों भारत के ऊर्जा हितों के लिए जरूरी है. भारत अब अमेरिकी टैरिफ से निपटने के लिए रूस के अलावा मिडिल ईस्ट, वेनेजुएला और अफ्रीकी देशों से तेल आयात के विकल्पों पर विचार कर सकता है. लेकिन इससे भारत के तेल का बिल बढ़ जाएगा क्योंकि अमेरिका से तेल मंगवाना महंगा है.
इसके अलावा भारत, अब अमेरिकी उत्पादों पर अपने यहां टैरिफ की समीक्षा कर सकता है. यानी भारत जवाबी कार्रवाई के तहत अमेरिका से आने वाले सामानों पर आयात शुल्क बढ़ाने का विचार कर सकता है. भारत अब अमेरिका के साथ चल रही दूसरी व्यापारिक वार्ताओं में इसका उपयोग एक दबाव के हथियार के रूप में कर सकता है.
SWIFT से बचने का कर लिया है इंतजाम
पश्चिमी देशों के वित्तीय तंत्र जैसे SWIFT से बचने के लिए भारत स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देकर तेल भुगतान के वैकल्पिक रास्ते तलाश कर सकता है. इसके अलावा विकासशील देशों और ब्रिक्स जैसे मंचों पर एकतरफा अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ नीतियों के खिलाफ वैश्विक जनमत तैयार कर सकता है.
एक बड़ी सच्चाई ये भी है. भारत और चीन जैसे बड़े देश अचानक बाजार से रूसी तेल खरीदना बंद कर देंगे, तो मिडिल ईस्ट में युद्ध की वजह से वैश्विक बाजार में क्रूड ऑयल की भारी किल्लत पैदा हो जाएगी. इससे दुनिया में तेल के दाम बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगे. इसके अलावा भारत, अमेरिका को 8 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा कीमत की चीजें निर्यात करता है. यानी अमेरिका में भारत से इतनी कीमत की दवाइयां, मेडिकल उपकरण, कपड़े, ज्वैलरी, और पेट्रोलियम उत्पाद जैसे चीजों की सप्लाई होती है.
इसका मतलब साफ है कि भारत पर 100% टैरिफ लगाने से केवल भारत प्रभावित नहीं होगा, खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वहां के उपभोक्ताओं पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा. भारत इस तर्क को कूटनीतिक बैठकों में मजबूती से रख सकता है. जब अमेरिका में इस बिल पर चर्चा हो रही थी तब खुद अमेरिका के सांसदों ने ये बात स्वीकार की थी. अमेरिकी सदन में चर्चा के दौरान कहा गया कि ट्रंप, भारत और चीन जैसे देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन इसका सीधा असर अमेरिका की जनता पर भी पड़ेगा.
अमेरिका की संसद में विपक्षी सांसदों ने जो कुछ कहा. इसकी गवाही अमेरिका का केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व भी दे रहा है. इस वक्त अमेरिकी नागरिक खुद महंगाई की मार झेल रहे हैं. महंगाई अभी भी तय लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है. अमेरिकी केंद्रीय बैंक चाहता था कि देश में महंगाई की दर करीब 2% के आसपास रहे. लेकिन महंगाई दर बढ़कर 3.4% पर पहुंच गई. अमेरिका में डीजल की कीमतें 6 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर चली गई थीं और इसमें सालाना आधार पर करीब 70% की भारी बढ़ोतरी हुई थी, जिससे घरेलू महंगाई का दबाव और बढ़ गया.
बढ़ती महंगाई से अमेरिकी जनता परेशान
इसी महंगाई को काबू में रखने के लिए फेडरल रिजर्व को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ी हैं. जिस तरह भारत का केंद्रीय बैंक आरबीआई यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया है वैसे ही अमेरिका का केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व है, जो महंगाई कम करने के लिए ऐसे कदम उठाता है.
महंगाई को नियंत्रित करने और उसे नीचे लाने के लिए, अमेरिका के केंद्रीय बैंक ने सर्वसम्मति से ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट्स यानी 0.25% की बढ़ोतरी कर दी. जिससे अमेरिका में ब्याज दरें बढ़कर 3.75% से 4 % हो गईं.
अमेरिका में 2023 के बाद पहली बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी की गई है. फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को साल के अंत तक और बढ़ाने का संकेत दिया है. यानी अमेरिका में लोन लेना और महंगा होगा.
जब लोन महंगे होते हैं और लोगों की ईएमआई बढ़ती है, तो आम नागरिक और कंपनियां अनावश्यक खर्च कम कर देती हैं. इससे बाजार में मांग घटती है जो महंगाई को काबू करने में मदद करती है. यानी अमेरिका अपने लोगों की खरीदने की क्षमता को प्रभावित करके महंगाई कम करना चाहता है.
सोचिए ऐसे हालात में अमेरिका ने भारत और चीन जैसे देशों पर टैरिफ लगाया तो अमेरिका में महंगाई कितनी बढ़ सकती है. मतलब साफ है कि ट्रंप को भले ही रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की ताकत मिल गई है, लेकिन भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का फैसला करना उनके लिए आसान नहीं होगा . वैसे फेडरल रिजर्व के अमेरिका में ब्याज दर बढ़ाने के फैसले का असर भारत और दुनिया के दूसरे देशों पर भी पड़ेगा.
अमेरिका में ब्याज दरों के बढ़ने से अमेरिकी बॉन्ड का रिटर्न बढ़ जाएगा. जिससे दुनिया भर के बाजारों से पैसा निकलकर अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड की तरफ जाने लगता है. मजबूत डॉलर के कारण दुनिया के अन्य देशों की मुद्राएं कमजोर होने लगती हैं, जिससे उनके लिए विदेशी कर्ज चुकाना और आयात करना महंगा हो जाता है.
डॉलर मजबूत होने से रुपया हुआ कमजोर
जिस वक्त वैश्विक बाजार में तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा हो और साथ में डॉलर भी मजबूत हो. ऐसे में तेल आयात करने वाले देशों को अपनी स्थानीय मुद्रा में ईंधन के लिए बहुत ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है. गुरुवार को अमेरिका में ब्याज दरों के बढ़ने की वजह से भारतीय रुपया भी कमजोर होकर 96 रुपये के पार चला गया.
भारत भी इस समय मजबूत डॉलर, महंगे क्रूड ऑयल और घरेलू महंगाई में तेजी का सामना कर रहा है. ऐसे में भारत का केंद्रीय बैंक आरबीआई घरेलू महंगाई और रुपये पर दबाव को रोकने के लिए रेपो रेट बढ़ाने का फैसला करता है. जिसकी आशंका एसबीआई की रिसर्च में जाहिर की गई है. तो आम जनता के होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन की ईएमआई बढ़ सकती है.
यानी अमेरिका में जो कुछ चल रहा है. उसका सीधा असर आप पर भी पड़ सकता है और रूस से सस्ता तेल खरीदकर भारत ऐसी स्थिति से बचने का प्रयास कर रहा है. अमेरिका की आर्थिक नीतियों, टैरिफ की धमकियों और ईरान से युद्ध की वजह से कई देश तेल की कमी और अर्थव्यवस्था में दबाव से जूझ रहे हैं. ऐसे देशों की लिस्ट लंबी होती जा रही है.
सीरिया की सड़कों पर आग लगी है. इस बार यहां संघर्ष दो गुटों के बीच नहीं हो रहा. सरकार के खिलाफ हो रहा है. सीरिया की सरकार ने ईंधन संकट और आयात लागत बढ़ने का हवाला देते हुए पेट्रोल, डीजल और खाना पकाने वाली गैस की कीमतों में एक साथ 40 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी कर दी है. जिसके फौरन बाद देश के कई बड़े शहरों में हिंसक और व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए.
इन देशों में बढ़ी महंगाई से भड़की आग
गुस्साए लोगों ने सड़कों पर टायर जलाकर और रास्ते जाम करके सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया. सीरिया की लगभग 90 प्रतिशत आबादी पहले से ही भीषण गरीबी और जीवनयापन के संकट से जूझ रही है. ऐसे में ऊर्जा की कीमतें बढ़ने से आम जनता का जीना मुहाल हो गया है.
सीरिया में आग लगी है तो इंडोनेशिया में लाइन लगी है. सड़कों पर भीड़ का ये ड्रोन शॉट किसी नेता की रैली या जुलूस का नहीं..ये लोग पेट्रोल के लिए कतार में खड़े हैं. लाइनें इतनी लंबी है और पेट्रोल मिलने में इतना वक्त लग रहा है कि लोग इत्मिनान से रोड पर खेल रहे हैं.
इंडोनेशिया के कई क्षेत्रों विशेषकर सुलावेसी प्रांत और जावा के योग्याकार्ता क्षेत्र में पेट्रोल और खाना पकाने वाली गैस की भारी किल्लत देखी जा रही है. एक एक सिलेंडर के लिए संघर्ष हो रहा है. कई जगहों पर पेट्रोल की राशनिंग शुरू करनी पड़ी है, जिससे पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों की लंबी-लंबी कतारें लग गई हैं.
इंडोनेशिया सरकार पहले से ही ईंधन पर भारी सब्सिडी देती है. वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने के कारण सरकार पर सब्सिडी का वित्तीय बोझ बहुत ज्यादा बढ़ गया है. जिससे अर्थव्यवस्था दबाव में आ गई है.
सीरिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में बढ़ रही परेशानी की जड़ में भी अमेरिका है. अमेरिका ईरान युद्ध की वजह से तेल सप्लाई रूट प्रभावित हुए हैं. जिससे तेल महंगा हुआ है. ब्रेंट क्रूड के दाम 103 से 105 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रहे हैं. जो युद्ध के नए सिरे से भड़कने और हमलों के कारण बढ़े हैं. इस वक्त स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और बॉब अल मंदेब का रूट प्रभावित है. जिससे वैश्विक ऊर्जा सप्लाई को बड़ा झटका लगा है. और इन रास्तों से सप्लाई पर निर्भर देशों में तेल संकट बढ़ गया है.
पाकिस्तान में भी बिगड़ रहे हैं हालात
ये हाल सिर्फ सीरिया और इंडोनेशिया जैसे देशों का नहीं है. अमेरिका और ईरान के बीच समझौता करवाने का दावा करने वाले पाकिस्तान के हालात भी काफी खराब हैं. दुनिया में तेल संकट के कारण पाकिस्तान ने ईंधन बचाने और बढ़ते खर्चों पर लगाम लगाने के लिए कड़े किफायती उपायों की घोषणा की है.
पाकिस्तान में सरकारी वाहनों के लिए मिलने वाले ईंधन में कटौती कर दी गई है. सरकारी स्तर पर नई गाड़ियां खरीदने पर रोक लगा दी गई है. अधिकारियों के विदेशी दौरों और आधिकारिक डिनर पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है.
आईटी उपकरणों की खरीद को छोड़कर सरकार द्वारा किसी भी खरीद पर रोक है और सभी बैठकें अब टेलीकॉन्फ्रेंसिंग के जरिए करने को कहा गया है. मतलब नेताओं और अधिकारियों के वाहनों के तेल की भी कटौती कर दी गई है. बढ़ते दामों से राहत देने के लिए पाकिस्तान सरकार ने बुधवार से एक नई नीति शुरू की है.
इसके तहत मोटरसाइकिल, रिक्शा और 800cc तक की छोटी गाड़ियों के मालिकों को एक तय मासिक कोटे पर 100 रुपये प्रति लीटर की सब्सिडी दी जा रही है. लेकिन इसमें भी भ्रष्टाचार होने से पाकिस्तान में लोग परेशान हैं.
बांग्लादेश में फैक्ट्रियों में काम हुआ ठप
खाड़ी संघर्ष के कारण पाकिस्तान में एलएनजी की सप्लाई बाधित हो रही है और पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे पाकिस्तान को आने वाले समय में गैस और बिजली की भारी किल्लत का सामना करना पड़ सकता है. इस साल यह दूसरी बार है जब पाकिस्तान को इस तरह के आपातकालीन कदम उठाने पड़े हैं इससे पहले मार्च में भी स्कूल बंद करने और वर्क फ्रॉम होम जैसे उपाय किए गए थे.
बांग्लादेश में गैस और बिजली की कमी से कपड़ा फैक्ट्रियों का काम प्रभावित हुआ है. श्रीलंका में सरकार इस उलझन में है कि ईंधन की कीमत बढ़ाए या सब्सिडी देकर लोगों को राहत दे. पुर्तगाल और इटली जैसे यूरोपीय देशों में भी तेल संकट खड़ा हो गया है. अगर ट्रंप भारत और चीन जैसे सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देशों को रूस से तेल खरीदने से रोकेंगे तो ये संकट बेकाबू हो सकता है. यही वजह है कि भारत ट्रंप टैरिफ के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं.