ब्रिक्स का मेन्यू या बालाघाट, चर्चा किस पर जरूरी है? थाली के विवाद में क्यों दब गई 32 मासूमों की मौत की चीख, उजड़ गए कई परिवार
Balaghat Children Deaths News: ब्रिक्स का मेन्यू या बालाघाट, चर्चा किस पर जरूरी है? कांग्रेस जहां ब्रिक्स समिट में मांसाहारी भोजन न देने पर सवाल उठा रही है. वहीं मध्य प्रदेश के बालाघाट में 32 मासूमों की जान चली गई है और सिस्टम अपनी मस्ती में चल रहा है.
Balaghat Children Deaths Ground Report: जिस देश के एक हिस्से में बच्चे भूख से मर रहे हों. गंदा पानी पीकर मर रहे हों, रहस्यमयी बीमारियों से मर रहे हों. वो देश अपने नेताओं से ये उम्मीद नहीं करता कि वो एसी में बैठकर BRICS के MENU पर चर्चा करेंगे. देश में पिछले 24 घंटे से दिल्ली BRICS सम्मेलन के MENU पर चर्चा हो रही है. शाकाहारी और मांसाहारी वाला विवाद ट्रेंड कर रहा है. मुद्दा बनाया जा रहा है कि समिट में आए विदेशी मेहमानों को शाकाहारी भोजन क्यों परोसा गया. उनकी पसंद के मुताबिक मांसाहारी भोजन क्यों नहीं सर्व किया गया. लेकिन हम आज देश भर के सियासतदानों से सिस्टम से ये पूछना चाहते हैं, देश के लिए ब्रिक्स के MENU पर चर्चा जरूरी है या बालाघाट पर? उस बालाघाट पर, जहां 'कुपोषण' इंसान बनकर घर-घर में रह रहा है. जहां पिछले तीन महीने में 32 बच्चे मर गए.
बालाघाट में कैसे हो गई 32 बच्चों की मौत
दिल्ली में शाकाहारी-मांसाहारी भोजन की चर्चा करनेवाले उन लोगों को भूल गए या जानबूझ कर अनदेखा कर दिया जिनकी थाली में दो वक्त की रोटी नहीं है. जी हां, जिनके पास इतना अनाज नहीं है कि दो वक्त भोजन कर सकें. आज हम इन्हीं भारतवासियों की कहानी आपसे साझा कर रहे हैं. इसलिए आपसे आग्रह है कि बहुत गंभीरता से आज आप उस ट्रेजिडी को सुनिए और समझिए जो शाकाहारी और मांसाहारी वाली थाली के विवाद में दब गई है.
दिल्ली से करीब 1100 किलोमीटर दूर है बालाघाट. मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल इस इलाके में 32 बच्चों की असमय मृत्यु हो गई. जी हां, 32 नौनिहाल असमय काल के गाल में समा गए हैं. सिर्फ इतना ही नहीं 65 से ज्यादा बच्चे अस्पताल में भर्ती हैं. उनका इलाज चल रहा है. 500 से ज्यादा मासूमों का इलाज हो चुका है. सरकारी फाइल में ये इसी साल यानी 2026 का आंकड़ा है. जिन घरों में मामूस बच्चे अकाल मृत्यु का शिकार हो गए, क्या उनके लिए शाकाहारी-मांसाहारी वाले विमर्श का कोई अर्थ है. बिल्कुल नहीं है. उनके दुख से सामने ये बहस निरर्थक है.
ये मौतें बालाघाट के बोंडरी, कोण्डेकसा, मातला, अंदोरी और कोरका गांव में हुई हैं. इसी क्षेत्र के कई बच्चे इस वक्त अस्पताल में भर्ती हैं. 15 बच्चे तो पिछले 24 घंटे में भर्ती हुए हैं. लेकिन सवाल ये है कि आखिर कौन सी बीमारी इन बच्चों की जान ले रही है या फिर इन्हें अस्पताल पहुंचा रही है.
डॉक्टरों ने बताई मौत की अजीब वजहें
सोचिए 32 बच्चों की मौत हो गई. लेकिन बीमारी के नाम पर लक्षण लिखा है कि बच्चे को बुखार था, चेहरे पर दाने थे और तो और लिखा है कि बच्चे की गर्दन टेढ़ी थी. सोचिए, क्या किसी बच्चे की मृत्यु का कारण गला टेढ़ा होना हो सकता है. दो बच्चों की मृत्यु की वजह मलेरिया बताई गई है. लेकिन बाकी बच्चों की अकाल मृत्यु कैसे हुई इसकी वजह भी नहीं बताई गई है.
सोचिए, ये कैसा सिस्टम है जो पता ही नहीं लगा पाया कि बच्चे किस बीमारी के कारण काल के गाल में समा गए. रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रभावित गांवों में एक सर्वे कराया गया था. इस सर्वे की रिपोर्ट में भी मासूमों की मौत किस बीमारी से हुई, ये साफ नहीं हुआ. प्रभावित बच्चों में बुखार, शरीर पर चकत्ते और अन्य गंभीर लक्षणों के कारण बताए गए. वहीं एक अन्य रिपोर्ट में चिकनपॉक्स और मलेरिया को 8 बच्चों की मौत से जोड़ा गया. लेकिन इस रिपोर्ट में भी यह नहीं बताया गया कि मृत बच्चों में कितनों की मौत किस बीमारी से हुई. इसकी जानकारी साफ नहीं हो पाई है.
जिस इलाके में एक के बाद एक 32 बच्चों की मौत हो गई. उस इलाके के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के सिविल सर्जन ही कह रहे हैं कि कोई खास बीमारी नहीं है. ये कितनी क्रूरता है. घरवालों को जानकारी भी नहीं है कि किस बीमारी ने उनके बच्चों की जान ले ली. सिस्टम के पास कोई जवाब नहीं है. इसीलिए जी न्यूज की टीम ने खुद ही इन गांवों में जाने का फैसला किया ताकि ये पता चल सके कि इन बच्चों को हुआ क्या था. हमारे संवाददाता प्रमोद शर्मा ने पीड़ित परिवारों से बात की. इस गांव में रहने वाले लोगों से बात की. इसके बाद जो डराने वाली तस्वीर सामने आई, उसे आपको ग्राउंड रिपोर्ट में जरूर जानना चाहिए.
खसरे की डोज के बावजूद कैसे चली गई जान?
अपने बच्चों को खोने वाले परिवार बता रहे हैं कि बच्चों की जान मीजल्स यानी खसरा और चिकनपॉक्स जैसी बीमारियों से हुई है. जानते हैं प्रभावित इलाके में पहले भी खसरा और चिकनपॉक्स जैसी बीमारियों की शिकायत मिलती रही है. ऐसी बीमारियों को कंट्रोल करने के लिए सरकारी योजना के तहत बच्चों को MR vaccine की दो खुराकें दी जाती हैं.
वैक्सीन की पहली डोज 9 से 11 महीने और दूसरी डोज 16 से 23 महीने की उम्र में दी जाती है. वैक्सीन की एक डोज बच्चे को 100 प्रतिशत सुरक्षा नहीं देती है. CDC के अनुसार measles-containing vaccine की एक डोज लगभग 93 प्रतिशत और दो डोज लगभग 97 प्रतिशत सुरक्षा देती है. जिन बच्चों को खसरा से बचाने वाली वैक्सीन की दो डोज लगाई जाती है, उन्हें खसरा हो ये बहुत दुर्लभ होता है.
CMHO शत्रुघन दहिया ने कहा यदि मीजल्स का टीका भले ही एक लगाया है तो मौत की संभावना न के बराबर होती है. हो सकता है टीकारण में खामी रही हो, जिसकी जांच की जाएगी.
डोज लगी नहीं, रिपोर्ट में चढ़ा दी गई
डॉ शत्रुघ्न दहिया का दावा है कि अगर एक टीका भी लगा है तो मौत नहीं होनी चाहिए. लेकिन बालाघाट में लोगों का दावा है कि एक टीका लगने के बावजूद कई बच्चों की मौत हुई है. इसलिए ये सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या बच्चों को वैक्सीन लगाई गई थी. ये सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि एक बच्चे के बारे में आंगनवाड़ी रजिस्टर में दर्ज है कि उसे अप्रैल 2026 में MR vaccine की डोज दी गई थी.
परिवार का आरोप है कि मासूम को वैक्सीन की डोज दी ही नहीं गई. हैरान करने वाला सच ये भी है कि यहां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की नियुक्ति टीकाकरण की तारीख बाद में हई थी. वो भी बता नहीं पाई कि बच्चे को पहली डोज लगी थी या नहीं.
जिन पांच गांवों में मासूम बच्चों की अकाल मृत्यु हुई है उनमें से कुछ गांव बैगा आदिवासियों के हैं. हम आपको बैगा आदिवासियों के बारे में भी बताएंगे. लेकिन जरा सोचिये उस परिवार पर क्या बीत रही होगी जिसने एक साथ अपनी दो दो संतानें खो दीं.
सरकारी महकमे ने तो एक लिस्ट बना दी. उसमें 32 नाम दर्ज कर दिया. एक फाइल तैयार हो गई. जो नाम इस फाइल में दर्ज हैं वो किसी की उम्मीद थे, किसी के घर के चिराग थे, किसी के जिगर के टुकड़े थे. अब वो सिर्फ एक फाइल नंबर, एक पन्ने में दर्ज नाम बनकर रह गए हैं.
देश में बैंगा आदिवासियों की आबादी 5 लाख
जिन 32 बच्चों की अकाल मृत्यु हुई है उनमें से कुछ आदिवासियों की बैगा जनजाति समूह से संबंध रखते हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार देश में बैगा आदिवासी समूह की कुल आबादी लगभग 5 लाख 5 हजार है. इसमें से करीब 4 लाख 14 हजार मध्य प्रदेश में रहते हैं. करीब 89 हजार छत्तीसगढ़ में और बाकी उत्तर प्रदेश तथा अन्य राज्यों में रहते हैं.
बैगा जनजाति को भारत सरकार ने विशेष पिछड़ी जनजाति की श्रेणी में रखा है. सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ापन और घटती जनसंख्या के कारण इन्हें विशेष श्रेणी में रखा गया है. देश की कुल 75 जनजातियां इस श्रेणी में आती हैं.
विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा मिलने के कारण इन्हें विशेष सरकारी सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए. इन्हें पक्का घर, साफ पानी, सड़क कनेक्टिविटी, मोबाइल मेडिकल यूनिट, आंगनवाड़ी, शिक्षा, 'वन अधिकार अधिनियम' के तहत पारंपरिक वन और भूमि के अधिकार की सुरक्षा मिलनी चाहिए.
विशेष पिछड़ी जनजाति में बैगा समेत शामिल 75 जनजातियों के विकास के लिए 24 हजार 104 करोड़ रुपए का बजट था. करोड़ों के बजट से इन संरक्षित आदिवासी समूहों को घर, पीने का साफ पानी, सड़क, शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जानी थी. लेकिन बालाघाट के जिन गांवों में 32 बच्चे आकाल मृत्यु का शिकार हो गए, वहां विकास सिर्फ कागजों पर ही हुआ है.
जनजातीय इलाकों में कागजों पर हो रहा विकास
जब बच्चे बीमार हुए तो यहां इलाज की व्यवस्था भी नहीं थी. प्रभावित इलाके से जिला मुख्यालय या दूसरे बड़े सरकारी अस्पताल करीब 125 किलोमीटर दूर हैं. स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र प्रभावित गांवों से 5 से 15 किलोमीटर दूर है. खराब रास्तों के कारण यहां एम्बुलेंस नहीं मिलती है. अगर लोग बीमार को खाट या कंधे पर ढोकर अस्पताल ले भी गए तो रेफरल का सरकारी सिस्टम शुरू हो जाता है.
सरकारी फाइल में मृतकों की लिस्ट में 14 नंबर पर प्रियंका धुर्वे का नाम दर्ज है. प्रियंका जब बीमार हुई तो नर्स ने एम्बुलेंस बुलाने को कहा. एम्बुलेंस नहीं आई. बारिश के बीच बाइक से उसे अस्पताल ले जाया गया. लेकिन बचाया नहीं जा सका. जानते हैं प्रभावित मातला गांव से करीबी हेल्थ सब सेंटर 5 किलोमीटर दूर है. ग्रामीणों ने बताया कि यहां नर्स भी नहीं है. मातला में आशा वर्कर भी नहीं है. बोंडरी गांव के करीबी मेडिकल सेंटर पर मेडिकल ऑफिसर नहीं है.
यानी सरकारी नक्शे में ये गांव हैं, योजनाएं हैं, सुविधाएं हैं. लेकिन जमीन पर कुछ नहीं है. सिर्फ मेडिकल सर्विस ही नहीं दूसरी सरकारी योजनाओं का हाल भी यही है. गरीबों तक अनाज पहुंचाने के लिए कई योजनाएं भी हैं. लेकिन यहां इनके पास इतना अनाज नहीं कि वो हर रोज रोटी बना सकें. सरकारी राशन इन्हें मिलता है. लेकिन वो इतना कम होता है कि पूरे परिवार का पेट भरना मुश्किल होता है. इस गांव में पीने का साफ पानी भी नहीं है. लोग नाले का पानी पीने को मजबूर हैं.