महंगाई, मनमाना टैरिफ और इमिग्रेशन पर आक्रोश: अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में क्यों हुई ट्रंप की करारी हार, इन 3 बड़े फैक्टर्स ने बिगाड़ा खेल
अमेरिकी मिडटर्म चुनावों में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी को हार क्यों मिली? इस सवाल के जवाब में 3 बड़े फैक्टर सामने आए हैं. आइए आज के DNA में डिटेल से जानते हैं.
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि सत्ता की धमक और बड़े-बड़े वादों से जनता का गुस्सा दबाया नहीं जा सकता. पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी को संसद के दोनों सदनों में करारी शिकस्त झेलनी पड़ी है. चुनावी प्रचार में बांटी गई तमाम आर्थिक 'रेवड़ियों' के बावजूद मतदाताओं ने ट्रंप की नीतियों को सिरे से नकारते हुए डेमोक्रेट्स के पक्ष में एकतरफा जनादेश दिया है. आइए जानते हैं ट्रंप की हार के बड़े फैक्टर क्या हैं?
अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन का विचार है कि 'मतपत्र बंदूक की गोली से कहीं अधिक मजबूत और असरदार होता है.' लिंकन रिपब्लिकन पार्टी के नेता थे. उनके विचार आज उनकी ही पार्टी के नेता और मौजूदा राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप पर शत-प्रतिशत सच साबित हो रहे हैं. पूरी दुनिया को गोली, बम, बारूद से डराने वाले डॉनल्ड ट्रंप को अमेरिकी नागरिकों ने वोट से हरा दिया है. जो ट्रंप मेक अमेरिका ग्रेट अगेन का नारा उछालते थे, उन्हें अमेरिकी मतदाताओं ने मिडटर्म चुनाव में क्यों जमीन पर ला दिया, अब हम इन्हीं कारणों को डिकोड करेंगे.
हार के 3 बड़े मुद्दे: महंगाई, लोकतांत्रिक मूल्य और इमिग्रेशन
अलग-अलग एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी चुनाव में इस बार सबसे बड़ा मुद्दा रहा कॉस्ट ऑफ लिविंग. इसमें महंगाई समेत वो तमाम मुद्दे शामिल हैं, जो अमेरिकी नागरिकों के जीवन को प्रभावित करते हैं. अमेरिकी वोटर्स के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा रहा. उन्हें लगा कि ट्रंप ने बिना सोचे-समझे सहयोगियों पर टैरिफ थोपकर, संसद की मंजूरी के बिना ईरान पर हमला करके और अदालतों को धमकाकर देश के लोकतांत्रिक सिस्टम और नियमों को चोट पहुंचाई है. यह अराजकता है. तीसरा निर्णायक फैक्टर रहा इमिग्रेशन का. ट्रंप शासन की इमिग्रेशन नीतियों के खिलाफ अमेरिका में जो आक्रोश है, वह वोट के तौर पर सामने आया. ये तीन मुद्दे ही मिडटर्म अमेरिकी चुनाव और ट्रंप की हार को समझने का मूल मंत्र हैं.
आइए एक-एक कर इन तीनों मुद्दों को विस्तार से डिकोड करते हैं और समझते हैं कि आखिर तमाम रेवड़ियों के ऐलान के बाद भी क्यों अमेरिकी मतदाताओं ने ट्रंप की पार्टी को जमीन पर ला दिया है.
1. कॉस्ट ऑफ लिविंग: महंगाई ने तोड़ी आम अमेरिकी की कमर
सबसे पहले बात करते हैं कॉस्ट ऑफ लिविंग की. जैसे आपके-हमारे लिए महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा होता है, वैसे ही अमेरिकी नागरिकों के लिए भी कॉस्ट ऑफ लिविंग बड़ा मुद्दा रहा. चुनाव के दौरान हुए कई सर्वे ने इसकी पुष्टि की. एपी वोटर पोल के मुताबिक 90% मतदाताओं ने बताया कि कॉस्ट ऑफ लिविंग उनके लिए बड़ा और निर्णायक मुद्दा है. 10 में से 4 यानी करीब 40 प्रतिशत लोगों ने महंगाई को बड़ा मुद्दा बताया. सीबीएस पोल के मुताबिक करीब 65% मतदाताओं ने कहा कि उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर होने के बजाय खराब हुई है. रॉयटर्स के सर्वे में शामिल 48% वोटर्स ने कहा कि वे किसे वोट देंगे, यह तय करने में 'रहन-सहन का खर्च' सबसे बड़ा मुद्दा है.
ट्रंप ने जब जनवरी 2025 में कार्यभार संभाला था तो अमेरिका में सालाना महंगाई दर लगभग 3% थी. यह मई 2026 में बढ़कर 4.2 प्रतिशत हो गई. ट्रंप के शासनकाल में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स लगभग 6% बढ़ा है. यानी जनवरी 2025 में जो सामान 100 डॉलर का था, वह अब लगभग 106 डॉलर का हो गया. ट्रंप को आम अमेरिकी नागरिकों की इस परेशानी और आक्रोश की पूरी जानकारी थी. महंगाई को कंट्रोल करने के लिए उन्होंने रूस से डीजल आयात का समझौता भी किया, लेकिन यह रणनीति फेल हो गई. ट्रंप के शासन में महंगाई जितनी ऊपर गई थी, नाराज अमेरिकी लोगों ने मिडटर्म चुनाव में उनकी पार्टी को उतना ही नीचे ला दिया.
2. मनमाना टैरिफ और सुप्रीम कोर्ट का झटका
अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन का विचार है कि सच्ची स्वतंत्रता और अराजकता के बीच एक बहुत महीन रेखा होती है. सरकार का काम उस रेखा की रक्षा करना और समाज को कानून के दायरे में रखना है, लेकिन ट्रंप ने खुद राष्ट्रपति के तौर पर अमेरिकी श्रेष्ठता के नाम पर कानून के दायरे को तोड़ दिया. उन्होंने दुनिया में अमेरिकी वर्चस्व स्थापित करने के लिए अराजकता की पराकाष्ठा को पार कर दिया.
ट्रंप ने बिना सोचे-समझे अपने व्यापारिक साझेदार देशों पर भारी-भरकम टैरिफ थोप दिया. उनका तर्क था कि इससे अमेरिकी उद्योगों को फायदा होगा, नौकरियां बचेंगी और नागरिक समृद्ध होंगे. लेकिन अराजक टैरिफ नीति से ग्लोबल मार्केट और अमेरिकी सप्लाई चेन में उथल-पुथल मच गई. आयात शुल्क बढ़ने से अमेरिकी कंपनियों की लागत बढ़ी. कंपनियों ने इसका बोझ ग्राहकों पर डाल दिया, जिससे महंगाई बढ़ी. मनमाना टैरिफ लगाने का ट्रंप का फैसला इतना अराजक था कि 20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं है.
बिना संसद की मंजूरी के ईरान पर सैन्य कार्रवाई
इतना ही नहीं, ट्रंप ने अमेरिकी संसद की सहमति के बिना ही 28 फरवरी 2026 को ईरान पर सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी. अमेरिकी संविधान के अनुसार युद्ध घोषित करने का अधिकार संसद को है. राष्ट्रपति के पास सीमित सैन्य कार्रवाई करने की शक्तियां हैं. राष्ट्रपति को सैन्य कार्रवाई की जानकारी 60 दिनों में अमेरिकी कांग्रेस को देनी होती है. ट्रंप प्रशासन ने 2 मार्च को अमेरिकी कांग्रेस को जानकारी दी, लेकिन कांग्रेस में ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को मंजूरी देने वाला कोई प्रस्ताव पास नहीं हुआ. इससे ट्रंप पर संसद के अधिकारों के अतिक्रमण का आरोप लगा. उन्हें अराजक बताया गया. शिकागो काउंसिल सर्वे में 68% अमेरिकियों ने ईरान युद्ध का विरोध किया.
इतना ही नहीं, 20 जनवरी 2025 को ट्रंप ने अमेरिका में जन्म लेने वाले कुछ बच्चों को जन्मजात नागरिकता देने से इनकार करने वाला एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी किया. 30 जून 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के आदेश को असंवैधानिक ठहराने वाले निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा.
3. अराजक फैसलों और कठोर इमिग्रेशन से नाराज जनता
इन फैसलों से ट्रंप की छवि एक ऐसे राष्ट्रपति की बनी जो जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं करते. कहने के लिए उनके ये मनमाने फैसले मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए थे. लेकिन जमीन पर इससे अराजकता फैली और नुकसान अमेरिकी नागरिकों को हुआ. नाराज अमेरिकी नागरिकों ने वोट के जरिए अपने गुस्से का इजहार किया है.
ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को जैसे रात के अंधेरे में उठवा लिया, उससे भी उनकी छवि अराजक राष्ट्रपति की ही बनी. ट्रंप के हर अराजक फैसले ने अमेरिकी लोकतंत्र की नींव को कमजोर किया. उनकी कठोर इमिग्रेशन पॉलिसी को भी अमेरिका में अराजकता माना गया. लगभग 60% मतदाताओं ने इमिग्रेशन के खिलाफ कार्रवाई को गलत माना. इसके अलावा एपी वोटर पोल में लगभग 60% मतदाताओं ने कहा कि ट्रंप देश के हित से अधिक अपने निजी हितों को प्राथमिकता देते हैं. लगभग 50 प्रतिशत मतदाताओं ने सरकारी भ्रष्टाचार को अपने वोट के लिए निर्णायक बताया. इन तमाम महत्वपूर्ण कारणों से अमेरिकी नागरिकों के अंदर ट्रंप प्रशासन को लेकर आक्रोश था.
रेवड़ियों के वादे भी नहीं आए काम
ट्रंप भी चतुर राजनेता हैं. वोटर की नब्ज पहचानते हैं. वोटर के गुस्से को कम करने के लिए उन्होंने चुनाव के दौरान कुछ रेवड़ियों का ऐलान भी किया.
सितंबर 2026 में रिपब्लिकन मिडटर्म कन्वेंशन में ऐलान किया था कि अगर उनकी पार्टी दोनों सदन जीतती है तो प्रत्येक वयस्क अमेरिकी नागरिक को 5,000 डॉलर दिए जाएंगे. एनबीसी के चुनाव पूर्व सर्वे में सिर्फ 14% लोगों ने माना था कि अगर ट्रंप की पार्टी जीती तो पैसा मिलेगा. सोचिए ट्रंप की विश्वसनीयता कितनी कम है, चुनावी नतीजे से यह साबित भी हो गया.
ट्रंप ने किसानों को डीजल के दाम बढ़ने से हुए नुकसान की भरपाई के लिए 8 अरब डॉलर देने का वादा किया. करीब 2 करोड़ 8 लाख अमेरिकियों को मेडिकेयर के लिए 90 डॉलर प्रति व्यक्ति देने का ऐलान किया. चुनाव प्रचार के दौरान ही 19 अक्टूबर 2026 को ट्रंप के उद्योगपति मित्र एलन मस्क ने अमेरिकी बच्चों को अपनी कंपनी स्पेसएक्स का एक शेयर देने का ऐलान किया था.
Gen Z ने बिगाड़ा खेल: युवाओं ने क्यों नकारा?
मतलब ट्रंप ने हर वर्ग के लिए रेवड़ी का ऐलान किया. लेकिन अमेरिका में हर वर्ग, हर उम्र के वोटर ने ट्रंप की पार्टी के खिलाफ मतदान किया है. इसका एक दिलचस्प आंकड़ा भी आपको जरूर देखना चाहिए.
अमेरिका में 18 से 29 साल यानी जेन जी (Gen Z) के वोटर्स में से 72% ने डेमोक्रेट्स को वोट दिया. 30 से 44 साल के 60% मतदाताओं ने ट्रंप के खिलाफ मतदान किया. 45 से 64 साल के आयु वर्ग वाले 51 प्रतिशत वोटर्स की पसंद डेमोक्रेट्स रहे. 65 साल से ज्यादा उम्र के 48 प्रतिशत वोटर्स ने डेमोक्रेट्स को वोट दिया.
यानी सिर्फ 65 साल से ज्यादा उम्र वाले अमेरिकी नागरिकों का बहुमत ही ट्रंप के साथ है. बाकी सभी आयु वर्ग के नागरिक उनसे नाराज हैं. सबसे ज्यादा नाराजगी जेन जी में है. जेन जी भी ट्रंप से क्यों नाराज है, इसे हार्वर्ड यूथ पोल के आंकड़ों से समझिए. इस पोल में 49% युवाओं ने कहा कि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति खराब हुई है. 77% युवाओं ने ट्रंप की आर्थिक नीतियों को भविष्य के लिए गलत बताया.
एक्सिओस और जनरेशन लैब के सर्वे में 33% युवाओं ने ट्रंप को अमेरिका के सामने सबसे बड़ा खतरा बताया. यानी अमेरिका के जेन जी को ट्रंप की आर्थिक और अराजक नीतियां नापसंद हैं. उसे अमेरिकी लोकतंत्र और संस्थाओं की चिंता है.
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