गिद्धों का गायब होना इंसानों के लिए बना ‘मौत का अलार्म’, अब MP ने छेड़ी इन्हें बचाने की सबसे बड़ी जंग
गिद्धों की तेजी से घटती आबादी इंसानों और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है. मध्य प्रदेश में संरक्षण की कोशिशों से इनकी संख्या बढ़ी है. GPS ट्रैकिंग और प्रजनन केंद्रों के जरिए गिद्धों को बचाने की मुहिम जारी है.
जब प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है, तो इंसान की पूरी जिंदगी मुश्किल में पड़ जाती है, लेकिन प्रकृति के कुछ संतुलन ऐसे हैं, जिसके बिगड़ने का असर आने वाले समय में कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है. हम और आप इस वक्त धरती के छठे महाविनाश के भयानक दौर से गुजर रहे हैं. बिना किसी शोर के हर बीतते दिन के साथ रोज लगभग 150 बेजुबान प्रजातियां इस दुनिया से हमेशा-हमेशा के लिए विलुप्त हो रही हैं. उनमें से गिद्ध भी एक है. लेकिन अच्छी खबर ये है कि विलुप्त होते गिद्धों को बचाने की जंग में अब मध्य प्रदेश इस समय पूरे देश के लिए उम्मीद की सबसे बड़ी किरण बनकर उभरा है. एमपी में गिद्धों की 7 प्रजाति पाई जाती हैं. जिनमें 4 स्थानीय हैं और 3 बाहरी हैं. मध्य प्रदेश गिद्धों के संरक्षण में देश में नंबर एक पर पहुंच गया है. भोपाल के केरवा गिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र से पहली बार 6 गिद्धों को खुले आसमान और प्राकृतिक वातावरण में आजाद किया गया. गिद्धों पर GPS ट्रैकर लगाए गए हैं, जिससे उनके आवागमन, व्यवहार और सुरक्षा की सतत निगरानी सुनिश्चित की जा सके.
ये सारी कोशिश कुदरत के टूटे हुए चक्र को फिर से जोड़ने की है. मकसद बिल्कुल साफ है. आसमान के इन प्राचीन रखवालों के जरिए हमारे पूरे इकोसिस्टम में फिर से जान फूंकना. गिद्धों के संरक्षण को लेकर एमपी से हमारी ग्राउंड रिपोर्ट आपको देखनी चाहिए. एमपी में साल 2025 की गणना में 12 हजार 981 गिद्ध दर्ज किए गए हैं. जबकि 2024 में यह आंकड़ा लगभग 10 हजार 800 था. यानी केवल एक साल के भीतर गिद्धों की आबादी में करीब 20 प्रतिशत की शानदार बढ़ोतरी हुई है. सोचिए..पूरे देश में 1990 के दशक में भारत में गिद्धों की संख्या 5 करोड़ से ज्यादा थी. जो घटकर महज 50 से 60 हजार रह गई थी. कुछ प्रजातियों के गिद्ध तो 99 दशमलव 9 प्रतिशत तक कम हो गए. यानि गिद्धों पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा था.
मध्य प्रदेश के साथ-साथ अब झारखंड के जंगलों से भी गिद्धों की वापसी को लेकर एक बेहद उत्साहित करने वाली खबर सामने आई है. झारखंड के हजारीबाग वन क्षेत्र में दुर्लभ भारतीय गिद्ध यानी इंडियन वल्चर का एक बड़ा झुंड देखा जा रहा है.
ऐसी ही राहत देने वाली तस्वीर दक्षिण भारत के जंगलों से भी सामने आई है. तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के साझा सर्वे में इस साल 390 गिद्ध पाए गए हैं, जबकि इससे पिछले सर्वे में यह संख्या केवल 320 थी. यानी दक्षिण भारत में भी प्रकृति के इस सफाईकर्मी का कुनबा अब धीरे-धीरे वापस लौट रहा है. साल 2004 में लंदन से प्रकाशित होने वाली वैज्ञानिक पत्रिका 'नेचर' में इसकी सबसे बड़ी वजह दर्द में काम आने वाली दवा डाइक्लो-फेनक को बताया गया. यह दवा मवेशियों में दर्द और सूजन कम करने के लिए इस्तेमाल होती थी. यानि जिस दवा का इस्तेमाल जानवर को राहत देने के लिए हो रहा था..वही गिद्धों के लिए जानलेवा साबित हो रही थी.
मित्रों..हमारी कहानियों में गिद्धों को विलेन की तरह दिखाया जाता रहा है. इस पक्षी को हम सदियों से सिर्फ मौत और बदहाली का प्रतीक मानते आए हैं. लेकिन अब वही गिद्ध इस धरती को ग्लोबल वार्मिंग और तबाही से बचाने का सबसे बड़ा योद्धा बनकर उभरा है. वैज्ञानिक शोध और अध्ययनों के अनुसार, गिद्धों के गायब होने से इंसानों की सेहत और पूरे पर्यावरण पर बेहद गंभीर असर पड़ा है. यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के एक प्रमुख अध्ययन के मुताबिक, गिद्धों के अचानक खत्म होने से खुले में सड़ते शवों की वजह से पानी और हवा में जानलेवा बैक्टीरिया फैले, साथ ही मवेशियों को खाने वाले आवारा कुत्तों की आबादी भी बेतहाशा बढ़ी, जिससे रेबीज का खतरा कई गुना बढ़ गया. इस अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि गिद्धों के न रहने से बीमारियों के फैलने के कारण केवल भारत में साल 2000 से 2005 के बीच करीब 5 लाख अतिरिक्त इंसानों की जान गई. प्रभावित इलाकों में इंसानी मृत्यु दर में 4 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई.
मित्रों, जब इंसानी गलतियों की वजह से दक्षिण एशिया के करीब 1 करोड़ 60 लाख गिद्ध गायब हो गए, तब उन्हें बचाने के लिए एक साथ कई मोर्चों पर जंग शुरू हुई. वर्ष 2006 में भारत, नेपाल और पाकिस्तान ने मवेशियों के लिए जहरीली दवा डाइक्लो-फेनक पर बैन लगाया, हालांकि सर्वे बताते हैं कि कई राज्यों में 10 से 46 प्रतिशत दुकानदार आज भी इसे चोरी-छिपे बेच रहे हैं. वर्ष 2011 से 14 सरकारी एजेंसियां और संगठन मिलकर वल्चर सेफ जोन बना रहे हैं. असम के कुलसी में तो देश का पहला वल्चर रेस्टोरेंट भी शुरू हो रहा है, जहां इन परिंदों को जहर-मुक्त भोजन दिया जाएगा.
गिद्ध सिर्फ लावारिस लाशों को ठिकाने लगाने वाले पक्षी नहीं हैं, बल्कि वे जमीन की उपजाऊ शक्ति और जलवायु के लिए जैविक इंजीनियर भी हैं. जब एक गिद्ध सड़ती हुई लाश को खाता है, तो वह न केवल जानलेवा बीमारियों के फैलने का चक्र तोड़ता है, बल्कि जैविक पदार्थों को विघटित करके पोषक तत्वों को वापस मिट्टी में लौटा देता है. इसी मिट्टी से हरी-भरी घास पनपती है, और यही घास के मैदान हर साल 26 करोड़ टन से ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर धरती का तापमान नियंत्रित रखते हैं. यानी गिद्धों का होना सीधे तौर पर हमारी हवा और मौसम के संतुलन से जुड़ा हुआ है.