DNA: 'दुश्मन के घर में शेर की दहाड़!' UNGA में ट्रंप की चेतावनी के बीच ईरानी राष्ट्रपति की एंट्री
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में डोनाल्ड ट्रंप की सख्त चेतावनियों के बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने मंच संभाला. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और यूएनजीए में दोनों देशों के बयानों की पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ें.
अमेरिका की समुद्री नाकेबंदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सीधी चेतावनियों के बीच ईरान ने अमेरिकी सरजमीं पर कदम रखा है. दोनों देशों के बीच युद्धविराम टूटने के बाद ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे हैं. शत्रु देश के प्रभाव क्षेत्र में जाकर अपनी शर्तों पर बात करना एक बड़ी कूटनीतिक पहल माना जा रहा है.
ट्रंप का UNGA भाषण: ईरान को सख्त चेतावनी
संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई को जायज ठहराते हुए कहा कि अमेरिका किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देगा.
ट्रंप के भाषण के मुख्य बिंदु:
सैन्य कार्रवाई का बचाव: परमाणु ढाल की आड़ में होने वाले आतंकी हमलों को रोकने के लिए कार्रवाई आवश्यक थी.
इजरायल हमला: 7 अक्टूबर के हमले और खाड़ी में अशांति के लिए ईरान जिम्मेदार है.
आर्थिक बहिष्कार की मांग: ट्रंप ने दुनिया भर के देशों से ईरान का पूरी तरह आर्थिक बहिष्कार करने की अपील की.
नरमी नहीं: जब तक ईरान परमाणु जिद, आतंकवाद और जहाजों पर हमले नहीं रोकता, तब तक कोई राहत नहीं दी जाएगी.
मध्यमवधि चुनाव (Midterms): ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिकी चुनाव के बाद ही ईरान के साथ कोई स्थायी समझौता हो सकता है.
तेहरान से न्यूयॉर्क: ईरान की कूटनीतिक रणनीति
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने तेहरान छोड़ने से पहले बयान दिया कि वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने देश के रुख का मजबूती से बचाव करेंगे. वहीं न्यूयॉर्क पहुंचे विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका पर दोहरे रवैये का आरोप लगाया.
संयुक्त राष्ट्र में ईरान का मुख्य एजेंडा:
विश्वास की बहाली का मुद्दा: ईरान यह तर्क देगा कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के दबाव में काम कर रहा है और अपनी मूल जिम्मेदारियों से भटक गया है.
मानवाधिकार पर घेराबंदी: गाजा में मानवीय संकट और अस्पतालों पर हमलों को लेकर अमेरिका और यूरोप के दोहरे रवैये पर सवाल उठाना.
अविश्वसनीयता का आरोप: ईरान यह साबित करने की कोशिश करेगा कि अमेरिका ने हमेशा वार्ताओं और समझौतों का उल्लंघन किया है.
वीजा विवाद: ईरानी मीडिया प्रतिनिधिमंडल को अमेरिकी वीजा न मिलने को आवाज दबाने की साजिश के रूप में पेश करना.
प्रतिबंधों के बावजूद अमेरिका कैसे पहुंचे ईरानी नेता?
1947 के 'यूएन हेडक्वार्टर्स एग्रीमेंट' (UN Headquarters Agreement) के तहत अमेरिका संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक बैठकों में शामिल होने वाले प्रतिनिधियों को आने से नहीं रोक सकता. इसी अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत ईरानी राष्ट्रपति के विमान को अमेरिका में उतरने की अनुमति दी गई. विदेश मंत्री अराघची सीधे आने के बजाय पहले कतर पहुंचे, जहां उन्होंने क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की और फिर न्यूयॉर्क पहुंचे.
कूटनीति के पीछे की बातचीत और ईरान की शर्तें
भले ही आधिकारिक द्विपक्षीय बैठक तय न हो, लेकिन ट्रंप ने ईरानी राष्ट्रपति से मुलाकात के संकेत दिए हैं. ईरान ने कतर के माध्यम से अमेरिका के सामने बातचीत के लिए कुछ शर्तें रखी हैं:
- लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्ध तुरंत रोका जाए.
- ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नाकेबंदी समाप्त की जाए.
- जब्त किए गए अरबों डॉलर के ईरानी फंड जारी किए जाएं.
- ईरानी जमीन पर अमेरिकी हमले और अंदरूनी मामलों में दखल बंद हो.
- आर्थिक असर गिरते तेल के दाम और अमेरिका पर दबाव
वार्ता की संभावना की खबर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम, जो 110 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गए थे, घटकर 100 डॉलर प्रति बैरल पर आ गए हैं. अमेरिका में बढ़ती महंगाई और युद्ध की स्थिति के कारण राष्ट्रपति ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 32% पर आ गई है. अमेरिकी जनता का बड़ा वर्ग इस युद्ध को गलत मान रहा है, जिससे आगामी मिडटर्म इलेक्शन में सत्तारूढ़ दल पर राजनीतिक दबाव बढ़ गया है.
डॉलर के प्रभुत्व पर संकट
दुनिया भर के देश अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं, जिसका नेतृत्व चीन, रूस और ईरान जैसे देश कर रहे हैं:
सोने की खरीदारी: संपत्तियों को फ्रीज होने के डर से दुनिया के सेंट्रल बैंक डॉलर रिजर्व के बजाय सोना खरीद रहे हैं.
चीन द्वारा निवेश घटाना: चीन ने अमेरिका के ट्रेजरी बांड्स की हिस्सेदारी 2013 के $1300 अरब से घटाकर लगभग $618 अरब कर दी है.
यूरोप-चीन का सीधा व्यापार: डचे बैंक (Deutsche Bank) को यूरोप का पहला चीनी मुद्रा (युआन) क्लियरिंग बैंक बनाए जाने से अब यूरोपीय कंपनियां सीधे यूरो या युआन में लेनदेन कर सकती हैं, जिससे अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली और डॉलर की आवश्यकता बायपास हो जाती है. व्यापारिक रास्ते बदलने और डॉलर की मांग घटने की आशंका ही वह मुख्य कारण है, जो अमेरिका को सख्त बयानों के बावजूद कूटनीतिक रास्ते खुले रखने पर मजबूर कर रही है.