देश के स्कूलों का DNA टेस्ट: कहीं छत गिर रही, कहीं फर्श पर पढ़ रहे बच्चे... कैसे बनेगा भारत का भविष्य?
देश की शिक्षा व्यवस्था के बुनियादी ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. कई राज्यों में बच्चे जर्जर स्कूलों, अपर्याप्त क्लासरूम और बिना पर्याप्त शिक्षकों के पढ़ने को मजबूर हैं. शिक्षा पर निवेश और बच्चों के सीखने के स्तर के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं.
आचार्य चाणक्य का विचार है कि जिस प्रकार बिना पंखों के पक्षी उड़ान नहीं भर सकता, उसी प्रकार शिक्षा के बिना मनुष्य का जीवन और राष्ट्र का भविष्य उन्नत नहीं हो सकता. यानी राष्ट्र के उन्नत भविष्य के लिए उत्तम शिक्षा और शिक्षा की उत्तम व्यवस्था अनिवार्य है. इसके लिए जरूरी है शिक्षा का मजबूत बुनियादी ढांचा. ये कैसे होगा. ये होगा शिक्षा में निवेश से. लेकिन क्या हमारे देश में सर्वोत्तम एजुकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए उचित निवेश हो रहा है. ये सवाल आज हम इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि हमारे देश में बच्चे कहीं ऐसे स्कूल में पढ़ रहे हैं जहां छत गिर रही है. ऐसे स्कूल हैं जिनकी मरम्मत 100 साल से नहीं हुई. कहीं नौनिहाल स्कूल की छत पर छज्जे के किनारे बैठकर पढ़ रहे हैं. कई स्कूलों की बिल्डिंग में दरार आ चुकी है. यानी इमारत इतनी जर्जर है कि कभी भी गिर सकती है. सोचिए जो स्कूल खुद जर्जर हैं वो देश का सुनहरा भविष्य कैसे तैयार करेंगे.
इसलिए आज हम देश के बदहाल एजुकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर का विश्लेषण करेंगे. हमारा विश्लेषण हर परिवार से जुड़ा है. इसे बहुत ध्यान से समझिए.
भोपाल के सरकारी स्कूल की जर्जर हालत
भोपाल में भैरोपुरा के सरकारी स्कूल की हालत बेहद खराब है. दीवार को सिर्फ छुआ कि पलस्तर गिरने लगा. ये खतरनाक बिल्डिंग भैरोपुरा के सरकारी स्कूल की है. यहां रोज बच्चे ज्ञान के लिए जान जोखिम में डालते हैं. क्लासरूम की दीवारों में जगह-जगह दरार है. सांप, बिच्छुओं का डेरा है. कमरों में पानी भरा है. सीलन और बदबू ऐसी कि 5 मिनट भी यहां खड़े होना मुश्किल है. भोपाल से भैरोपुरा की दूरी सिर्फ 15 किलोमीटर है. शिक्षा विभाग सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च करता है. लेकिन सिर्फ 15 किलोमीटर दूर की हालत ऐसी है.
हजारीबाग में स्कूल की छत गिरने का खतरा
हजारीबाग के स्कूल की बिल्डिंग से अच्छी हालत पुरातत्व विभाग के इमारतों की होती है. स्कूल की छत गिर रही है. बड़ा हादसा हो सकता है. इसलिए बच्चे क्लासरूम में नहीं, बाहर बैठकर पढ़ रहे हैं. क्लासरूम की दीवारें भी शिक्षा व्यवस्था की तरह ही जर्जर है. ऐसा लग रहा है जैसे इन पर आखिरी बार पेंट भी 50 साल पहले हुआ था.
झाझा में छत पर लग रही क्लास
बिहार के झाझा में छत पर क्लास लगी है. जहां छात्र बैठे हैं वो जगह छज्जे से चंद कदम दूर है. यानी छोटी सी लापरवाही जानलेवा हो सकती है. स्कूल में 663 छात्रों के लिए सिर्फ 5 क्लासरूम हैं. इसलिए छत पर छज्जे के पास क्लास हो रही है. शिक्षक बता रहे हैं कि क्लासरूम बनाने की चर्चा हुई लेकिन ये सिफारिश अभी फाइलों में ही है.
पानीपत में आजादी के समय की स्कूल बिल्डिंग
1947 में जब देश आजाद हुआ था, पानीपत के इस स्कूल की बिल्डिंग तभी बनी थी. आज हाल ऐसा है कि स्कूल का नाम भी नहीं पढ़ा जा सकता है. जर्जर दीवारें कभी भी गिर सकती हैं. क्लासरूम की छत से पानी टपक रहा है. बच्चे शेड के नीचे बैठकर पढ़ रहे हैं.
बिलासपुर में असुरक्षित घोषित इमारत में पढ़ रहे बच्चे
बिलासपुर के काथला प्राइमरी स्कूल की बिल्डिंग को असुरक्षित घोषित किया जा चुका है. लेकिन छात्र इसी खतरनाक इमारत में पढ़ रहे हैं. एक कमरे में पहली से पांचवी तक के छात्रों की क्लास लग रही है. बिल्डिंग कब बनेगी नहीं पता.
छिंदवाड़ा में मंदिर में चल रहा स्कूल
छिंदवाड़ा में प्राइमरी स्कूल के बच्चे और शिक्षक दोनों हनुमान भरोसे हैं. एक साल से हनुमान जी के मंदिर में ही स्कूल चल रहा है. 32 बच्चों पर सिर्फ एक शिक्षक है.
आधे भारत का भविष्य सरकारी स्कूलों में
एजुकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर की बदहाली की कहानी किसी एक प्रदेश की नहीं है. ये कमोबेश अखिल भारतीय राष्ट्रीय समस्या है. समय की पाबंदी को देखते हुए हमने आपको सिर्फ कुछ प्रदेशों की रिपोर्ट दिखाई. ये इसलिए गंभीर विषय है क्योंकि देश के 50 प्रतिशत छात्र सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं. ग्रामीण इलाकों में ये आंकड़ा करीब 67 प्रतिशत होता है.
सवाल ये है कि जिन स्कूलों में आधा भारत भविष्य के लिए शिक्षित हो रहा है, वो जर्जर क्यों हैं. इसे समझने के लिए अब इन आंकड़ों पर ध्यान दीजिए.
शिक्षा पर GDP का 6 प्रतिशत खर्च करने का लक्ष्य
2020 में जब नई शिक्षा नीति बनी थी तो GDP का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने पर जोर दिया गया था. ये पहली बार नहीं था जब शिक्षा पर खर्च बढ़ाने की बात हुई थी. आज से 58 साल पहले 1968 में कोठारी आयोग ने शिक्षा पर GDP का 6 प्रतिशत खर्च करने की सलाह दी थी, लेकिन 58 साल बाद भी शिक्षा में सुधार के लिए ये महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाया गया. आज भी शिक्षा पर GDP का करीब 4 प्रतिशत ही खर्च हो रहा है. यहां ये भी बताना जरूरी है कि यूनेस्को ने सुझाव दिया था कि सरकारों को अपने कुल बजट का 15% से 20% हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना चाहिए.
दूसरे देशों के मुकाबले भारत में शिक्षा पर खर्च
सोचिए हम शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर कितना कम खर्च कर रहे हैं. इसे समझने के लिए आपको दुनिया के दूसरे देशों के आंकड़े भी देखने चाहिए.
- किरिबाती नाम का देश शिक्षा पर अपनी GDP का 16 प्रतिशत खर्च करता है.
- तुवालु नाम का देश शिक्षा पर GDP का 13 प्रतिशत खर्च करता है.
- नामीबिया और अल्जीरिया जैसे देश शिक्षा पर GDP का 9 प्रतिशत खर्च करते हैं. ये वो देश हैं जिन्हें गरीब माना जाता है.
- अमीर देशों की बात करें तो स्वीडन GDP का साढ़े 7 प्रतिशत, डेनमार्क साढ़े छह प्रतिशत और बेल्जियम साढ़े छह प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है.
लेकिन हम 2026 में भी 1968 में तय किए गए उस लक्ष्य से पीछे हैं. इसका परिणाम हमारे बच्चे भुगत रहे हैं.
PISA में भारत का प्रदर्शन
अंतरराष्ट्रीय छात्र मूल्यांकन कार्यक्रम यानी PISA में हमने सिर्फ एक बार 2009 में हिस्सा लिया था. तब 74 देशों में से हमें 73वां स्थान मिला था. विश्व बैंक की रिपोर्ट बताती है कि भारत में 10 वर्ष की आयु के 56% बच्चे एक साधारण पाठ को समझकर नहीं पढ़ सकते. सोचिए शिक्षा का हाल कैसा है. CAG की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि देश के 43 प्रतिशत प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में छात्र फर्श पर बैठते हैं. यानी इन स्कूलों में छात्रों के बैठने के लिए बेंच नहीं है.
एक शिक्षक और कई कक्षाओं की जिम्मेदारी
समझिए एक शिक्षक पूरे स्कूल को पढ़ा रहा है. यानी वो सुपरमैन की तरह पहली क्लास को ककहरा पढ़ाता है, दूसरी क्लास को वाक्य संरचना बताता है तो पांचवी क्लास को गणित. ये शिक्षा का हाल है. पटना में शिक्षा मंत्री के आवास से सिर्फ 200 मीटर दूरी पर चल रहे एक सरकारी स्कूल में भी शिक्षा व्यवस्था की ऐसी ही तस्वीर सामने आई है. बच्चों के लिए अलग-अलग क्लासरूम तक नहीं हैं. पढ़ने-पढ़ाने का मजबूत बुनियादी ढांचा तक नहीं है.
सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का स्तर
ASER 2024 के सर्वे के मुताबिक सरकारी स्कूलों में क्लास 3 के केवल 23% बच्चे ही कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ पाते हैं. पांचवीं क्लास में पहुंचने वाले 45 प्रतिशत बच्चे ही क्लास दो के स्तर की कहानी पढ़ पाते हैं.
ये बड़ा संकट है. निवेश की कमी से शिक्षा का बुनियादी ढांचा कमजोर हो चुका है. शिक्षक नहीं हैं. ये चिंता का विषय है. आचार्य चाणक्य ने कहा है कि शिक्षित व्यक्ति पूरे समाज और राष्ट्र का गौरव होता है. शिक्षा ही वह माध्यम है जो मनुष्य को सुसंस्कृत और राष्ट्र निर्माता बनाती है. समझिए भावी पीढ़ी को राष्ट्र निर्माता बनाना है तो शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारना होगा. क्योंकि अच्छी शिक्षा ही बच्चों को सुसंस्कृत और राष्ट्र निर्माता बनाएगी.