'सबसे कमजोर कड़ी' से दुनिया का ग्रोथ इंजन: 20 साल में ब्रिक्स के भीतर कैसे बदली भारत की तकदीर?
एक वक्त ऐसा भी था जब भारत को ब्रिक्स की सबसे कमजोर कड़ी कहा गया था, लेकिन पिछले 20 सालों में भारत ने पूरी कहानी पलट दी है. ब्रिक्स में भारत को कमजोर आंकने वालों के मुंह पर तमाचा लग गया है. आइए जानते हैं इस समूह की 'सबसे कमजोर कड़ी' कहे जाने वाले भारत ने अपनी तकदीर कैसे बदली.
एक दौर था जब पश्चिमी मीडिया ब्रिक्स से भारत को बाहर कर इंडोनेशिया को लाने की वकालत कर रहा था और भारत को इस समूह की 'सबसे कमजोर कड़ी' बताया जा रहा था. लेकिन बीते दो दशकों में वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि आज भारत के बिना ब्रिक्स की कल्पना भी नामुमकिन है. 1 ट्रिलियन डॉलर से 4 ट्रिलियन डॉलर की छलांग और दुनिया की सबसे तेज 7.8% की ग्रोथ रेट के दम पर भारत अब इस मंच पर सिर्फ भागीदार नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ का निर्विवाद नेता बनकर उभरा है.
ब्रिक्स शुरुआत में दुनिया की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक मंच था, लेकिन समय के साथ ये पश्चिमी देशों के वर्चस्व को चुनौती देने वाला एक मजबूत संगठन बन गया है. भारत के ताकतवर होने की कहानी भी बहुत हद तक ब्रिक्स जैसी है. दुनिया में जैसे-जैसे ब्रिक्स मजबूत हुआ, वैसे ही ब्रिक्स के भीतर भारत भी मजबूत हुआ है.
इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि ब्रिक्स के 20 वर्षों की यात्रा में भारत कहां से कहां तक पहुंचा. जिस ब्रिक्स में भारत की भूमिका को लेकर सवाल उठते थे, उस संगठन में भारत नेतृत्व की भूमिका में कैसे आ गया? जिस ब्रिक्स में भारत को सबसे कमजोर कड़ी कहा जाता था, भारत को ब्रिक्स से हटाने की बात कही जाती थी, उस समूह में भारत सबसे मजबूत कड़ी कैसे बन गया? ये आज हम विस्तार से जानेंगे.
भारत पर क्यों उठे थे सवाल?
भारत ब्रिक्स के संस्थापक सदस्यों में से एक है, लेकिन इसके बावजूद 2012-13 आते-आते ब्रिक्स में भारत की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे. मित्रों, उस समय पश्चिमी मीडिया और अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाले संगठन भारत को ब्रिक्स में सबसे कमजोर कड़ी बताने लगे थे. भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाने लगे थे. यहां तक कि ये सवाल भी उठाया जाने लगा कि भारत ब्रिक्स में रहने लायक है कि नहीं? सोचिए, एक दौर वो भी था जब BRICS के 'I' को इंडिया की जगह इंडोनेशिया से बदलने की मांग होने लगी थी. कहा जाने लगा कि भारत को हटाकर इंडोनेशिया को शामिल किया जाना चाहिए. आज आप इन सवालों पर हंस रहे होंगे, लेकिन ये उस दौर की वास्तविकता थी. 5% के करीब विकास दर होने की वजह से भारत पर ये सवाल उठाए जाते थे.
27 मार्च 2013 को BBC ने एक आर्टिकल छापा था. इसमें लिखा गया था कि क्या ब्रिक्स में इंडोनेशिया को 'I' के रूप में शामिल किया जाना चाहिए? सोचिए, पश्चिमी मीडिया भारत को ब्रिक्स से हटाने की बात करने लगा था. पश्चिमी मीडिया ही नहीं बल्कि पश्चिमी देशों के अर्थशास्त्री और रेटिंग एजेंसियां भी इसी तरह के शब्द बोलने लगे थे.
गोल्डमैन सैक्स के जिस अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने BRIC शब्द गढ़ा था, उन्होंने 2012 में भारत की अर्थव्यवस्था को वैल्यूएशन के मामले में सबसे कम आकर्षक बताया था. इसी तरह रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पूअर्स ने चेतावनी दी कि भारत अपनी इन्वेस्टमेंट-ग्रेड सॉवरेन रेटिंग खोने वाला पहला BRIC देश बन सकता है. यानी उस समय भारत की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी थी कि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए भारत में पैसा लगाना जोखिम से भरा माना जाने लगा था.
ये अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भारत को लेकर इस तरह की नेगेटिव रिपोर्ट छापती थीं और दुनिया भर की मीडिया इसे छापती थी. भारत को लेकर पूरी दुनिया में निराशा का माहौल बनाया गया. ऐसी बातें की जाने लगीं कि भारत की अर्थव्यवस्था डूबने वाली है, क्योंकि 2006 में जब ब्रिक्स की स्थापना हुई थी तो भारत की GDP ग्रोथ रेट 9% से ज्यादा थी. लेकिन 2012-13 में जब ये घटकर 5% के करीब हो गई तो भारत के खिलाफ सेंटीमेंट बनाया जाने लगा, लेकिन 13-14 वर्षों के बाद आज की स्थिति बिल्कुल अलग है. आज के दौर में ब्रिक्स की कल्पना भारत के बिना नहीं हो सकती है. भारत इसका संस्थापक सदस्य होने के साथ-साथ चौथी बार ब्रिक्स समिट की अध्यक्षता कर रहा है.
भारत ने कैसे बदली खुद की तस्वीर?
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और UAE के क्राउन प्रिंस जैसे वर्ल्ड लीडर्स का दिल्ली में जुटना, भारत के बढ़ते कूटनीतिक प्रभाव का प्रमाण है. जिस ब्रिक्स से भारत को हटाने की बात कही जा रही थी, उसमें भारत की पहल पर ही कई देशों को शामिल किया गया. आज इंडोनेशिया भी ब्रिक्स का सदस्य है, लेकिन उसे भारत की कीमत पर या भारत को हटाकर सदस्यता नहीं दी गई है, बल्कि भारत की मदद से उसे ब्रिक्स की सदस्यता मिली है. इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सार्वजनिक रूप से भारत की मदद के लिए आभार जता चुके हैं. आज भी BRICS में 'I' का मतलब इंडिया ही है, और इंडिया ही रहेगा. पाकिस्तान ने 2023 में ब्रिक्स की सदस्यता के लिए आवेदन किया, लेकिन भारत के विरोध के कारण न तो पाकिस्तान को सदस्यता मिली, न ही उसे पार्टनर देश का दर्जा मिला.
आज भारत को इस संगठन में विकास के सबसे मजबूत इंजन में से एक माना जाता है और इसकी गवाही आंकड़े देते हैं.
मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में भारत ने 7.8% की GDP बढ़ोतरी दर्ज की है.
इस तरह भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है. जिस भारत को 2012-13 के करीब सबसे कम आकर्षक माना जाता था, उसकी आर्थिक वृद्धि दर चीन, रूस और ब्राजील से बेहतर है.
इसी महीने जापान क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने भारत की रेटिंग को BBB+ से बढ़ाकर A माइनस किया है. आज ही IMF ने भारत को दुनिया के विकास का प्रमुख इंजन बताया है.
GDP 1 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 4 ट्रिलियन डॉलर हुई
ये सुधार भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि और मजबूत वित्तीय प्रणाली के कारण हुआ है. 2012 में निवेश के मामले में भारत को असुरक्षित बताया गया था, लेकिन आज भारत उस स्थिति को पीछे छोड़ चुका है. कम विकास दर के लिए जिस भारत पर सवाल उठाए जाते थे, वो आज सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है. दुनिया के विकास का इंजन होने का मतलब है कि भारत दुनिया के विकास को आगे ले जा रहा है. आज आपको ये भी जानना चाहिए कि ब्रिक्स के 20 वर्षों की यात्रा में भारत कहां से कहां तक पहुंचा है. 2006 में ब्रिक्स की स्थापना के समय भारत की GDP लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर थी, लेकिन आज ये 4 ट्रिलियन डॉलर के करीब है. उस समय भारत GDP रैंकिंग के मामले में 12वें स्थान पर था. आज IMF के मुताबिक भारत GDP के मामले में छठे पायदान पर है.
भारत की शक्ति और आत्मविश्वास के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद ने कहा था 'उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए.' स्वामी विवेकानंद का यह विचार आज के भारत की उम्मीदों पर भी पूरी तरह सटीक बैठता है. भारत अपने आर्थिक और रणनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बिना रुके लगातार आगे बढ़ रहा है.