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असीम मुनीर का असली धर्म आतंक है और उसको फेवरेट फील्ड मार्शल बताने वाले उसके शुभचिंतक. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का असली धर्म व्यापार है. इसी व्यापार के लिए वो अमेरिका के दुश्मनों से दोस्ती कर लेते हैं. इसी व्यापार को चमकाने के लिए ट्रंप अमेरिका के दोस्तों को दुश्मन बना लेते हैं. व्यापार के मौके बनाने के लिए ट्रंप ऐसे हालात पैदा करते हैं कि मजबूर देशों को उनके सामने डॉलर के बक्से लेकर डील के लिए खड़ा होना पड़ता है. यमन में हूती से संघर्ष कर रहे सऊदी अरब के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. एक दिन पहले हमने आपको DNA में हूती के साथ अमेरिका की डील की खबर दिखाई थी और 24 घंटे के अंदर सऊदी अरब और अमेरिका के बीच 24 अरब डॉलर से ज्यादा के रक्षा समझौते का एलान हो गया.
कल DNA में हमने आपको बताया था कि हूती का डर दिखाकर अमेरिका सऊदी को बड़ी डील के लिए मजबूर कर सकता है और 24 घंटे के अंदर ट्रंप की इस चाल के रुझान दिखाई देने लगे. अमेरिका के विदेश विभाग ने सऊदी अरब के साथ लगभग 24 अरब डॉलर यानी 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की भारी-भरकम डिफेंस डील को मंजूरी दे दी है. अमेरिका..सऊदी अरब को दुनिया के सबसे एडवांस्ड स्टील्थ फाइटर जेट्स F-35 बेचने जा रहा है.
डील में क्या-क्या मिलेगा?
अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से जारी नोटिफिकेशन के मुताबिक इस पैकेज में सऊदी अरब को 48 एफ-35 लाइटनिंग-2 फाइटर जेट्स मिलेंगे.
ये सभी एफ-35 कन्वेंशनल टेकऑफ और लैंडिंग क्षमता वाले होंगे. इसका मतलब है कि जो विमान सऊदी अरब को दिए जा रहे हैं, वो किसी आम फाइटर जेट की तरह लंबे रनवे से सामान्य तरीके से ही टेकऑफ और लैंडिंग करेंगे.
अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन एफ-35 का एक और उन्नत संस्करण बनाती है, जिसे एफ-35 बी कहते हैं.
यह फाइटर जेट हेलीकॉप्टर की तरह हवा में सीधा खड़ा हो सकता है और बहुत छोटे रनवे या युद्धपोतों से उड़ सकता है. लेकिन सऊदी अरब को ये उन्नत संस्करण नहीं मिल रहा.
इस डील में सऊदी अरब को 49 प्रैट एंड व्हिटनी इंजन भी मिल रहे हैं, जिसमें 48 इंजन सऊदी को मिलने वाले फाइटर जेट्स के लिए और 1 अतिरिक्त इंजन शामिल है.
रक्षा सौदों में सिर्फ हथियार खरीदना काफी नहीं होता, उनका रखरखाव सबसे बड़ा खर्चा और चुनौती होता है. जब किसी फाइटर जेट के इंजन को तयशुदा घंटों के बाद सर्विसिंग या मरम्मत के लिए बाहर निकाला जाता है, तो विमान को लंबे समय तक ग्राउंडेड नहीं रखा जा सकता. ऐसे में अतिरिक्त इंजन तुरंत फिट करके विमान को फिर से ऑपरेशनल बना दिया जाता है. इसीलिए इस सौदे में अतिरिक्त इंजन भी लिया गया है. इसके अलावा सौदे में सऊदी अरब को सुरक्षित संचार उपकरण भी दिए जाएंगे. 'सुरक्षित संचार उपकरणों' का मतलब ऐसे एंटी-जैमिंग और हाई-एन्क्रिप्टेड सिस्टम से है, जिन्हें दुश्मन देश आसानी से टैप, हैक या ब्लॉक नहीं कर सके.
भारत का इनकार, सऊदी को मजबूरी
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपना स्टील्थ F-35 भारत को बेचने की कोशिश भी की थी, लेकिन भारत ने इस महंगी डील से इनकार कर दिया था. अब मिडिल ईस्ट में ट्रंप ने अपने महंगे पांचवीं पीढ़ी के विमान के लिए ग्राहक तलाश कर लिया है. या यूं कहें सऊदी अरब के सामने ऐसी परिस्थितियां बना दी हैं कि उसे F-35 खरीदना पड़ रहा है. इस बात को आप इस सौदे की टाइमिंग के जरिए समझिए.
संकट के समय डील का खेल
हूती का डर और फंसा सऊदी
सऊदी अरब ने हूती के हमले के बाद अमेरिका से हूती पर हमला करने की गुहार लगाई थी. लेकिन ट्रंप ने सिर्फ हूती पर हमला करने से इनकार नहीं किया बल्कि हूती से अमेरिका और इजरायल के जहाजों पर हमला नहीं करने की डील कर ली. हूती विद्रोहियों ने भी एलान किया..हमला सिर्फ सऊदी अरब के जहाजों पर होगा. जिससे सऊदी अरब पर दबाव और बढ़ गया. सऊदी...अमेरिकी हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार रहा है. सऊदी के 70% हथियार अमेरिकी हैं. हूती के हमलों का सामना करते हुए सऊदी के पास इंटरसेप्टर मिसाइलें भी खत्म हो रही हैं. यानी सऊदी को अपनी रक्षा के लिए अमेरिका की जरूरत है. अगर मिसाइलें नहीं मिलीं तो सऊदी के पास मौजूद अमेरिका के थाड और पैट्रियट जैसे एयर डिफेंस सिस्टम किसी खिलौने से ज्यादा नहीं रहेंगे. इस संघर्ष के दौरान हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के पास मौजूद अमेरिका के F-15 विमान को भी मार गिराया था. जिससे सऊदी अरब को F-35 जैसी एडवांस तकनीक के बारे में सोचना पड़ा.
संकट पैदा करो, हथियार बेचो
यह अमेरिका की उस पुरानी नीति का हिस्सा है जिसमें पहले खुद संकट पैदा किया जाता है. फिर उससे निपटने के लिए हथियारों का सबसे बड़ा बाजार सजा दिया जाता है. अमेरिका ने हूती संकट के बीच सऊदी अरब को भी यह अहसास करा दिया कि बिना अमेरिकी हथियारों और आधुनिक तकनीक के उसकी रियासत का बचा रहना मुश्किल है, और नतीजा यह हुआ कि दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का यह रक्षा सौदा फाइनल हो गया. अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी ट्रंप ने..ईरान का डर दिखाकर सऊदी क्राउन प्रिंस के सामने हथियारों की दुकान लगाई थी.
एक तीर से दो शिकार
अपने बयान में..एक कुशल सेल्समैन की तरह...100 अरब डॉलर की डील को ट्रंप ने सऊदी के लिए पीनट यानी मूंगफली जैसा सस्ता बताया. इसी बयान में ट्रंप ने मोहम्मद बिन सलमान को अच्छा दोस्त भी कहा..यानी जो ट्रंप के साथ डील करेगा..वो उनका दोस्त बन जाएगा. अब एक बार फिर से ट्रंप ने सऊदी को 24 अरब डॉलर के हथियार बेच दिए. लेकिन अमेरिका ने ये डील करके एक तीर से दो शिकार किए हैं. सऊदी को F-35 बेचकर अमेरिका ने कुछ बड़ी डिफेंस डील और पक्की कर ली हैं.
सऊदी अरब के साथ हुई इस डील की जानकारी अमेरिका ने इजरायल के प्रधानमंत्री कार्यालय को भी दी है. इजरायल भी अमेरिका के F-35 फाइटर जेट इस्तेमाल करता है. अब तक अमेरिकी सरकारों ने मिडिल ईस्ट में किसी देश को F-35 लड़ाकू विमान नहीं दिए थे, ताकि इलाके में इजरायल का हवाई दबदबा बना रहे. लेकिन अब सऊदी अरब को ये विमान दिए जा रहे हैं. इस डील से सऊदी अरब की सैन्य ताकत बढ़ने पर इजरायल को मिडिल ईस्ट में अपनी रणनीतिक बढ़त खतरे में पड़ने की चिंता है. ये चिंता इजरायली अखबार येरुशलम पोस्ट ने भी जाहिर की है. इस रिपोर्ट में बताया गया है.
इजरायल की नई मांगें
मतलब सऊदी के साथ अमेरिका की डील के बाद इजरायल भी डॉलर लेकर अमेरिका से ज्यादा आधुनिक हथियार खरीदने की लाइन में खड़ा हो गया है. वैसे..सऊदी और इजरायल जैसे देश संपन्न माने जाते हैं. लेकिन ट्रंप पाकिस्तान जैसे कंगाल देश से भी कमाई की तैयारी कर रहे हैं.
असीम मुनीर और ड्रोन डील
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप पाकिस्तान की आतंकी सेना के चीफ असीम मुनीर को अक्सर फेवरेट फील्ड मार्शल कहते हैं. सेना की वर्दी पहने एक आतंकी को डॉनल्ड ट्रंप इतनी इज्जत क्यों देते हैं..इसका सच समय-समय पर किस्तों में दुनिया के सामने आता रहता है. इस वक्त आप जो तस्वीर देख रहे हैं, उसमें असीम मुनीर रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर में अमेरिकी ड्रोन कंपनी पावरस के अधिकारियों के साथ खड़ा है. इस तस्वीर का संबंध एक ऐसी डील से है, जिससे डॉनल्ड ट्रंप अपने ही देश में घिर गए हैं.
ट्रंप के बेटों का कनेक्शन
इस मुलाकात के बाद अमेरिकी ड्रोन कंपनी पावरस ने पाकिस्तान की सेना के साथ एक समझौते की जानकारी दी. इस समझौते में ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक के लिए स्थानीय उत्पादन यूनिट लगाने की बात कही गई है. पावरस के सह-संस्थापक ब्रेट वेलिकोविच के मुताबिक, इस डील की शुरुआत में ड्रोन से जुड़ा एक ऑर्डर भी शामिल है. ये सौदा विवादों में इसलिए आया क्योंकि पावरस में ट्रंप के बेटों डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और एरिक ट्रंप की निवेश कंपनी 'अमेरिकन वेंचर्स' की हिस्सेदारी है. ट्रंप के बेटों की कंपनी ने इसी साल फरवरी में पावरस को करीब 55 लाख डॉलर की आर्थिक मदद दी थी. यह पैसा कंपनी को तुरंत काम चलाने और कारोबार बढ़ाने के लिए दिया गया था.
अमेरिका में मचा बवाल
मतलब जिस कंपनी में ट्रंप के बेटों ने इस साल फरवरी में इन्वेस्ट किया..सितंबर महीने में सिर्फ एक साल पहले बनी उसी कंपनी ने पाकिस्तान की आतंकी सेना के उस अधिकारी के साथ MOU साइन कर लिया जिसे ट्रंप फेवरेट फील्ड मार्शल बताते हैं. वैसे अमेरिकी ड्रोन कंपनी पावरस ने ईरानी हमलों के बीच कुछ खाड़ी देशों को भी अपनी एंटी-ड्रोन तकनीक दिखाई. यानी अमेरिकी सरकार जिस इलाके में सैन्य अभियान चला रही है वहां के देशों को अमेरिकी राष्ट्रपति के बेटों के निवेश वाली कंपनी रक्षा तकनीक बेचने की कोशिश कर रही है. हालांकि ट्रंप के बेटों की कंपनी ने सफाई दी है कि पाकिस्तान के साथ समझौते में उनका हाथ नहीं है. लेकिन अमेरिका में लोग इस पर भरोसा नहीं कर रहे हैं.