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विज्ञान के क्षेत्र में भारत एक क्रांतिकारी बदलाव की तरफ बढ़ रहा है, दूसरी तरफ दुनिया में रिश्तों की परिभाषा भी तेजी से बदल रही है. ईरान युद्ध के दौरान इस्लामिक नाटो को लेकर खूब चर्चा हुई. कहा गया कि पाकिस्तान की पहल पर सऊदी अरब और तुर्किए का साथ आ जाना, इस्लामिक दुनिया का पूरा समीकरण बदल सकता है. हमारा अगला विश्लेषण आपको बताएगा कि मिडिल ईस्ट में इस्लामिक नाटो नहीं बल्कि इजरायली नाटो का दबदबा चल रहा है.
इजरायली अखबार यरुशलम पोस्ट ने एक चौंकाने वाली रिपोर्ट छापी है. इस रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब और इजरायल के बीच इंटेलिजेंस यानी खुफिया जानकारी को लेकर सहयोग शुरु हो चुका है . है ना हैरान करने वाली बात, जिस इजरायल को इस्लामिक देश जानी दुश्मन मानते आए हैं, आज उसी इजरायल और इस्लामिक जगत के बड़े देश सऊदी अरब के बीच सहयोग जारी है . यरुशलम पोस्ट की रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि इजरायल और सऊदी अरब के इस नए रिश्ते की कड़ी अमेरिका है . मिडिल ईस्ट के लिए जिम्मेदार अमेरिका की सेंट्रल कमांड के जरिए दोनों देशों के बीच संपर्क स्थापित हुआ है .
मिडिल ईस्ट का बदलता समीकरण
ईरान युद्ध के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के साथ आने से 'इस्लामिक नाटो' की चर्चा तेज हुई थी. हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि क्षेत्र में 'इजरायली नाटो' का प्रभाव बढ़ रहा है. इजरायली अखबार यरुशलम पोस्ट के अनुसार, सऊदी अरब और इजरायल के बीच खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान शुरू हो चुका है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के सुझाव के बावजूद सऊदी अरब ने अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे, लेकिन अब मिडिल ईस्ट की अमेरिकी सेंट्रल कमांड के जरिए दोनों देशों के बीच यह संपर्क स्थापित हुआ है.
इजरायली मदद और सऊदी अरब की नई रणनीति
इजरायल ने सऊदी अरब को हूती गुट के सैन्य अड्डों और लाल सागर में उनकी नौसैनिक घेराबंदी से जुड़ी खुफिया जानकारियां दी हैं. ईरान से सीधे टकराव से बचने के लिए सऊदी अरब ने इन जानकारियों के आधार पर यमन में हूती विरोधी गुटों को सैन्य सहायता देना शुरू किया है, ताकि हूती लड़ाके अपने क्षेत्र में उलझ जाएं और सऊदी सीमा पर हमले घटें.
सऊदी अरब की मदद से इजरायल को लाभ
मिडिल ईस्ट में कतर, ओमान और सऊदी अरब के साथ इजरायल के औपचारिक समझौते नहीं हैं. इस मदद से इजरायल को सीधे कूटनीतिक और रणनीतिक लाभ मिलेंगे:
इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद का इतिहास लक्ष्य प्राप्ति के लिए विरोधी से भी हाथ मिलाने का रहा है. 1980 के दशक के ईरान-इराक युद्ध में इजरायल ने सद्दाम हुसैन के खिलाफ ईरान को मिसाइलें, तोप के गोले और टैंक उपकरण दिए थे. यह रणनीति आचार्य चाणक्य के 'मंडल सिद्धांत' के अनुरूप है, जिसके अनुसार राज्यहित सर्वोपरि होता है और साझा शत्रु को परास्त करने के लिए पारंपरिक प्रतिद्वंदी से भी रणनीतिक सहयोग किया जा सकता है.