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DNA: लाचारी पर 900% तक का भारी मुनाफा! सरकार ने कैंसर पर तो नकेल कसी, पर बाकी जीवनरक्षक दवाओं का क्या?

जिस दवा को खरीदने के लिए मरीजों को अपने घर-जमीन तक बेचने पड़ रहे थे, उसकी कीमत रातों-रात 80 हजार से घटकर 7 हजार कैसे आ गई? यह हम आज के DNA में डिटेल से जानेंगे और ये भी जानेंगे कि कैंसर पर तो नकेल कसी गई है, पर बाकी जीवनरक्षक दवाओं का क्या?

Written By Bhoopendra Rai
Published: Oct 29, 2026, 11:00 PM IST | Updated: Oct 29, 2026, 11:40 PM IST
Image Credit: AI जनरेडेट इमेज (NPPA ने तय की 543 ब्रांडेड दवाओं की अधिकतम कीमत)
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जीवनरक्षक दवाओं के नाम पर चल रही अंधाधुंध मुनाफाखोरी के खिलाफ एक बड़ी जीत मिली है. सरकार के ताजा फैसले के बाद 9 नवंबर से कैंसर की करीब 400 दवाएं 93 प्रतिशत तक सस्ती होने जा रही हैं. नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने मुनाफे की सीमा 30 फीसदी तय कर दी है, जिससे 80 हजार रुपये की दवा अब महज 7,150 रुपये में मिलेगी. हालांकि, लाखों परिवारों को यह बड़ी राहत मिलने के बावजूद जंग अभी अधूरी है, क्योंकि हार्ट अटैक और किडनी जैसी जानलेवा बीमारियों की महंगी दवाएं आज भी आम आदमी की पहुंच से कोसों दूर हैं.

सरकार के आदेश के बाद कैंसर की करीब 400 दवाओं के दाम 90 प्रतिशत तक सस्ते हो जाएंगे. कैंसर की जो दवाएं अभी 80 हजार रुपये में मिल रही हैं, वे अब 7 हजार रुपये में मिलेंगी. मरीजों पर यह कोई एहसान नहीं है, उन दवाओं की असली कीमत पहले भी यही होनी चाहिए थी.

लूट के खिलाफ मुहिम और सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

हमने 6 अप्रैल को दवा के नाम पर होने वाली लूट को उजागर किया था. इस मुनाफाखोरी के खिलाफ लगातार मुहिम चलाई गई. इसके बाद ट्रेड मार्जिन में मनमानी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी बहस हुई. देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी सरकार को सख्त निर्देश दिए और आखिरकार दवा के नाम पर वसूली के खिलाफ सरकार को आदेश देना पड़ा. कैंसर की दवाएं सस्ती हुई हैं, लेकिन लड़ाई अभी अधूरी है. दूसरी जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में मनमानी को रोकना भी उतना ही जरूरी है.

महात्मा गांधी का मानना था कि "लाचारी से मुनाफा कमाना सबसे बड़ा पाप है." लेकिन देश में दवा के कारोबारी जीवनरक्षक दवाओं के नाम पर यही काम कर रहे हैं.

NPPA ने तय की 543 ब्रांडेड दवाओं की अधिकतम कीमत

अब सर्वोच्च अदालत के आदेश के बाद भारत सरकार के नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली 543 ब्रांडेड दवाओं और उनके पैक्स के दाम री-फिक्स कर दिए हैं. मतलब, बाजार में बिकने वाली कैंसर की दवाओं के हर डिब्बे, पत्ते और इंजेक्शन की अधिकतम कीमत तय कर दी गई है. इससे 397 दवाओं के दाम सीधे-सीधे 93 प्रतिशत तक कम हो गए हैं. 146 दवाओं के दाम जस के तस रहेंगे, क्योंकि उनका मुनाफा पहले से ही 30 प्रतिशत के अंदर था. नए फैसले का असर सीधे लोगों की जेब पर क्या होगा, उसे समझिए.

मरीजों को मिलेगी 73 हजार रुपये तक की सीधी बचत

जिस दवा की कीमत 80 हजार रुपये से ज्यादा थी, वह अब 7,150 रुपये में मिलेगी. मतलब, लगभग 73 हजार रुपये की सीधी बचत होगी. ब्रेस्ट कैंसर से जुड़ी एक दवा 40 हजार रुपये से ज्यादा में मिल रही थी. अब उसकी कीमत घटकर 27 हजार रुपये हो गई है. इसमें भी करीब 13 हजार रुपये की बचत होगी. प्रोस्टेट कैंसर की एक दवा, जो 28 हजार रुपये में बिकती थी, अब करीब 2,400 रुपये में मिल जाएगी.

30 प्रतिशत मुनाफे की सीमा और 2,500 करोड़ की बचत

अस्पताल और थोक विक्रेता इन दवाओं को कंपनियों से बहुत कम दाम पर खरीदते थे, लेकिन मरीजों को डिब्बे पर छपी MRP पर बेचकर 400 से 900 प्रतिशत तक का मुनाफा कमाते थे. अब सरकार ने नियम बना दिया है कि कोई भी अस्पताल या डिस्ट्रीब्यूटर खरीद मूल्य पर 30 प्रतिशत से ज्यादा का मुनाफा नहीं जोड़ सकता. 9 नवंबर से पूरे देश में लोगों को नई और घटी हुई कीमतों पर दवाएं मिलेंगी. इससे जिन परिवारों में कैंसर के मरीज हैं, उन्हें साल में 2,500 करोड़ रुपये तक की बचत होगी. जाहिर है कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे परिवारों के लिए यह बड़ी राहत की खबर है.

कैंसर की फाइनेंशियल टॉक्सिसिटी और कर्ज का संकट

एक कड़वी सच्चाई यह है कि कैंसर सिर्फ एक इंसान की जिंदगी खत्म नहीं करता. कैंसर के इलाज की फाइनेंशियल टॉक्सिसिटी भी इस बीमारी के शारीरिक दुष्प्रभावों जितनी ही घातक है, क्योंकि कैंसर का इलाज कराते-कराते लोगों के घर, जमीन-जायदाद, सब कुछ खत्म हो जाता है. लोग कर्ज में भी डूब जाते हैं और इसकी एक बड़ी वजह दवाओं के दाम में होने वाली लूट है. इसीलिए हमने सबसे पहले 6 अप्रैल को लोगों का दर्द दिखाया था और बताया था कि दवाओं के कारोबारी किस तरह जीवनरक्षक दवाओं के नाम पर वसूली कर रहे हैं.

6 अप्रैल से पहले 80 हजार रुपये की दवा 7 हजार रुपये में मिलना एक कल्पना जैसी लग रही थी. इस लूट को रोकना लोगों के लिए नामुमकिन जैसा लग रहा था, लेकिन असंभव सिर्फ एक शब्द था, जब तक जनहित में हमारी कोशिश शुरू नहीं हुई थी. लगातार आवाज उठाने का असर करीब 200 दिनों के बाद दिख रहा है, लेकिन सवाल है कि जो सख्ती सरकार ने आज दिखाई है, वह पहले क्यों नहीं दिखाई गई? क्या ऐसी कार्रवाई तभी होगी, जब मीडिया मुद्दा उठाएगा और सुप्रीम कोर्ट बार-बार फटकार लगाएगा? आम लोगों से दवा के नाम पर होने वाली इस लूट के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नरसंहार, एक्सटॉर्शन और दिनदहाड़े डकैती जैसे सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया था. सोचिए, यह कितना गंभीर विषय है.

हार्ट और किडनी की दवाओं पर भी लूट का खेल

हालांकि, सरकार ने अब जो किया है, वह एक बहुत ही शुभ संकेत है. लेकिन जैसा कि हमने बताया, यह जीत तब तक अधूरी है, जब तक सारी जीवनरक्षक दवाओं के दाम पर लगाम नहीं लग जाती. कैंसर की तरह हार्ट और किडनी की बीमारियों की दवाओं के मामले में भी दवा कारोबारी मरीजों को लूट रहे हैं.

देश में हार्ट की बीमारी कैंसर से भी ज्यादा तेजी से फैल रही है. राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन के मुताबिक, 2017-18 में भारत में प्रति एक लाख की आबादी पर करीब सवा 13 सौ लोगों को हार्ट से जुड़ी बीमारी थी, जो अब बढ़कर करीब 3,900 हो गई है. देश में रिपोर्ट की जाने वाली कुल बीमारियों में हृदय रोगों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा यानी 25.6 प्रतिशत दर्ज की गई है.

हार्ट अटैक के इंजेक्शन पर 60 हजार तक का खर्च

देश में सालाना लगभग 38.1 लाख लोग हृदय संबंधी गंभीर समस्याओं के कारण अस्पताल में भर्ती होते हैं. गंभीर हार्ट अटैक से पीड़ित मरीजों को एक दवा दी जाती है, 'टेनेक्टेप्लेस 40 एमजी', जिसकी एक वायल की कीमत 51 हजार रुपये से ज्यादा है. इसके अलावा, इस पर GST अलग से लगता है. इसी तरह, 'टेनेक्टेप्लेस 50 एमजी' की कीमत तो 60 हजार रुपये प्रति वायल से भी ज्यादा है. इस पर भी GST अलग से देना पड़ता है.

दूसरी जीवनरक्षक दवाओं पर भी कैपिंग की मांग

सोचिए, जब इतनी महंगी दवाइयां खरीदनी पड़ेंगी, तो मरीज के परिजनों की क्या स्थिति होगी? मरीज से ज्यादा उसके परिजनों की धड़कन बढ़ जाएगी. इसी तरह किडनी और लिवर जैसी बीमारियों की दवाओं को भी मुनाफाखोर लूट का जरिया बनाए हुए हैं. डॉक्टर्स का भी कहना है कि हार्ट, लिवर, किडनी जैसी बीमारी की दवाइयों पर भी प्राइस कैपिंग लगाने की आवश्यकता है.

इससे पहले कि सुप्रीम कोर्ट को फिर से दखल देना पड़े और सख्त टिप्पणियां करनी पड़ें, सरकार को हार्ट, किडनी और लिवर जैसी बीमारियों की महंगी दवाओं के दाम कम करने पर विचार करना होगा. क्योंकि जिस तरह कैंसर के मरीज महंगी दवाइयां खरीदकर लूट के शिकार हो रहे हैं, उसी तरह हार्ट के गंभीर मरीजों से भी दवा कारोबारी जान बचाने के नाम पर जबरन वसूली कर रहे हैं.

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पत्रकारिता में 9 साल से सक्रिय भूपेंद्र कुमार राय Zee News में सीनियर सब एडिटर के तौर पर न्यूज टीम का हिस्सा हैं, देश विदेशी की खबरें कवर करते हैं. 2017 में ETV Bharat (हैदराबाद) से करियर की शुरुआत करने के बाद वे 2020 में Zee News पहुंचे, जहां 2022 तक काम किया. 2023 में News24 की स्पोर्ट्स टीम को लीड करने का मौका मिला. इसके बाद India Daily Live में बतौर चीफ सब एडिटर स्पोर्ट्स टीम के साथ जुड़े. 2024 में दोबारा News24 लौटे और नई स्पोर्ट्स वेबसाइट लॉन्चिंग का अहम हिस्सा रहे. अक्टूबर 2025 में News24 से अलविदा लेकर एक बार फिर Zee News पहुंचे हैं. खेलों में गहरी रुचि रखते हैं और क्रिकेट वर्ल्ड कप, एशियन गेम्स, ओलंपिक गेम्स, हॉकी वर्ल्ड कप समेत बड़े खेल इवेंट को कवर करने का अनुभव है. ब्रेकिंग न्यूज, क्रिकेट एनालिसिस और किस्से-कहानियों पर अच्छी पकड़ है. जी न्यूज में खेल से जुड़ी खबरों के बाद अब न्यूज टीम के साथ रियलटाइम न्यूज पर काम कर रहे हैं. एक्सप्लेनर और किसी भी मुद्दे पर रिसर्च के साथ उसे आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं. आप Bhoopendra.Rai@zeemedia.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facebook से जुड़ सकते हैं.
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