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जापान की तरह भारत का एक और विश्वसनीय मित्र इजरायल है, जहां चुनाव के दौरान वोट चोरी का आरोप लगा है. इजरायल के चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी ने वोट चोरी का गंभीर आरोप लगाया है. ये आरोप अरब दलों पर हैं, जिन्हें इस चुनाव में रिकॉर्ड बढ़त मिलती दिख रही है.
ताजा आंकड़ों के मुताबिक नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें, विपक्षी गठबंधन को 48 और अरब दलों को कुल 19 सीटें मिलने का अनुमान है. इजरायल की 120 सदस्यों वाली संसद में बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी हैं. अरब पार्टियों की बढ़त के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने वोट में धांधली और अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगाए हैं.
नेतन्याहू की पार्टी का दावा है कि कुछ मतदान केंद्रों पर पैसे देकर वोट दिलाने, मतदाताओं को धमकाने, हिंसा, मतपत्रों में गड़बड़ी और एक से ज्यादा बार वोट डालने जैसी घटनाएं हुईं. लिकुड पार्टी का आरोप है कि हजारों लिफाफों में नकदी के साथ रा-आम पार्टी की बैलेट स्लिप मिली हैं. लिकुड ने अपने दावे में यह भी कहा कि उसके पास गवाहियां और दूसरे सबूत मौजूद हैं. पार्टी ने मामले की व्यापक जांच की मांग की है.
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— Zee News (@ZeeNews) October 29, 2026
इजरायली पुलिस ने वोट चोरी के दावों का खंडन किया है. उसका साफ कहना है कि इस तरह के सबूत उसे नहीं मिले हैं. हालांकि, आरोपों की जांच चल रही है. आज भी इसी मामले से जुड़े चार और रा-आम कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की खबर आई है. दो दिन पहले दक्षिणी इजरायल में तीन लोगों को रा-आम के समर्थन में कथित वोट खरीदने के संदेह में गिरफ्तार भी किया गया था. लेकिन उनमें से एक को सबूत के अभाव में बरी कर दिया गया है. बाकी दो आरोपियों से पूछताछ की जा रही है.
लिकुड पार्टी ने चुनाव आयोग, पुलिस और घरेलू खुफिया एजेंसी शिन-बेट को आधिकारिक दस्तावेज सौंपकर गंभीर शिकायतें दर्ज कराई हैं. पार्टी का दावा है कि मतदान के दौरान अनियमितताएं हुईं और मतदाताओं को प्रभावित करने के प्रयास किए गए. दूसरी तरफ, विपक्षी दलों ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है और इन्हें राजनीतिक बौखलाहट करार दिया है.
जब भी किसी सत्तासीन नेतृत्व को अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर अनिश्चितता दिखती है, तो चुनाव प्रणाली की पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े करने की यह रणनीति दुनिया भर की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में देखी जाती रही है.
इस बीच, इजरायली पुलिस ने यह माना है कि चुनाव के दिन मतदान से जुड़ी गड़बड़ी की घटनाएं बहुत कम थीं. पुलिस ने चुनाव में धांधली से इनकार नहीं किया है. लेकिन पुलिस ने अपने बयान में यह भी जोड़ा कि गिरफ्तारियों और जांच में अभी तक अरब दलों पर वोट चुराए जाने का कोई आधार नहीं मिला है.
इजरायल की केंद्रीय चुनाव समिति मतदान की पूरी प्रक्रिया के दौरान बेहद सतर्कता और सावधानी बरत रही है. विदेशी हस्तक्षेप की आशंका पर भी जांच के निर्देश दिए गए हैं. केंद्रीय चुनाव समिति के प्रमुख ने सुरक्षा एजेंसी शिन-बेट से उन आरोपों की जांच करने को कहा है, जिनमें विदेशी स्रोतों से इजरायल के हितों के खिलाफ संभावित फंडिंग की बात कही गई है.
इजरायल के हालिया राजनीतिक संकट की गंभीरता को समझना जरूरी है. इजरायल के इतिहास में पहली बार अरब मतदाता निर्णायक शक्ति बनकर उभरे हैं. अरब-इजरायली राजनीतिक पार्टी रा-आम और तीन अन्य अरब दलों ने चुनाव में बेहतरीन प्रदर्शन किया है. यह इस बात का प्रमाण है कि इजरायल के भीतर अल्पसंख्यक मतदाताओं की राजनीतिक हिस्सेदारी अब मजबूत हो चुकी है. अब अरब मतदाताओं की उपेक्षा करके किसी भी दल के लिए स्थिर सरकार चलाना इजरायल में संभव नहीं लग रहा है.
जो इजरायल मुस्लिम देशों से घिरा है, अब तक यह छोटा सा यहूदी देश उन देशों से अकेले मुकाबला करता आया है और जीतता आया है. लेकिन इसी इजरायल की संसद में अब अरब दलों की आवाज पहले से ज्यादा मजबूत होकर उभरी है. इन सीटों के दम पर वे सरकार बनाने के गणित को प्रभावित कर सकते हैं और फिलिस्तीन के मुद्दे, अरब समुदायों के लिए सरकारी बजट, समान अधिकार और सुरक्षा जैसे सवालों पर दबाव भी बढ़ा सकते हैं.
असल में, इजरायल में अरब दल दो मुख्य खेमों में बंटे हुए हैं. हदाश, ता-आल और बलद मिलकर चुनावी मसौदा तैयार करते आए हैं, जबकि मंसूर अब्बास की रा-आम पार्टी अलग है. इन दलों में मतभेद इस बात पर है कि इजरायल की सरकार में शामिल होकर बदलाव लाया जाए या उससे बाहर रहकर विरोध किया जाए.
हालांकि, अरब मूल के लोगों के अधिकार, अपराध पर लगाम, शिक्षा और विकास के साथ फिलिस्तीन के लिए अलग देश का समर्थन ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर उनकी सोच काफी मिलती है.
लेकिन यह भी सच है कि अरब दलों की बढ़त का मतलब यह नहीं कि इजरायल की नीतियां तुरंत बदल जाएंगी. क्योंकि फिलिस्तीन का मुद्दा, गाजा में युद्ध और अरब दलों को सरकार में शामिल करने को लेकर विपक्ष के भीतर मतभेद अब भी हैं. इसलिए उनके पास सीटें बढ़ने से राजनीतिक दबाव जरूर बढ़ा है, लेकिन उसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सा गठबंधन बनता है और समझौते में उनकी मांगों को कितनी जगह मिलती है.
इजरायली संसद में जब प्रमुख राजनीतिक ब्लॉक बहुमत से पीछे रह जाते हैं, तो अरब दल किंगमेकर की भूमिका में आ जाते हैं. इजरायल में अरब दल पहले भी सरकार बनाने में अहम भूमिका निभा चुके हैं. 2021 में मंसूर अब्बास की रा-आम पार्टी ने सिर्फ 4 सीटों के साथ गठबंधन सरकार को बहुमत दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी.
यानी अरब दलों की बढ़त सिर्फ सीटों का आंकड़ा भर नहीं है, बल्कि नेतन्याहू की सत्ता का भविष्य तय करने वाला समीकरण भी बन सकती है. इसी चिंता को देखते हुए इजरायल में आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया है और नई सरकार के गठन की तारीख तक इस तरह के आरोपों का सिलसिला थमने वाला नहीं है. इजरायल में चुनाव परिणाम प्रमाणित होने की प्रक्रिया 4 नवंबर तक पूरी होने की उम्मीद है.