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DNA : जंतर-मंतर नहीं तो सुप्रीम कोर्ट ही सही. कांग्रेस को खुद पर अब इतना भरोसा होने लगा है कि उनके नेता कह रहे हैं कि वो जहां खड़े होंगे, वहीं जंतर-मंतर बन जाएगा. लेकिन,आज से जंतर-मंतर का आधार कार्ड बदल गया है. आज से उसकी पहचान बदल गई है. अब तक दिल्ली के जंतर-मंतर की पहचान एक प्रदर्शन-स्थल के रूप में थी. लेकिन, आज जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से बाहर कर दिया गया है. इसका मतलब ये है कि अब यहां कोई धरना-प्रदर्शन नहीं हो सकेगा. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने विरोध प्रदर्शन की वैकल्पिक जगह की पहचान करने के लिए एक कमेटी का गठन किया था. समिति की सिफारिशों के आधार पर जंतर मंतर को प्रदर्शन-स्थल की सूची से हटाने का फैसला लिया गया है.
जंतर-मंतर की जगह अब 3 नए प्रदर्शन स्थल बनाए गए हैं. इनमें पहला नाम है रामलीला मैदान का, दूसरा नाम है बुराड़ी ग्राउंड और तीसरा नाम है CBD ग्राउंड शाहदरा. इनमें से रामलीला मैदान सेंट्रल दिल्ली में है और ये जंतर मंतर से करीब 3 किलोमीटर दूर है. बुराड़ी ग्राउंड नॉर्थ दिल्ली में है और ये जंतर मंतर से करीब 18 किलोमीटर दूर है. जबकि CBD ग्राउंड ईस्ट दिल्ली में है और ये जंतर मंतर से करीब 12 किलोमीटर दूर है. यानी अगर रामलीला मैदान को छोड़ दिया जाए तो बाक़ी दोनों प्रदर्शन स्थल जंतर मंतर से काफ़ी दूर हैं.इस फ़ैसले का दिल्ली में होने वाले आंदोलनों पर क्या असर होगा, ये पता होने से पहले आपको जंतर मंतर का इतिहास जानना चाहिए.
जंतर-मंतर शब्द संस्कृत के यंत्र और मंत्र शब्दों से मिलकर बना है. जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने खगोलीय वेधशाला के रूप में 1724 में इसका निर्माण करवाया. इससे ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति, सूर्य की गति और समय की सटीक गणना की जाती थी. इसी के बगल में जंतर मंतर रोड है जहां धरना-प्रदर्शन होता है. दिल्ली के बीचों-बीच स्थित जंतर-मंतर एक ऐसी जगह है जिसे पिछले कुछ दशकों के दौरान धरना-प्रदर्शन के साथ जोड़ा जाता रहा है. आंदोलन का ज़िक्र होते ही जंतर मंतर की तस्वीर आपके मन में भी उभर जाती होगी. मुद्दा चाहे छोटा हो या बड़ा- आंदोलन की पसंदीदा जगह जंतर मंतर ही है. संसद भवन और मंत्रालयों के नजदीक होना जंतर मंतर को ख़ास बनाता है.अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए जंतर मंतर पर प्रदर्शन सबसे आसान जरिया बन गया. इसलिए देश के कोने-कोने से प्रदर्शनकारी यहां आते थे.
1988 में इंडिया गेट के पास बोट क्लब पर किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में आंदोलन के बाद वहां की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार की चिंता बढ़ी. इसकी वजह से वहां प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई. इसके बाद 1993 में प्रदर्शन की जगह के रूप में बोट क्लब को हटाकर जंतर मंतर को चुना गया. ये जगह संसद के नजदीक थी लेकिन बोट क्लब की तुलना में यहां सुरक्षा से जुड़ी दिक़्क़तें कम थीं. इस तरह पिछले 33 सालों से जंतर मंतर पर प्रदर्शन हो रहे थे. हालांकि इसके लिए कोई सरकारी आदेश जारी नहीं किया गया था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 1993 में जंतर मंतर पर पहला प्रदर्शन दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ यानी डूसू के अध्यक्ष रहे आशीष सूद के नेतृत्व में हुआ था.आशीष सूद इस समय दिल्ली सरकार में मंत्री भी हैं. इसके बाद से जंतर मंतर हज़ारों छोटे-बड़े प्रदर्शनों का गवाह बन चुका है. इस दौरान वहां कई ऐतिहासिक आंदोलन भी हुए.
अप्रैल 2011 में अन्ना हज़ारे ने 5 दिनों तक अपना आंदोलन जंतर मंतर पर किया. भीड़ बढ़ने के बाद इसे रामलीला मैदान शिफ्ट किया गया. जून 2015 में वन रैंक वन पेंशन की मांग को लेकर पूर्व सैनिकों ने लंबे समय तक जंतर मंतर पर आंदोलन किया. जनवरी और मई 2023 में महिला पहलवानों ने यौन शोषण के मुद्दे पर यहां प्रदर्शन किया. सबसे हाल में यहां पेपर लीक के ख़िलाफ CJP का आंदोलन हुआ. 36 दिनों तक आंदोलन चलने के बाद शिक्षा मंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े से ये आंदोलन ख़त्म हुआ यानी जंतर मंतर पर प्रदर्शन का एक समृद्ध इतिहास रहा है. लेकिन दिल्ली पुलिस की नई गाइडलाइन के बाद यहां आंदोलन पर पूर्ण विराम लगने की संभावना है. बीजेपी इसे सही बता रही है, वहीं कांग्रेस को इस फैसले की परवाह नहीं है.
अक्टूबर 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी NGT ने आस-पास रहने वाले लोगों की शिकायतों पर सुप्रीम कोर्ट से यहां प्रदर्शन पर पाबंदी लगाने की अपील की थी. जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण प्रतिबंध लगाने के ख़िलाफ़ फैसला दिया था. हालांकि आंदोलन को लेकर कुछ नियम बनाने को कहा था. इसके बाद दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर पर प्रदर्शन में अधिकतम 1,000 लोगों के शामिल होने समेत कुछ और नियम बनाए. लेकिन इन नियमों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता था. हज़ारों की संख्या में प्रदर्शनकारी यहां इकट्ठा होते थे. इससे अक्सर पूरे इलाक़े का ट्रैफिक चरमरा जाता था. साथ ही ये इलाक़ा दिल्ली के मशहूर कमर्शियल सेंटर कनॉट प्लेस के बिल्कुल पास है. यहां ट्रैफिक बंद होने पर कनॉट प्लेस जाना मुश्किल हो जाता है. संसद भवन भी यहां से ज़्यादा दूर नहीं है.केंद्र सरकार के ज़्यादातर दफ़्तर भी इसी के आस-पास हैं. जुलाई में CJP के आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारी संसद के नज़दीक पहुंच गए थे. माना जाता है कि इन्हीं कारणों से जंतर मंतर को प्रदर्शन स्थल की लिस्ट से हटा दिया गया है.
3 दिन पहले व्यापारियों के संगठन CTI ने भी प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर जंतर मंतर की जगह बाहरी दिल्ली में स्थायी प्रोटेस्ट ज़ोन बनाने की मांग की थी. उसकी दलील थी कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से व्यापारियों को काफ़ी नुक़सान होता है. अब उन जगहों के बारे में भी जानना चाहिए जिन्हें वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल के रूप में घोषित किया गया है. इनमें पहला नाम रामलीला मैदान का है. रामलीला के आयोजन के कारण इस मैदान का नाम रामलीला मैदान रखा गया. क़रीब 12 एकड़ में फैले इस मैदान में 1 लाख की भीड़ समा सकती है. रामलीला मैदान कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह भी बन चुका है. 25 जून 1975 को समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने इसी मैदान से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की थी. इसके कुछ घंटे बाद देश में आपातकाल घोषित हुआ.
2011 में अन्ना हज़ारे ने जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर रामलीला मैदान में ही आंदोलन किया. रामलीला मैदान में राजनीतिक पार्टियों की रैलियां भी होती रहती हैं और ये दिल्ली में सत्ता के केंद्र से नजदीक भी है. लेकिन, बुराड़ी ग्राउंड और शाहदरा का CBD ग्राउंड आम तौर पर प्रदर्शनों के लिए नहीं जाना जाता. यहां भीड़ तो काफ़ी जुट सकती है लेकिन संसद और मंत्रालयों से ये जगह काफ़ी दूर हैं. यहां तक पहुंचना भी इतना आसान नहीं है जितना जंतर-मंतर पहुंचना. ऐसे में आंदोलन असरदार होगा या नहीं, इसको लेकर सवाल उठेंगे। यही वजह है कि 3 कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन के दौरान किसान संगठनों ने बुराड़ी ग्राउंड जाने से इनकार कर दिया था. वो महीनों तक दिल्ली के बॉर्डर पर ही बैठे रहे. हालांकि, जंतर-मंतर से दूर प्रदर्शन होने पर दिल्ली के आम लोगों और व्यापारियों की दिक्कत काफी हद तक दूर हो जाएगी.