सिर्फ पर्यावरण नहीं, अब तिजोरी पर संकट: जानिए कैसे देश की 20 फीसदी जीडीपी बहा ले जाएंगे हिमालयी ग्लेशियर?
नेपाल और तिब्बत में पिछले महीने आई भीषण बाढ़ का मंजर पूरी दुनिया ने देखा. लेकिन अब जिस खतरे की रिपोर्ट आई है, वो लोगों की जान लेने से बढ़कर अब देश की इकोनॉमी तक पहुंच गया है. अगर समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो भारत की 20% GDP हिमालय के ग्लेशियर की तरह बह जाएगी. आइए डिटेल से जानते हैं...
नेपाल और तिब्बत में आई भीषण बाढ़ अभी लोग भूले भी नहीं थे कि हिमालय के ग्लेशियरों को लेकर एक नई और डराने वाली रिपोर्ट सामने आ गई है. यह खतरा अब सिर्फ पहाड़ों या पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे हमारी जेब और देश की तिजोरी से जुड़ चुका है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भारत की 20 फीसदी जीडीपी इन पिघलते ग्लेशियरों के साथ बह सकती है. देश की पांचवां हिस्सा अर्थव्यवस्था दांव पर लगने का सीधा मतलब है करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी, खेती और बिजली व्यवस्था पर बहुत बड़ा संकट.
एक नई रिसर्च के मुताबिक, हिमालय एक खतरनाक स्थिति के करीब पहुंच रहा है. ग्लेशियर पहले से ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं. ग्लोबल कंसल्टेंसी कंपनी सिस्टमिक की इस रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालय के ग्लेशियर की बर्फ एक दशक पहले के मुकाबले अब 65% ज्यादा तेजी से कम हो रही है. भारत में ग्लेशियर के पिघलने से बनी लगभग 200 झीलें खतरे वाले क्षेत्र में हैं. इनमें से 56 बहुत ज्यादा खतरनाक इलाके में हैं.
झीलें बन रहीं टाइम बम, आजीविका पर संकट
ग्लेशियर पिघलकर पीछे हटते हैं, तो उनकी जगह झीलें बनती हैं. ये धीरे-धीरे बड़ी होती जाती हैं. इन झीलों का पानी चट्टानों और बर्फ के ऐसे ढेर से रुका होता है, जो मजबूत नहीं होते. इसकी वजह से प्राकृतिक आपदाओं का खतरा तो बढ़ता ही है, साथ ही अर्थव्यवस्था भी संकट में आएगी. इससे लाखों लोगों की जिंदगी और रोजी-रोटी दांव पर लग जाएगी.
देश की 20% जीडीपी हिमालय के पानी पर निर्भर
हिमालय से मिलने वाला पानी भारत की करीब 20% GDP का आधार है. हिमालय से जो नदियां आती हैं, उससे चावल-गेहूं जैसी फसलों की खेती होती है. गंगा-यमुना का बेसिन देश के 12 राज्यों में फैला हुआ है. साथ ही हिमालय से आने वाले पानी से बिजली का उत्पादन भी होता है. धार्मिक यात्रा से जुड़ी अर्थव्यवस्था भी इस पर काफी हद तक निर्भर है. ऋषिकेश, हरिद्वार और चारधाम जैसे धार्मिक पर्यटन के केंद्र इन्हीं नदियों पर आधारित हैं.जिस कुदरती इंतजाम पर ये अर्थव्यवस्था टिकी है, वो तेजी से बर्फ पिघलने के कारण एक खतरनाक मोड़ के करीब पहुंच रही है. इस पर खतरे का मतलब है लोगों का रोजगार जाना, खाने-पीने के सामान की किल्लत और गरीबी का बढ़ना.
ग्लेशियर बचाने के जरूरी उपाय और समाधान
जिस रिसर्च में जलवायु परिवर्तन की वजह से देश की अर्थव्यवस्था पर संकट बताया गया है, उसी में कुछ सुझाव भी दिए गए हैं. इन सुझावों की मदद से ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार कम की जा सकती है.
ब्लैक कार्बन और निगरानी की कमी बड़ी चुनौती
इन उपायों में सबसे जरूरी है ब्लैक कार्बन का उत्सर्जन कम करना. यानी गाड़ियों, प्लांट और ईंट-भट्ठों से निकलने वाला धुआं. जब ये उड़कर हिमालय पर जमा होता है, तो बर्फ की सतह काली पड़ जाती है. बर्फ पर जमने वाली कालिख सूरज की ज्यादा रोशनी सोखती है. इससे बर्फ तेजी से पिघलने लगती है.
दूसरा उपाय है ग्लेशियर की निगरानी बढ़ाना, लेकिन मौजूदा स्थिति ये है कि 40,000 में से केवल 21 ग्लेशियर की विस्तार से निगरानी की जा रही है.
एक और उपाय है हिमालय में पर्यटन के विकास का तरीका बदला जाए. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के हिमालयी क्षेत्र में हर साल करीब 40 करोड़ पर्यटक आते हैं. यहां ऐसा आर्थिक ढांचा तैयार करना चाहिए, जिससे पर्यटन की आमदनी दोबारा यहीं पर निवेश की जाए. साथ ही पर्यावरण बचाने को प्राथमिकता मिले.
वैश्विक साझेदारी से ही टलेगा महासंकट
हालांकि इस खतरे से केवल एक देश नहीं निपट सकता. अलग-अलग देशों को मिलकर ग्लेशियर की निगरानी करने की जरूरत है. मिलकर क्लाइमेट चेंज से लड़ना होगा. ये केवल लोगों की जान बचाने के लिए नहीं, बल्कि हिमालय पर निर्भर करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी और अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए भी जरूरी है.