झूठे नैरेटिव से रची गई साजिश: उज्जैन में समझौते के बावजूद कट्टरपंथियों ने फैलाई अफवाह, महिलाओं को आगे कर की गई हिंसा
Ujjain Mosque Violence News: उज्जैन में मस्जिद तोड़े जाने की झूठी अफवाह फैलाकर हिंसा की साजिश रची गई थी. इसके लिए योजना के तहत महिलाओं को आगे किया गया. साथ ही पथराव के लिए पत्थरों का इंतजाम किया गया.
Reasons for Ujjain Mosque Violence: महाकाल नगरी उज्जैन में मार्च 2028 में सिंहस्थ कुंभ होना है. इस धार्मिक उत्सव में करोड़ों श्रद्धालु शामिल होंगे. उनकी सुविधा के लिए अभी से तैयारी हो रही है. यातायात को सुगम बनाने के लिए सड़कों को चौड़ा किया जा रहा है. कई धर्मस्थल सड़क चौड़ा करने के लिए तोड़े जा चुके हैं. करोड़ों लोगों की सुविधा के लिए उज्जैन की शाही मस्जिद का एक हिस्सा भी तोड़ा जाना है.
ब्रेनवाश कर हाथों में थमा दिए पत्थर
ध्यान से जानिएगा, पूरी मस्जिद नहीं टूटने वाली है. मस्जिद के कुल निर्माण का सिर्फ 10 प्रतिशत हिस्सा तोड़ा जाना था. मस्जिद मैनेजमेंट भी इसके लिए तैयार था. मस्जिद कमेटी खुद तोड़फोड़ करने के लिए तैयार थी. लेकिन आज जब कार्रवाई शुरू हुई तो कट्टरपंथियों ने लोगों को उकसाया. उनका ब्रेनवॉश किया और उनके हाथ में पत्थर थमा दिए. हाथों में पत्थर लिए भीड़ हिंसक हो गई. पुलिस पर पथराव हुआ. हैरानी की बात तो ये है कि, सलेक्टिव सोच और सलेक्टिव अप्रोच की राजनीति करनेवाले असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता इन पत्थरबाजों को गांधीवादी बता रहे हैं. इसलिए आज हम पत्थरबाजों को गांधीवादी बतानेवाली इस सलेक्टिव सोच की वैचारिक मरम्मत करेंगे.
डॉ. भीमराव आंबेडकर का विचार है कि विकास केवल कुछ लोगों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का होना चाहिए. राष्ट्र की प्रगति के लिए गतिशीलता और आधुनिकता अनिवार्य हैं, और इसमें आने वाली बाधाओं को दूर करना समाज का कर्तव्य है.
समाज हित में सड़क चौड़ी करने के लिए उज्जैन नगर निगम ने शाही मस्जिद के 10 प्रतिशत हिस्से को तोड़ने का निर्णय किया. रो याद रखिए, मस्जिद का सिर्फ एक हिस्सा तोड़ा जाना था. पूरी मस्जिद नहीं. लोगों की सुविधा के लिए कंठाल चौराहे से गोपाल मंदिर तक डेढ़ किलोमीटर एरिया की सड़क 15 मीटर चौड़ी की जानी है. इसके लिए 323 मकान और 15 धर्मस्थलों में तोड़फोड़ की कार्रवाई होनी है. 12 धर्मस्थल हटाए जा चुके हैं. मस्जिद का एक हिस्सा इसी अभियान के तहत हटाया जाना था.
मस्जिद को लेकर झूठा नैरेटिव गढ़ा गया
नगर निगम के फैसले के बाद मस्जिद कमेटी ने कानूनी लड़ाई लड़ी. कानूनी राहत नहीं मिली तो मस्जिद कमेटी इसके लिए तैयार हो गई थी. मस्जिद कमेटी ने कहा कि हम वो हिस्सा गिरा देंगे. लेकिन कट्टरपंथियों को समाजहित में होने वाला ये काम पसंद नहीं आया. अफवाह फैलाई गई कि पूरी मस्जिद गिराई जाएगी. ऐसा करके लोगों की भावनाओं को भड़काया गया.
मस्जिद खतरे में है जैसा झूठा नैरेटिव गढ़ा. लोगों को इमोशनली ब्लैकमेल किया गया. उन्हें उकसाया गया. फिर भीड़ की शक्ल में पत्थर थमा कर उन्हें सडक पर उतार दिया गया. पत्थर हाथ में लिए लोग सड़क पर उतरे. फिर हालात बेकाबू हो गए.
ये एक पैटर्न है. लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काओ. उन्हें कानून-व्यवस्था के खिलाफ खड़ा करो. उज्जैन में वही सोच काम कर रही थी, जो पहले भी देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी ही हिंसा की साजिश कर चुकी है. सोचिए मस्जिद कमेटी नगर निगम का फैसला मानने के लिए तैयार थी. लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी गई. कोर्ट ने भी मस्जिद के एक हिस्से को गिराने के फैसले को सही बताया. लेकिन कट्टरपंथी इसे नहीं मानते हैं.
अदालतों में हारने के बाद तोड़फोड़ के लिए राजी हुई कमेटी
जानते हैं, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच की डबल बेंच ने आज मस्जिद का हिस्सा तोड़ने के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. 14 अगस्त को उज्जैन नगर निगम ने मस्जिद का एक हिस्सा तोड़ने के लिए पहला नोटिस जारी किया था. 18 से 21 अगस्त तक मस्जिद से जुड़े प्रतिनिधियों ने निगम को जवाब दिया, नगर निगम के सामने आपना पक्ष रखा. 25 से 27 अगस्त को निगम ने आगे की कार्रवाई के लिए दूसरा नोटिस जारी किया.
सभी पक्षों को सुनने के बाद नगर निगम ने 1 सितंबर को मस्जिद का एक हिस्सा तोड़ने का अंतिम आदेश जारी किया था. इसके खिलाफ दायर दो याचिकाओं को 9 सितंबर को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने खारिज कर दिया था. समझिए, कोर्ट ने मस्जिद का एक हिस्सा गिराने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. मस्जिद कमेटी सार्वजनिक हित में इसके लिए तैयार भी थी लेकिन कट्टरपंथी नहीं माने.
कट्टरपंथियों को कानून के आदेश और मस्जिद कमेटी के फैसले की फिक्र नहीं थी. आज जिस शाही मस्जिद का एक हिस्सा हटाने को लेकर कट्टरपंथियों ने हिंसा की साजिश रची. उसी मस्जिद के पीछे बोहरा समाज का धर्मस्थल भी था. लोगों के हित में बोहरा समाज ने शांतिपूर्ण तरीके से कानून का पालन करते हुए अपने धर्मस्थल को तोड़ा था. कानूनी विकल्प बंद होने के बाद शाही मस्जिद कमेटी भी तैयार थी. आज सुबह 8 बजकर 45 मिनट पर कमेटी ने मस्जिद से जुड़े एक हिस्से को गिराना शुरू किया.
पूरी योजना बनाकर किया गया पथराव
यहीं से सीन में कट्टरपंथियों की एंट्री हुई. दो बार उपद्रवियों की भीड़ ने पथराव किया. पहली बार सुबह 9 बजकर 45 मिनट पर और दूसरी बार सुबह 11 बजे सुरक्षाबलों को निशाना बनाया गया. पथराव अचानक नहीं था. इसके लिए पूरी प्लानिंग की गई थी. सुरक्षाबलों को निशाना बनाने के लिए बकायदा पत्थर जुटाए गए थे. पहले महिलाओं को आगे कर बैरिकेडिंग तोड़ने की साजिश हुई. जब ये साजिश नाकाम हुई तो पथराव हुआ.
पुलिस ने पहले दो घंटे तक लोगों को समझाने की कोशिश की. कई राउंड की बातचीत हुई. बात बन सकती थी. लेकिन कट्टरपंथी बातचीत को सफल नहीं होने देना चाहते थे. कट्टरपंथियों ने पहले मस्जिद के मौलाना का घर घेर लिया. इतना ही नहीं, जब मस्जिद कमेटी के सदस्य चिन्हित किए गए हिस्से को गिरा रहे थे तो उसका एक इमोशनल वीडियो बनाकर वायरल किया गया.
इस वीडियो का मकसद आम मुसलमानों की धार्मिक भावना को भड़काना था. उन्हें हिंसा के लिए उकसाना था. लेकिन पुलिस और प्रशासन ने धैर्य से उपद्रवी भीड़ को कंट्रोल किया. समझिए पथराव की साजिश के पीछे जो कट्टरपंथी थे, उन्होंने बचाव के लिए अपना चेहरा छिपा लिया था. उन्हें पता था कि कैमरे में कैद हुए तो पकड़े जाएंगे और पुलिस गिरफ्तार करेगी. हिंसा की साजिश के आरोप में कानूनी शिकंजा कसेगा. इसलिए इन शातिर कट्टरपंथियों ने अपने बचाव की पूरी तैयारी की थी.
प्लानिंग के तहत महिलाओं को किया गया आगे
सिर्फ इतना ही नहीं बहुत शातिराना तरीके से प्लानिंग करके कट्टरपंथियों ने महिलाओं को आगे किया था. ब्रेनवॉश कर महिलाओं को सुरक्षाबलों से भिड़ने के लिए उकसाया गया. महिलाओं को हिंसा का हथियार बना दिया. सोचिए अगर एक भी महिला घायल होती, तो यही कायर कट्टरपंथी और उनके वैचारिक समर्थक नैरेटिव बनाते कि बेबस महिलाओं को निशाना बनाया गया.
घायल महिलाओं की तस्वीरों और वीडियो के साथ पुलिस के रवैये पर सामूहिक विलाप किया जाता. लेकिन पुलिस की सूझबूझ के साथ की गई कार्रवाई ने इस साजिश को नाकाम कर दिया. इस साजिश में सिर्फ स्थानीय कट्टरपंथी शामिल नहीं थे. अतिवादियों का पूरा नेटवर्क सक्रिय था. हिंसा भ़ड़काने के लिए कई कट्टरपंथी दूसरे शहरों से उज्जैन पहुंचे थे. पुलिस ने कुछ लोगों को हिरासत में भी लिया है. माहौल बिगाड़ने वाला कंटेंट पोस्ट करने वाले सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के खिलाफ भी कार्रवाई की तैयारी है.
जो लोग पत्थर बरसा रहे थे. जो लोग कानून तोड़ रहे थे. हिंसा कर रहे थे, देश का कानून साफ तौर पर उन्हें अपराधी बताता है. लेकिन उनमें भी कुछ लोगों को नायक दिखता है. ओवैसी और उनके जैसे कुछ नेता जो एक विशेष तरह की राजनीति करते हैं, खास वोट बैंक को रिझाने के लिए विशेष तरह के मुद्दे चुनते हैं. उन्हें पत्थरबाजों और हिंसा की साजिश करनेवाले शांतिप्रिय दिखते हैं.
सबकुछ कैमरे में कैद है. संगबाजों की करतूत साफ-साफ दिख रही है. साक्ष्य हैं कि कैसे हिंसा की बड़ी साजिश रची गई थी. लेकिन अपनी संकीर्ण सियासत और छोटी राजनीति के लिए ये नेता गांधीवाद की परिभाषा ही बदल रहे हैं. मतलब राष्ट्रपिता ने अपने पवित्र सोच में हिंसा तो छोड़िए, मानसिक हिंसा को भी त्यागने की बात कही थी, उस गांधीवाद के निर्मल दर्शन को पत्थरबाजों से जोड़ने का बौद्धिक अपराध हो रहा है. हिंसा के बचाव के लिए गांधीवाद की मनमानी व्याख्या की जा रही है.
600 साल पुरानी होने का दावा लेकिन कागज नहीं
ऐसे वैचारिक पाखंडियों को क्या कहा जाए, आप तय कीजिए. यहां हम आपको ये भी बताना चाहेंगे कि जिस शाही मस्जिद का एक हिस्सा हटाने की कार्रवाई हो रही थी, मुस्लिम पक्ष का दावा है कि वो साल 1390 के आसपास बनी थी. यानी दावा किया जा रहा है कि ये मस्जिद करीब 636 साल पुरानी है. हालांकि पुरातत्व विशेषज्ञों और सार्वजनिक रिकॉर्ड में मस्जिद के 636 साल पुराना होने से जुड़ा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है. दस्तावेजों में 1925 और 1985 की वक्फ अधिसूचना का जिक्र है.
जिस उज्जैन में हिंसा की साजिश रची गई, उसी उज्जैन में एक दिन पहले ही सीएम मोहन यादव ने अपने हाथों से अपना पैतृक घर तोड़ने की शुरुआत की. क्योंकि सड़क को चौड़ा किया जाना था. इसके बाद हिंदुओं समेत दूसरे धर्मस्थल भी तोड़े गए. लेकिन नफरत के जहर में डूबे कट्टरपंथियों को ये नहीं दिखा.
विकास के काम में जिद और अवैध कब्जा बड़ी बाधा है. ये हठधर्मिता कितनी बड़ी है, इससे जुड़ा एक आंकड़ा आपसे शेयर कर रहे हैं. 27 जुलाई 2010 में सुप्रीम कोर्ट में राज्यों ने एक शपथ पत्र दाखिल किया था. शपथ पत्र के मुताबिक, मध्य प्रदेश में 51 हजार से ज्यादा, राजस्थान में 58 हजार से ज्यादा, तमिलनाडु में 77 हजार से ज्यादा और महाराष्ट्र में 17 हजार से ज्यादा यानी सिर्फ 4 राज्यों में 2 लाख से ज्यादा धर्मस्थल सरकारी जमीन पर कब्जा कर अनधिकृत तरीके से बनाए गए थे.
मार्च 2026 में देश में 63 लाख 73 हजार किलोमीटर लंबा सड़क नेटवर्क था. नेशनल हाईवे नेटवर्क करीब 1 लाख 46 हजार किलोमीटर लंबा था. आम आदमी की सुविधा के लिए हर दिन इसमें विस्तार हो रहा है. नई सड़क के लिए खाली जमीन आराम से मिल जाती है. लेकिन जो पुरानी सड़क है, जिसके आसपास बस्ती है, उसे चौड़ा करने के लिए पुरानी इमारत को तोड़ना जरूरी होता है. ऐसा सिर्फ हमारे देश में नहीं होता. दुनिया भर में होता है.