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डॉक्टर-वकील बनने के नियम, तो पत्रकार बनने की छूट क्यों? माइक लेकर घूमने वालों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी क्यों अहम?

सोशल मीडिया पर खुद को पत्रकार बताने वालों की बढ़ती संख्या पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है. सवाल उठ रहा है कि क्या हर नागरिक पत्रकार बन सकता है. फेक न्यूज, अफवाहों और प्रोपेगेंडा के खतरे के बीच पत्रकारिता में जवाबदेही और नियम तय करने की जरूरत पर बहस तेज है.

Written By Tahir Kamran
Published: Oct 16, 2026, 11:01 PM IST | Updated: Oct 16, 2026, 11:03 PM IST
Image Credit: Ai की मदद से बनाई गई तस्वीर
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आचार्य चाणक्य का विचार है कि सत्य की रक्षा न करने वाले और असत्य की मिलावट करने वाले लोग समाज में उसी प्रकार विष घोलते हैं, जैसे दूध के एक घड़े को मदिरा की एक बूंद अपवित्र कर देती है. एक छोटा सा झूठ भी समाज की दिशा भटका सकता है. इसलिए आजकल पत्रकारिता और सूचना के प्रसार के नाम पर जो कुछ हो रहा है उसने सुप्रीम कोर्ट की भी चिंता बढ़ा दी है. देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा है कि अगर देश का हर नागरिक पत्रकार बनने लगेगा, तो इससे कई तरह की मुश्किलें पैदा हो सकती हैं. आज हम इसी चुभते हुए सवाल का विश्लेषण करेंगे की क्या हर आदमी पत्रकार हो सकता है. क्या पत्रकार बनने के लिए किसी योग्यता की जरूरत नहीं है. आज के युग में सूचना तंत्र बहुत महत्पूर्ण है. सूचनाएं हमारी सोच, हमारी समझ और हमारे मत को प्रभावित करती हैं. इसलिए आज हमारा ये विश्लेषण बहुत ध्यान से देखिए और समझिए.

सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट की चिंता की बात करते हैं. धरना-प्रदर्शन के दौरान स्वतंत्र पत्रकारों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और रील बनाने वालों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि हमें यह तय करना होगा कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी हर नागरिक को पत्रकार बनने का हक देती है? मान्यता प्राप्त पत्रकार, मीडिया हाउस से जुड़े पत्रकार, फ्रीलांसर और डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स, सबकी श्रेणियां अलग हैं. अगर हर कोई खुद को पत्रकार बताने लगेगा तो नई समस्याएं पैदा होंगी. सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि आज के डिजिटल दौर में हाथ में मोबाइल या माइक लेकर चलने वाला हर शख्स खुद को पत्रकार कहता है, जबकि कई लोग सिर्फ रील बना रहे होते हैं.

यही गंभीर संकट है, हाथ में माइक उठाया, यू-ट्यूब पर चैनल बनाया और खुद को स्वतंत्र पत्रकार घोषित कर दिया. सोशल मीडिया पर एक नजर डालिए. आपको भांति-भांति के पत्रकार मिलेंगे. सवाल ये है कि क्या ये सचमुच पत्रकार हैं. ये कथित स्वतंत्र पत्रकार जो कुछ कर रहे हैं क्या वो सही अर्थों में पत्रकारिता है?

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का विचार है कि सच्चाई कभी भी नुकसान नहीं पहुंचाती यदि उसे सही तरीके से और बिना किसी डर या पक्षपात के सामने रखा जाए.

बिना किसी डर या पक्षपात के सच्चाई को सामने रखने की घोषणा कर यू-ट्यूब और सोशल मीडिया के दूसरे प्लेटफॉर्म्स जो हो रहा है वो चिंतित और परेशान करने वाला है. इस संकट को समझने के लिए कुछ सूत्र शब्दों को समझना होगा. जानते हैं पत्रकारिता के नाम पर सोशल मीडिया पर जो लोग एक्टिव हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भी रेखांकित हैं उनमें

कुछ पुराने पत्रकार हैं. ये वो पत्रकार हैं जिन्होंने संस्थान छोड़ दिया और आजकल स्वतंत्र तौर पर काम करते हैं. इनमें से कई पत्रकारों का अनुभव दशकों पुराना है. ये पत्रकारिता के उच्च आदर्श और मानदंड से दीक्षित हैं. इसलिए इनकी पत्रकारिता मर्यादित है.

दूसरे नंबर पर वो आते हैं, जो खुद को स्वतंत्र पत्रकार कहते हैं. इन्हें पत्रकारिता संस्थानों में काम करने का अनुभव नहीं है. कुछ करना है इसलिए यूट्यूब पर चैनल बनाकर पत्रकारिता शुरू कर देते हैं. इनका पत्रकारिता के मूल्यों से कोई परिचय नहीं है. ये पत्रकारिता का संकट है. हम इसपर विस्तार से चर्चा करेंगे.

तीसरे नंबर पर इन्फ्लुएंसर्स आते हैं. ये वो लोग हैं जो सोशल मीडिया के जरिए आपके-हमारे मत को प्रभावित करते हैं. इन्हें भी पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों से कोई मतलब नहीं है. जो मुद्दा ट्रेंड कर रहा है उसमें शामिल होना है इसलिए ये कभी पत्रकार होते हैं. कभी किसी दूसरे विषय के एक्सपर्ट होते हैं. मतलब जैसा मौसम है, जैसा मुद्दा है उसी के हिसाब से इनकी विशेषज्ञता बदलती रहती है.

आज पत्रकारिता दो हिस्सों में बंट गई है. एक तरफ पत्रकारिता से जुड़े संस्थान हैं. दूसरी तरफ सोशल मीडिया के कथित स्वतंत्र पत्रकार, जो पत्रकारिता संस्थान हैं, उनके लिए नियम तय हैं. सूचना और प्रसारण मंत्रालय, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के साथ ही कई दूसरे संस्थान हैं, जो पत्रकारिता संस्थानों को रेग्युलेट करते हैं. संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों के लिए अनिवार्य योग्यता तय होती है. इन्हें प्रशिक्षण दिया जाता है. संस्थान अपनी खबरों के लिए जिम्मेदार होते हैं, लेकिन सोशल मीडिया के जो कथित स्वतंत्र पत्रकार हैं, उनके लिए कोई अनिवार्यता नहीं है. इनके लिए पत्रकारिता का मतलब माइक हाथ में उठाना और कुछ भी कह देना है.

क्या सचमुच ये पत्रकारिता है? क्या वाकई पत्रकारिता करना इतना आसान है कि जब जिसका मन करे वो माइक उठाए और पत्रकार बन जाए. मतलब आज कोई सड़क बना रहा है. कल वो पत्रकार बन जाएगा. इस संकट को एक सामान्य सवाल से समझते हैं. क्या कोई खुद से डॉक्टर या इंजीनियर बन सकता है. कोई खुद को वकील घोषित कर सकता है. सोचिए कोई कल कहे कि मैं तो जज बूनंगा. क्यों? क्योंकि मैं बेहतर फैसले ले सकता हूं. क्या ऐसा हो सकता है. बिल्कुल नहीं हो सकता है. इंजीनियर, डॉक्टर, वकील बनने के लिए मानदंड तय हैं. अगर बिना पढ़ाई और डिग्री के खुद को इंजीनियर या डॉक्टर कहा तो कानूनी कार्रवाई होगी. सजा हो सकती है. फिर पत्रकारिता के साथ ऐसा क्यों हैं. जब इंजीनियर, डॉक्टर के लिए मानदंड तय है, तो पत्रकारिता के लिए मानदंड क्यों नहीं तय होते.

महाभारत के शांति-पर्व में कहा गया है कि झूठ और आधी-अधूरी सूचनाएं समाज में अविश्वास का ऐसा जाल बुनती हैं, जिसमें फंसकर भाई-भाई का शत्रु बन जाता है. वाणी की अशुद्धता और असत्य का प्रचार ही अधर्म की शुरुआत है. कथित स्वतंत्र पत्रकारिता के नाम पर यही हो रहा है. अपने पक्ष को सत्य और तथ्य बताकर पेश किया जा रहा है. ये कितना खतरनाक है, इसे जानने के लिए पहले ये जानते हैं की आजकल सूचना के लिए सोशल मीडिया पर आम नागरिक की निर्भरता कितनी है.

2026 की शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक देश में YouTube की संभावित पहुंच लगभग 50 करोड़ यूजर्स तक है. इन यूजर्स में एक बड़ा हिस्सा समाचार और सूचना के लिए यू-ट्यूब पर जाता है.
Reuters Institute Digital News Report 2026 के ऑनलाइन सर्वे में शामिल 58 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वो समाचार के लिए यू-ट्यूब पर निर्भर हैं. ये आंकड़ा अंग्रेजी और शहरी इलाकों का है.
फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री और अर्न्स्ट एंड यंग की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक 18 साल से ज्यादा उम्र के पांच में चार भारतीय इंटरनेट यूजर्स यू-यट्यूब देखते हैं. ये लोग रोजाना करीब 72 मिनट यू-ट्यूब देखते हैं. यहां से यूजर्स सूचनाएं हासिल करते हैं.
Google और Oxford Economics के सर्वे में शामिल 98 प्रतिशत यूजर्स ने कहा कि वो यू-ट्यूब का उपयोग जानकारी प्राप्त करने के लिए करते हैं

सोचिए यू-ट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का कितना बड़ा आधार है. इनका कितना व्यापक असर है, लेकिन यहां पत्रकारिता के नाम पर जो कुछ हो रहा है उसके लिए कोई स्टैंडर्ड तय नहीं है. क्या आप जानते हैं ये कितना खतरनाक है?

इसी महीने दिल्ली पुलिस ने 10वीं फेल कट्टरपंथी नदीम को गिरफ्तार किया था. कट्टरपंथी नदीम ने यूट्यूब चैनल बनाया और स्वघोषित पत्रकार बन गया. जानते हैं पत्रकारिता के नाम पर ये क्या कर रहा था. शुद्ध कट्टरपंथी प्रोपेगेंडा का प्रचार कर रहा था. लोगों को भ्रमित कर रहा था. उसने हजारों फॉलोअर्स बना लिए थे. यानी कथित पत्रकारिता की आड़ में इस कट्टरपंथी ने हजारों लोगों के दिमाग में विषैले विचार के बीज बोए. सोचिए ये कितना बड़ा संकट है. ये पहली बार नहीं हुआ.

2023 में ऐसी की स्वतंत्र पत्रकारिता के नाम पर फेक वीडियो बनाए गए और तमिलनाडु में बिहारी मजदूरों पर हमले की अफवाह फैलाई गई. डरे हुए बिहारी मजदूर घर लौटने लगे. बिहार और तमिलनाडु के बीच राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया. जब जांच हुई तो सारा मामला फर्जी निकला.
2020 में महाराष्ट्र के पालघर में सोशल मीडिया के जरिए खबर के आवरण में बच्चा चोर वाली अफवाह फैलाई गई. भ्रमित औऱ भयभीत लोगों ने दो साधुओं और उनके ड्राइवर की हत्या कर दी.
2018 में कर्नाटक के बीदर में भी ऐसा हुआ. यहां बच्चा चोरी की अफवाह से डरे लोगों ने एक सॉफ्टवेयर कर्मचारी की हत्या कर दी.
2018 में ही महाराष्ट्र के धुले में बच्चा चोरी की अफवाह पर पांच निर्दोष लोगों की हत्या हो गई थी

समझिए सूचना के नाम पर फैलाई गई अफवाह कितनी खतरनाक है. इसलिए जरूरी है कि यूट्यूब और सोशल मीडिया पर स्वतंत्र पत्रकारिता के नाम पर जो कुछ हो रहा है उसे जिम्मेदार बनाया जाए.

स्वतंत्र पत्रकारिता के नाम पर जो मनमानी हो रही है, इसके लिए भी मीडिया संस्थानों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. कहा जा रहा है आम लोगों में पत्रकारों से, पत्रकारिता संस्थानों से नाराजगी है. हो सकता है नाराजगी हो. इस नाराजगी की वजह यह है कि मीडिया संस्थानों से आम नागरिक की उम्मीद है. लोग पत्रकारों से उम्मीद रखते हैं कि हम उनसे जुड़े मुद्दे उठाएंगे. उनके हित की बात करेंगे. यही होना भी चाहिए और कुछ हद तक ऐसा होता भी है लेकिन सच्चाई ये भी है कि जनता से जुड़े कुछ मुद्दे वाकई छूट जाते हैं और इसमें हम कोई अपनी पीठ नहीं थपथपा रहे. जो है, वो है और आपके सामने है.

आज जिस तरह की नाराजगी की बात की जा रही है, उसकी एक बड़ी वजह वैचारिक बंटवारा भी है. लोग वैचारिक तौर पर बंट गए हैं और अपनी विचारधारा से अलग खबर दिखाने पर नाराज हो जाते हैं. इसी नाराजगी को यूट्यूबर पत्रकार अपने अस्तित्व के लिए अमृत बना रहे हैं. वो खबर नहीं दिखा रहे हैं. खबर के नाम पर अपने विचार थोपते हैं. ये तथ्य में विचार की मिलावट है. जबकि समाचार पूरी तरह मिलावट से परे होता है.

Committee to Protect Journalists की रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में काम करते हुए 124 पत्रकारों ने जान गंवाई थी. 2025 में 129 पत्रकारों की काम करते हुए जान गई थी. समझिए दो वर्षों में औसतन हर तीसरे दिन एक पत्रकार की जान गई. ये पूरी दुनिया के पत्रकारों का सच है और ना जाने कितने पत्रकारों के नाम इस लिस्ट में भी छूट गए होंगे.

स्वामी विवेकानंद का विचार है कि गलत सूचना और अंधविश्वास मानसिक जहर हैं. यदि आप समाज को नष्ट करना चाहते हैं, तो बस वहां गलत सूचनाओं का प्रवाह तेज कर दीजिए.

पत्रकारिता गलत सूचनाओं के प्रवाह को रोकती है. पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को प्रसारित करने का प्रोफेशन नहीं है. ये जिम्मेदारी का काम है. पत्रकार बनाना अच्छी बात है, लेकिन पढ़कर, समझकर जानकारी लेकर पत्रकार बनना चाहिए. ऐसे ही माइक उठाकर कोई भी पत्रकार बन जाएगा तो ये समाज के लिए घातक होगा. इसलिए जरूरी है कि जैसे वकीलों के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है. डॉक्टर्स के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है, समाजहित में पत्रकारों के लिए भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए.

यहां हम आपसे भी एक आग्रह करेंगे. पत्रकार और ओपीनियन मेकर में बहुत बारीक फर्क होता है. जरूरी है आप इस फर्क को समझें, पत्रकार खबर को सही स्वरूप में आपके सामने रखते हैं, लेकिन ओपीनीयिन मेकर घटनाओं में अपना पक्ष, अपने विचार भी मिलाते हैं. फिर वो अखबार में हो, टीवी पर हो या यूट्यूब पर.

पहली बात तो ये है कि अगर कोई ओपीनियन दे रहा है, तो उसे ईमानदारी से स्वीकार करना चाहिए और बताना चाहिए कि ये मेरा मत है. इससे सुनने वालों को भी फैसला करने में आसानी रहेगी. पत्रकार बनकर खुद का मत नहीं रखें. क्योंकि पत्रकारों पर लोगों का भरोसा होता है. उन्हें विश्वास होता है कि पत्रकार जो कह और कर रहे हैं वो निष्पक्ष होगा. आज ओपीनियन रखने वालों की वजह से सच्चे पत्रकार संकट में हैं. क्योंकि लोग पत्रकारों के सही सवालों का भी जवाब नहीं देते. ये कहकर मजाक बना देते हैं कि सबकुछ रील और लाइक के लिए हो रहा है, इसलिए जरूरी समस्याएं भी दिखाई और सुनाई नहीं देती हैं.

पत्रकारिता सूचनाओं और खबरों का व्यापार नहीं है. ये समाज की दशा और दिशा दिखाने वाला आईना है. अगर ये आईना ही धुधंला हो गया, तो समाज की असली तस्वीर दिखाई नहीं देगी. इसलिए जरूरी है कि पत्रकारिता के लिए मानदंड तय किए जाएं. सिर्फ संस्थानों को ही नहीं यूट्यूब पत्रकारिता करने वालों की जिम्मेदारी तय करने वाला सिस्टम बनाया जाए.

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About the Author

Zee News में नेशनल डेस्क पर देश–विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरें लिखते हैं. करियर का आगाज 2015 से 'पंजाब केसरी' ग्रुप के उर्दू अखबार ‘हिंद समाचार’ से किया, जहां वे कंटेट राइटर से पेज डिजाइनर तक पहुंचे. इसके बाद उर्दू, हिंदी और पंजाबी - तीनों भाषाओं में काम करने का मौका मिला. 2018 में डिजिटल की तरफ कूच करते हुए पंजाब केसरी ग्रुप की उर्दू वेबसाइट की लॉन्चिंग टीम का नेतृत्व किया. इसके बाद 2020 में 'Zee Salaam' ज्वाइन किया, यहां भी वेबसाइट को लॉन्च करने के साथ-साथ तीन साल टीम का नेतृत्व भी किया. इसी दौरान ZEE Delhi NCR वेबसाइट भी लॉन्च हुई, जिसमें उनका अहम योगदान रहा. 2023 में India Daily Live की लॉन्चिंग टीम के साथ काम किया और शुरुआती दिनों में हिंदी के अलावा पंजाबी, तमिल, तेलुगु और गुजराती वेबसाइट टीमों को मैनेज किया. अक्टूबर 2024 में फिर से Zee Media में में वापसी करते हुए नेशनल टीम का हिस्सा बने. तकनीक में दिलचस्पी की वजह से उन्होंने React.js और वेब डिजाइनिंग सीखी. यही कारण है कि उनकी खबरों में HTML-CSS के छोटे-छोटे ग्राफिक्स दिख जाते हैं, जो मुश्किल बातों को भी आसान बना देते हैं. करियर की शुरुआत में कुछ दिनों तक फोटो स्टूडियो में भी काम किया, जहां कैमरा, Adobe Photoshop और ग्राफिक डिजाइनिंग सीखी, जो आज भी उनके डिजिटल काम में मदद करता है. उर्दू शायरी से प्यार अलग ही है. ग़ज़लें, नज़्में, गीत भी लिखते हैं और कई अखबारों में उनकी शायरी छप भी चुकी हैं. राहत इंदौरी, मुनव्वर राणा, अनवर जलालपुरी खुशबीर सिंह शाद और नवाज देवबंदी, माजिद देवबंदी  जैसे शायरों के इंटरव्यू व बातचीत का अनुभव भी उनके पास है. आप tahir.kamran@india.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facbook से जुड़ सकते हैं. 
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