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'जिसकी जितनी GDP, उसकी उतनी भागीदारी': ब्रिक्स में PM Modi ने दिया नया वैश्विक फॉर्मूला, 10 बड़ी बातें जानिए..

ब्रिक्स 2026 के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक ताकतों को आईना दिखाते हुए साफ कर दिया कि अब दुनिया पुराने ढर्रे पर नहीं चल सकती. पीएम मोदी ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को एक 'पिरामिड' करार दिया. आइए जानते हैं उन्होंने नया वैश्विक फॉर्मूला क्या दिया?

Written By Bhoopendra Rai
Published: Sep 12, 2026, 10:42 PM IST | Updated: Sep 12, 2026, 10:47 PM IST
Image Credit: BRICS 2026 PM Modi speech
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ब्रिक्स सम्मेलन के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिर्फ भारत की बात नहीं रखी, बल्कि पूरी दुनिया के सामने मौजूदा वैश्विक व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी. पीएम मोदी ने साफ शब्दों में कहा कि दुनिया को चलाने का सिस्टम आज भी एक 'पिरामिड' जैसा बना हुआ है जहां नीचे भारी-भरकम आबादी और बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं, लेकिन फैसले की पूरी मलाई ऊपर बैठे चंद अमीर मुल्क काट रहे हैं. उन्होंने दो-टूक मांग रखी कि ग्लोबल GDP में जिसका जितना हिस्सा है, दुनिया चलाने में उसकी उतनी ही भागीदारी होनी चाहिए.

इस आर्टिकल में अब हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ब्रिक्स डायलॉग का विश्लेषण करेंगे.

ब्रिक्स के वर्क कल्चर को बदलने का संकल्प

ब्रिक्स देशों ने इस सम्मेलन में संगठन के वर्क कल्चर को बदलने का संकल्प लिया, जो बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है. इसकी प्रस्तावना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में रखी थी. अपने संबोधन के दौरान उन्होंने बहुत ही संतुलित और सधे हुए शब्दों में 20 वर्ष के ब्रिक्स की ताकत और कमजोरी, दोनों का जिक्र किया और नया टारगेट दिया.

10 मिनट में पीएम मोदी की 10 बड़ी बातें

  1. उन्होंने वैश्विक नेताओं के सामने 10 मिनट में क्या-क्या 10 बड़ी बातें कहीं..अब ये जानिए.
  2. पीएम मोदी ने कहा कि ब्रिक्स समूह किसी भी देश या वैश्विक संगठन के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह आपसी सम्मान, सहमति और वैश्विक कल्याण के सिद्धांत पर काम करता है.
  3. प्रधानमंत्री ने कहा कि वैश्विक शासन का मौजूदा ढांचा एक पिरामिड की तरह है, जहां निर्णय लेने की शक्तियां शीर्ष पर कुछ देशों के पास सीमित हैं. इसमें सुधार की जरूरत है.
  4. उन्होंने एक बार फिर से दोहराया कि भारत युद्ध का नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति के जरिए शांतिपूर्ण समाधान का समर्थक है.
  5. पीएम मोदी ने रेखांकित करते हुए कहा कि भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता पूरी तरह से 'पीपल सेंट्रिक' और 'ह्यूमैनिटी फर्स्ट' दृष्टिकोण पर आधारित है.
  6. उन्होंने जोर देकर कहा कि ग्लोबल साउथ को रूल शेपर बनाना होगा. क्योंकि ग्लोबल साउथ वैश्विक संकटों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा है, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में पिछली पंक्ति में रखा गया है.
  7. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे वैश्विक संगठन में सुधार की आवश्यकता का प्रस्ताव रखा.
  8. पीएम मोदी ने कहा कि ब्रिक्स देश अपनी एकता और सहमति को वैश्विक मंच पर ठोस परिणामों में बदलें.
  9. उन्होंने ग्लोबल साउथ से एकजुट होकर AI, स्पेस और बायोटेक्नोलॉजी जैसे आधुनिक क्षेत्रों के लिए मिलकर वैश्विक नियम बनाने की अपील की है.
  10. उन्होंने नाविकों के लिए 'आपातकालीन सहायता नेटवर्क' बनाने का प्रस्ताव रखा.
  11. साथ ही, ब्रिक्स के लिए अगले 20 सालों के लिए एक नया और महत्वाकांक्षी एजेंडा तैयार करने पर जोर दिया.

वैश्विक व्यवस्था का 'पिरामिड' मॉडल और पीएम मोदी की चिंता

कुल मिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने छोटे से संबोधन में एक विश्व, एक व्यवस्था का एजेंडा तय कर दिया. प्रधानमंत्री मोदी जब पुतिन और शी जिनपिंग जैसे वैश्विक नेताओं के सामने वैश्विक व्यवस्था में बदलाव का एजेंडा रख रहे थे, तब उन्होंने एक शब्द का जिक्र किया, वो शब्द है पिरामिड. पिरामिड एक ऐसी संरचना या आकृति है, जो नीचे से चौकोर होती है और ऊपर जाते-जाते पतली होकर एक बिंदु पर मिल जाती है. वैश्विक व्यवस्था के संदर्भ में पीएम मोदी ने पिरामिड वाली चिंता करते हुए क्या कहा, पहले उसे समझना चाहिए.

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का मानना था कि 'जब तक दुनिया के पास एक ऐसी वैश्विक संस्था नहीं होगी, जो किसी एक महाशक्ति या गुट के प्रभाव से मुक्त हो, तब तक हम सच्ची शांति या समानता की उम्मीद नहीं कर सकते.' लेकिन दुर्भाग्य ये है कि आज भी मुट्ठीभर देश पूरी दुनिया को चला रहे हैं.

पिरामिड वाली चिंता करके प्रधानमंत्री मोदी ने इसी तरफ ब्रिक्स देशों का ध्यान आकर्षित करवाया है. पीएम मोदी ने पिरामिड वाली चिंता इसलिए जताई है, क्योंकि जिस तरह पिरामिड का निचला हिस्सा चौड़ा होता है, उसी तरह दुनिया में कमजोर देशों की तादाद ज्यादा है. बीच वाले हिस्से में तेजी से बढ़ते और विकासशील देश आते हैं, जिनका दुनिया में असर तो है, लेकिन अंतिम फैसला बदलने की बड़ी ताकत उनके पास नहीं है. सबसे ऊपर अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे गिने-चुने शक्तिशाली और अमीर देश आते हैं. इन्हीं के पास वीटो पावर, मजबूत करेंसी, बड़ी टेक्नोलॉजी और पैसे की शक्ति है. असली फैसले यही देश लेते हैं.

ग्लोबल GDP में हिस्सेदारी बनाम फैसलों में भागीदारी

पीएम मोदी ने एक और बड़ी बात कही. वो ये कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में जिस देश का जितना योगदान है, उस देश की भूमिका. दुनिया को चलाने में उतनी ज्यादा होनी चाहिए. मतलब ग्लोबल GDP में जिसकी जितनी हिस्सेदारी हो..फैसले में उसकी उतनी भागीदारी भी हो. पीएम मोदी ने ऐसा क्यों कहा, उसे भी समझिए.

अमेरिका की जीडीपी सवा 32 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा है.

ब्रिटेन की जीडीपी लगभग सवा चार ट्रिलियन डॉलर के आसपास है.

फ्रांस की जीडीपी लगभग साढ़े तीन ट्रिलियन डॉलर है.

जबकि भारत की जीडीपी सवा चार ट्रिलियन के करीब है.

इसका सीधा मतलब यह है कि भारत आज दुनिया की एक बड़ी आर्थिक ताकत तो बन चुका है, लेकिन वैश्विक वित्तीय नियम तय करने वाली संस्थाओं में फैसलों की मुख्य चाबी आज भी पश्चिमी देशों के हाथ में है. भारत जैसे देश अब भी बहुत पीछे हैं.

IMF और वर्ल्ड बैंक में खुला पक्षपात

IMF में फैसला लेने की क्षमता अमेरिका के पास सबसे ज्यादा है. उसका वोटिंग शेयर सबसे ज्यादा साढ़े 16 प्रतिशत है, जबकि ब्रिटेन और फ्रांस के पास 4 प्रतिशत से ज्यादा वोटिंग शेयर है. ब्रिटेन से ज्यादा जीडीपी भारत की है, फिर भी यहां पर भारत का वोटिंग शेयर ढाई परसेंट के आसपास ही है.

सोचिए, भारत की अर्थव्यवस्था फ्रांस से लगभग 15 प्रतिशत बड़ी है, लेकिन IMF में फ्रांस की वोटिंग पावर भारत से लगभग 53 प्रतिशत ज्यादा है.

ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था भारत से केवल पौने 3 प्रतिशत बड़ी है, लेकिन IMF में उसकी वोटिंग पावर भी भारत से लगभग 53 प्रतिशत ज्यादा है.

कमोबेश यही स्थिति वर्ल्ड बैंक में भी है. बताइए कि इससे बड़ी असमानता क्या हो सकती है? और एक दिलचस्प बात सुनिए कि पश्चिमी देशों ने किस तरह शातिराना अंदाज में IMF की पूरी व्यवस्था बनाई है. IMF के कई बड़े और महत्वपूर्ण फैसलों को पास करने के लिए 85 प्रतिशत वोटों की जरूरत होती है. अकेले अमेरिका के पास साढ़े 16 प्रतिशत वोट हैं. इसका मतलब यह है कि अगर अमेरिका किसी फैसले के खिलाफ वोट कर दे, तो बाकी दुनिया मिलकर भी 85 परसेंट वोट नहीं जुटा सकती और वह फैसला रुक जाएगा. समझ सकते हैं कि किस तरह अमेरिका और यूरोपीय देशों ने अपने पक्ष में फैसले करवा लिए हैं.

यही हाल बाकी अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भी है. भारत जैसा देश अब तक संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य नहीं बन पाया है. ये स्थिति सिर्फ भारत की नहीं है. चाहे ब्राजील हो, साउथ अफ्रीका हो या ऐसे दूसरे ग्लोबल साउथ के देश हों, हर किसी को असमानता का सामना करना पड़ रहा है. यही कारण है कि पीएम मोदी ने आज पिरामिड वाली चिंता जताई.

पश्चिम-विरोधी नहीं, गैर-पश्चिमी मंच है ब्रिक्स

हालांकि, पीएम मोदी जब 'एक विश्व, एक व्यवस्था' की बात कर रहे थे, तब ये भी उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि ब्रिक्स किसी के भी खिलाफ नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत सिर्फ ग्लोबल साउथ की उचित भागीदारी की बात कर रहा है. भारत किसी के खिलाफ न होकर सिर्फ अधिकार के विस्तार की मांग कर रहा है. वैसे भी भारत वसुधैव कुटुम्बकम् के मंत्र पर चलने वाला देश है.

एक तरफ ब्रिक्स में वह चीन, रूस और ईरान के साथ बैठता है. दूसरी तरफ क्वाड में वह अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ है. G20 में वह पश्चिमी और विकासशील, दोनों देशों को जोड़ता है. भारत यूरोप, रूस और खाड़ी देशों के साथ व्यापार और साझेदारी बढ़ा रहा है. भारत चाहता है कि ब्रिक्स पश्चिमी देशों के दबदबे को चुनौती तो दे, लेकिन उनका दुश्मन न बने. पीएम मोदी ने साफ किया कि ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी नहीं, बल्कि गैर-पश्चिमी देशों का एक समूह है, जिसका मकसद किसी से दुश्मनी करना नहीं है. लेकिन हां, किसी के दबदबे या दबाव के सामने झुकना भी नहीं है. भारत सबको साथ लेकर आगे बढ़ना चाहता है.

प्राचीन भारतीय उपनिषद, महोपनिषद में लिखा है कि 'यह अपना है और यह पराया है, ऐसी गणना छोटे मन वाले लोग करते हैं. उदार चरित्र वाले लोगों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही एक परिवार है.'

भारत के प्रधानमंत्री ने इसी मंत्र को आगे बढ़ाते हुए ग्लोबल साउथ के अधिकार के लिए 'एक विश्व, एक व्यवस्था' की पैरवी की.

नाविकों की सुरक्षा और आपातकालीन सहायता नेटवर्क

पीएम मोदी ने आज समुद्री सुरक्षा की भी बात की. उन्होंने नाविकों के लिए आपातकालीन सहायता नेटवर्क बनाने का प्रस्ताव रखा.

प्रधानमंत्री मोदी ने ये महत्वपूर्ण प्रस्ताव इसलिए रखा क्योंकि ब्रिक्स के 11 देशों में से 10 देश सीधे समुद्र से जुड़े हुए हैं. BRICS देशों के पास कुल मिलाकर करीब 1 लाख 37 हजार किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा है. अगर दुनिया के सभी देशों के इस कानूनी समुद्री इलाके को आपस में जोड़ दिया जाए, तो उसमें से करीब एक-चौथाई हिस्सा अकेले BRICS देशों के पास है. इसी में मलक्का और होर्मुज स्ट्रेट हैं. स्वेज नहर और बाब-अल-मंदेब भी हैं, जो कारोबार के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हैं.

नाविकों के लिए भारत ने यह चिंता क्यों जताई है? समझिए

जब किसी मर्चेंट नेवी के जहाज पर हमला होता है, तो नाविक युद्ध के मैदान में फंस जाते हैं. एक आपातकालीन नेटवर्क होने से उन्हें तुरंत सुरक्षित निकाला जा सकता है और तुरंत सैन्य सहायता पहुंचाई जा सकती है.

हिंद महासागर की अदन की खाड़ी और पश्चिम अफ्रीका में समुद्री डाकुओं द्वारा जहाजों को हाईजैक करने और नाविकों को बंधक बनाने की घटनाएं अक्सर होती हैं. एक सेंट्रल नेटवर्क तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन चलाने में मदद करेगा.

दुनिया का 80 प्रतिशत से अधिक व्यापार समुद्र के रास्ते होता है. अगर नाविक खुद को असुरक्षित महसूस करेंगे, तो वे इन खतरनाक रूटों पर जाने से मना कर देंगे. नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सीधे तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाना है.

अभी जब अमेरिका-ईरान तनाव और युद्ध के हालात बने हुए हैं, तो इसकी आवश्यकता साफ दिख रही है. यही कारण है कि पीएम मोदी ने समुद्री सुरक्षा को एजेंडे में शीर्ष पर रखा है.

20 साल में क्या खोया, क्या पाया?

20 साल से चल रहे संगठन का वर्क कल्चर बदलने की बात अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं, तो ऐसे ही नहीं कर रहे हैं. इसका एक मजबूत आधार है.

ब्रिक्स की सबसे बड़ी कमी यह है कि बैठकें बहुत होती हैं, बड़े-बड़े घोषणापत्र जारी होते हैं, लेकिन असलियत में काम क्या हुआ, घोषणापत्र का नतीजा क्या हुआ... इसका हिसाब-किताब नहीं होता. 2016 में ही तय हुआ था कि ब्रिक्स देशों की अपनी एक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी होनी चाहिए..लेकिन 10 साल बाद भी आज तक वो ठंडे बस्ते में है.

हर ब्रिक्स घोषणापत्र में आतंकवाद की कड़ी निंदा की जाती है. इस बार भी पहलगाम हमले की निंदा हुई है. लेकिन व्यावहारिक रूप से चीन अक्सर संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के भारत के प्रयासों पर अड़ंगा लगा देता है.

G7 बनाम BRICS: फैसलों पर अमल की चुनौती

दूसरी तरफ G7 का समूह..आबादी और अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स से छोटा होते हुए भी अधिक असरदार रहा है. G7 देश एक साथ फैसला लेते हैं और उस पर अमल भी करते हैं.

पेरिस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के दौरान ही FATF का गठन किया गया था. आज यह संस्था दुनिया भर में मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फंडिंग पर रोक लगाने वाली सबसे शक्तिशाली संस्थाओं में से एक है.

जब रूस ने 2014 में क्रीमिया पर कब्जा किया, तो G7 देशों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए रूस को तत्कालीन G8 समूह से बाहर कर दिया था.

जाहिर है, ब्रिक्स को भी G7 की तरह ही न सिर्फ फैसला लेने, बल्कि उस पर मजबूती के साथ अमल करने की आवश्यकता है. तभी ब्रिक्स की सार्थकता साबित होगी. भारत के प्रधानमंत्री ने इसी ओर सभी देशों का ध्यान आकर्षित करवाया है.

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पत्रकारिता में 9 साल से सक्रिय भूपेंद्र कुमार राय Zee News में सीनियर सब एडिटर के तौर पर न्यूज टीम का हिस्सा हैं, देश विदेशी की खबरें कवर करते हैं. 2017 में ETV Bharat (हैदराबाद) से करियर की शुरुआत करने के बाद वे 2020 में Zee News पहुंचे, जहां 2022 तक काम किया. 2023 में News24 की स्पोर्ट्स टीम को लीड करने का मौका मिला. इसके बाद India Daily Live में बतौर चीफ सब एडिटर स्पोर्ट्स टीम के साथ जुड़े. 2024 में दोबारा News24 लौटे और नई स्पोर्ट्स वेबसाइट लॉन्चिंग का अहम हिस्सा रहे. अक्टूबर 2025 में News24 से अलविदा लेकर एक बार फिर Zee News पहुंचे हैं. खेलों में गहरी रुचि रखते हैं और क्रिकेट वर्ल्ड कप, एशियन गेम्स, ओलंपिक गेम्स, हॉकी वर्ल्ड कप समेत बड़े खेल इवेंट को कवर करने का अनुभव है. ब्रेकिंग न्यूज, क्रिकेट एनालिसिस और किस्से-कहानियों पर अच्छी पकड़ है. जी न्यूज में खेल से जुड़ी खबरों के बाद अब न्यूज टीम के साथ रियलटाइम न्यूज पर काम कर रहे हैं. एक्सप्लेनर और किसी भी मुद्दे पर रिसर्च के साथ उसे आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं. आप Bhoopendra.Rai@zeemedia.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facebook से जुड़ सकते हैं.
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