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सर्दियों में बढ़ सकती है Delhi में प्रदूषण की मार, पराली और 'Super El Nino' ने बढ़ाई चिंता; जानें दोनों के बीच क्या है कनेक्शन

दिल्ली में AQI बढ़ने के बीच पराली जलाने के शुरुआती मामलों और संभावित ‘Super El Niño’ ने सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने की चिंता बढ़ा दी है, जबकि अक्टूबर-नवंबर में पराली जलाने की घटनाएं और बढ़ने की आशंका है.

Written By Renu Akarniya
Published: Sep 24, 2026, 11:09 PM IST | Updated: Sep 24, 2026, 11:33 PM IST
Image Credit: Delhi Pollution
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Delhi Pollution: दिल्ली में सितंबर खत्म होने के साथ ही प्रदूषण का असर बढ़ने लगा है. बीते दो दिनों में AQI करीब 224 तक पहुंच गया है. ऐसे में सर्दियों में प्रदूषण और खराब हो सकता है. TOI की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 15 से 23 सितंबर के बीच उत्तरी भारत के राज्यों के खेतों में पराली जलाने के 47 मामले पहले ही दर्ज हो चुकें हैं. इस बीच प्रशांत महासागर में 'सुपर एल नीनो' बनने का खतरा बहुत ज्यादा माना जा रहा है, जिससे चिंता बढ़ गई है कि नवंबर में दिवाली के आसपास प्रदूषण का लेवल इतना ज्यादा हो सकता है कि लोगों को सांस लेने में दिक्कत हो सकती है. इसके साथ ही कटाई में देरी से हालात और फिल पराली से मुश्किल बढ़ सकती है.

इस मौसम में बाद में जो आमतौर पर देखा जाता है, उसकी तुलना में ये संख्याएं अभी भी कम हैं. खेतों में पराली जलाने के मामले आमतौर पर अक्टूबर तक बढ़ जाते हैं और नवंबर के पहले 10 दिनों में अपने चरम पर पहुंच जाती हैं. पराली जलाने का समय आमतौर पर सितंबर से नवंबर तक होता है. हालांकि, इस साल मौसम के हालात प्रदूषण की कहानी को और मुश्किल बना सकते हैं.

Super El Nino दिल्ली के प्रदूषण के लिए हालात क्यों खराब कर सकता है? 
एक बात जिस पर करीब से नजर रखी जा रही है, वह है सर्दियों के मौसम पर एक मजबूत एल नीनो घटना का होने वाला असर. सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च (SAFAR) के फाउंडर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज में चेयर प्रोफेसर गुफरान बेग ने कहा कि कम वेस्टर्न डिस्टर्बेंस का मतलब हो सकता है कि दिल्ली में सर्दियों में बारिश कम होगी.

वेस्टर्न डिस्टर्बेंस बारिश ला सकते हैं और एटमॉस्फियर से पॉल्यूटेंट्स को कुछ समय के लिए साफ करने में मदद कर सकते हैं. अगर ऐसे वेदर सिस्टम कम बार आते हैं तो अलग-अलग सोर्स से होने वाला प्रदूषण ज्यादा समय तक रुका रह सकता है. प्रोफेसर गुफरान बेग को सर्दियों में हल्के मौसम की भी उम्मीद है. इसका मतलब यह नहीं है कि हवा अपने आप साफ हो जाएगी. उनका अंदाजा है कि धीमी हवाएं जरूरी हो सकती हैं, क्योंकि कमजोर वेंटिलेशन से पॉल्यूटेंट फैलने के बजाय इलाके के पास जमा हो सकते हैं. एक और बात भी है कि पंजाब में इस मानसून में बारिश में काफी कमी दर्ज की गई है, जबकि बुआई में देरी हुई है. इससे कटाई अक्टूबर के आखिर तक हो सकती है और किसानों के पराली जलाने का समय भी बढ़ सकता है.

दिवाली और खेतों में पराली 
यह समय एक और मुश्किल खड़ी कर सकता है. इस साल दिवाली 8 नवंबर को है, लगभग उसी समय जब खेतों में पराली जलाने की घटनाएं अपने सीजनल पीक पर या उसके आसपास होने की उम्मीद होती है. इसका मतलब है कि जैसे-जैसे तापमान गिरना शुरू होगा और हवाएं कमजोर होंगी, कई पॉल्यूशन सोर्स एक-दूसरे से मिल सकते हैं.

हालांकि, जरूरी बात यह है कि पराली जलाना दिल्ली-NCR के सर्दियों के पॉल्यूशन में सिर्फ एक वजह है. इसका असर हवा की दिशा, एटमोस्फेरिक हालात और पड़ोसी राज्यों में आग की तेजी पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है.

दिल्ली में सर्दियों का पॉल्यूशन: पिछले साल क्या हुआ था?
2025 में ज्यादातर समय दिल्ली के PM2.5 में पराली जलाने का हिस्सा काफी कम था. रिपोर्ट में दिए गए डिसीजन सपोर्ट सिस्टम के डेटा के मुताबिक, पिछले साल दिल्ली के PM2.5 में पराली जलाने का हिस्सा सिर्फ आठ दिनों में 10% को पार कर गया और सिर्फ एक दिन 20% से ज्यादा हो गया. ज्यादातर दिनों में यह 5% से नीचे रहा.

2024 से तुलना ध्यान देने लायक है. उस साल 14 दिनों में पराली जलाने का हिस्सा 20% को पार कर गया था. इसका मतलब यह नहीं है कि पराली जलाना चिंता का विषय नहीं रहा. यह दिखाता है कि आग की एक्टिविटी और मौसम के हालात के कॉम्बिनेशन के आधार पर उनका असर एक मौसम से दूसरे मौसम में कितना अलग हो सकता है.

कुछ राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं कम हुई हैं, लेकिन हर जगह नहीं
कुछ बड़े उत्तरी राज्यों में पराली जलाने में काफी कमी आई है. पंजाब में 2025 में पराली जलाने की 5,114 घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि 2024 में यह 10,909 थीं. इसी दौरान हरियाणा में यह संख्या 1,406 से घटकर 662 हो गई.

लेकिन उत्तर प्रदेश उल्टी दिशा में चला गया, जहां धान के अवशेष जलाने की घटनाएं 2024 में 6,142 से बढ़कर 2025 में 7,290 हो गईं. राजस्थान में भी थोड़ी बढ़ोतरी हुई, 2,772 से बढ़कर 2,890 हो गईं. दिल्ली में खुद रिपोर्ट किए गए मामले 2024 में 13 से घटकर 2025 में पांच हो गए.

2026 की शुरुआत के नंबरों को भी ध्यान से समझना चाहिए. सैटेलाइट मॉनिटरिंग की अपनी सीमाएं हैं, क्योंकि अगर आग उस समय के बाद लगती है जब सैटेलाइट ऊपर से गुजरता है तो उसका पता नहीं चल पाता है.

अगले कुछ सप्ताह क्यों मायने रखते हैं?
एनवायरनमेंट एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ खेतों में परालनी घटनाओं की गिनती करना काफी नहीं होगा. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट में रिसर्च और एडवोकेसी की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनुमिता रॉयचौधरी ने कहा कि इस सीजन में आगे क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे लागू किया जाता है या नहीं और साथ ही, ज़मीन पर पराली का मैनेजमेंट कितने अच्छे से किया जाता है.

इसमें इन-सीटू मैनेजमेंट, जिसमें खेत के अंदर बचे हुए कचरे का ट्रीटमेंट किया जाता है और एक्स-सीटू इस्तेमाल, जिसमें फसल का कचरा इकट्ठा करके इंडस्ट्रियल या दूसरे इस्तेमाल के लिए इस्तेमाल किया जाता है, दोनों शामिल हैं. सरकार पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में फसल के बचे हुए कचरे को जलाने की सैटेलाइट-बेस्ड मॉनिटरिंग भी जारी रखे हुए है. मॉनिटरिंग सिस्टम सैटेलाइट फायर डिटेक्शन का इस्तेमाल करता है और फील्ड-लेवल के अधिकारियों को एक्शन के लिए अलर्ट भेजता है.

तो अब तक दर्ज की गई 47 आग की घटनाएं, अपने आप में दिल्ली की सर्दियों की एयर क्वालिटी का फोरकास्ट नहीं हैं. बड़ा सवाल यह होगा कि क्या होगा जब अक्टूबर में कटाई तेज हो जाएगी, नवंबर में खेतों में आग लगने की घटनाएं बढ़ जाएंगी और मौसम की स्थिति पॉल्यूटेंट को फैलाने के लिए कम अच्छी हो जाएगी. यह वह समय है जब अधिकारी सबसे ज्यादा ध्यान से देखेंगे.

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About the Author

रेनू अकर्णिया, वर्तमान में Zee News में सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं और दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा की लेटेस्ट, ट्रेंडिंग कंटेंट, यूटिलिटी जुड़ी खबरों पर काम कर रहे हैं. रेनू पिछले 3 सालों से डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं. पत्रकारिता में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने 2022 में Zee News से करियर की शुरुआत की.  लोकल चैनल समाचार प्लस में इंटर्न से शुरुआत की और कारवां बढ़ता हुआ जी न्यूज पहुंचा.
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