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महात्मा गांधी की आखिरी शाम: प्रार्थना सभा, सामने आया गोडसे..और फिर वो 3 गोलियां!

महात्मा गांधी की हत्या के बाद चले मुकदमे का 211 पन्नों का मूल फैसला आज भी इस मामले का अहम दस्तावेज है. दिल्ली हाई कोर्ट के ई-म्यूजियम में उपलब्ध इस फैसले को आधार बनाकर हम इसे तीन हिस्सों की सीरीज में आपके सामने पेश कर रहे हैं. ये पहला पार्ट है जिसमें हत्या की शाम से लेकर गोलियों, सबूतों, मेडिकल जांच और गोडसे के शुरुआती बयान शामिल हैं.

Written ByGaurav Pandey
Published: Oct 02, 2026, 06:47 PM IST|Updated: Oct 02, 2026, 07:06 PM IST
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महात्मा गांधी की आखिरी शाम: प्रार्थना सभा, सामने आया गोडसे..और फिर वो 3 गोलियां!

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Gaurav Pandey

Gaurav Pandey

Gaurav is a multimedia journalist writing across a wide range of subjects, including politics, sports, cinema, explainers, opinion and Delhi Haryana civic issues. With analysis, he regularly covers social issues and public policy through in-depth. With around nine years of experience, he has worked with India Today, Hindustan Times, and Network18, producing stories with a strong focus on facts and ground reality. He studied journalism at IIMC Delhi.
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जन्मतिथि दो अक्टूबर पर देश उन्हें याद कर रहा है. उनके जीवन के आखिरी दिन ने आजाद भारत के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया. एक तरफ गांधी थे. दूसरी तरफ 30 जनवरी 1948 की वह शाम थी. प्रार्थना सभा के लिए बढ़ रहे गांधी के सामने अचानक नाथूराम गोडसे आया और कुछ ही सेकंड में तीन गोलियां चला दीं. इसके बाद जो हुआ, वह सिर्फ एक हत्या की कहानी नहीं थी. यह भारत के सबसे चर्चित मुकदमों में से एक की शुरुआत थी.

महात्मा गांधी की हत्या के बाद चले मुकदमे का मूल फैसला आज भी न्यायिक इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज है. दिल्ली हाई कोर्ट ने सितंबर 2024 में अपने ई-म्यूजियम की शुरुआत की थी. इसमें गांधी हत्या मामले के ट्रायल कोर्ट के मूल फैसले की डिजिटल कॉपी भी उपलब्ध कराई गई. इस फैसले की 211 पन्नों की फाइल में हत्या से जुड़े सबूत, गवाहियों और अदालत के निष्कर्षों का विस्तृत रिकॉर्ड मौजूद है. हम इसी मूल जजमेंट को आधार बनाकर गांधी मर्डर केस की तीन हिस्सों की सीरीज आपके सामने पेश कर रहे हैं.

गांधी की आखिरी शाम का वो वक्त
देश आजाद हो चुका था. तारीख थी 30 जनवरी 1948. दिल्ली के बिड़ला हाउस में शाम का समय था. महात्मा गांधी रोज की तरह प्रार्थना सभा के लिए निकलने वाले थे. किसी को अंदाजा नहीं था कि यह उनकी जिंदगी की आखिरी शाम होने वाली है.

शाम करीब 5 बजे गांधी अपने कमरे से बाहर निकले. यह उनकी तय दिनचर्या का हिस्सा था, जिसे वह लंबे समय से निभाते आ रहे थे. इसी दौरान उनके करीबी सहयोगी गुरबचन सिंह ने उन्हें बताया कि प्रार्थना सभा में पहुंचने में थोड़ी देर हो सकती है. इस पर गांधी मुस्कराए और हंसते हुए कहा कि जो लोग देर से आते हैं उन्हें सजा मिलनी चाहिए.

इसके बाद गांधी प्रार्थना मैदान की तरफ चल पड़े. उनके साथ उनकी भतीजियां आभाबेन और मनूबेन भी थीं. दोनों अक्सर उनके कंधों को पकड़कर उन्हें सहारा देती थीं. प्रार्थना मैदान में पहले से बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे और सभी गांधी के आने का इंतजार कर रहे थे. उस दिन कोई खास सुरक्षा घेरा नहीं था. आमतौर पर गांधी के आगे एक-दो लोग रास्ता साफ करने के लिए चलते थे, लेकिन उस दिन ऐसा नहीं हुआ.

गांधी आगे बढ़ते रहे और भीड़ उनके लिए अपने आप रास्ता छोड़ती गई. अपनी आदत के मुताबिक उन्होंने हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन किया.

तीन गोलियों ने सब बदल दिया

गांधी मंच के करीब पहुंचे तो गुरबचन सिंह ने उनके सामने आने की कोशिश की. किसी बातचीत के कारण वे कुछ पल के लिए रुक गए. गांधी आगे बढ़ते रहे. तभी भीड़ में मौजूद नाथूराम गोडसे अचानक उनके सामने आ गया. गोडसे गांधी के सामने झुका. इसके बाद उसने तेजी से पिस्टल निकाली और लगातार तीन गोलियां चला दीं. गोलियां गांधी की छाती और पेट में लगीं.

गंभीर रूप से घायल गांधी जमीन पर गिर पड़े. वहां मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक गांधी के मुख से अंतिम शब्द 'हे राम' निकले. घटना के तुरंत बाद प्रार्थना स्थल पर अफरा-तफरी मच गई. लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले पुलिस ने स्थिति संभालनी शुरू कर दी. हत्या में इस्तेमाल पिस्टल को मौके पर ही जब्त कर लिया गया. जजमेंट फाइल के मुताबिक यह Beretta 606824 थी और उसमें उस समय चार कारतूस मौजूद थे.

पुलिस ने गोडसे से पिस्टल अपने कब्जे में ले ली. कई पुलिस अधिकारियों और प्रत्यक्षदर्शियों ने बाद में अदालत में इस संबंध में गवाही दी.

गांधी को कमरे में ले जाया गया

गोलियां लगने के बाद गांधी को तुरंत उनके कमरे में ले जाया गया. लेकिन चोटें बेहद गंभीर थीं. काफी खून बह चुका था. तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका. हत्या के बाद जांच शुरू हुई और घटनास्थल से सबूत जुटाए गए. प्रार्थना मंच के पास से दो खाली कारतूस, चली हुई गोलियां और खून से सना एक पट्टा बरामद किया गया. यह पट्टा गांधी के शरीर पर ही था.

अगले दिन 31 जनवरी 1948 की सुबह 8 बजे गांधी के शरीर की मेडिकल जांच की गई. नई दिल्ली के सिविल अस्पताल में डॉक्टर कर्नल डीएल तनेजा ने यह जांच की. मेडिकल रिपोर्ट में बताया गया कि गांधी की छाती और पेट में गोलियों से गंभीर आंतरिक चोटें आई थीं. मृत्यु का कारण इंटरनल ब्लीडिंग और शॉक बताया गया. आगे चलकर यह मेडिकल रिपोर्ट अदालत में अहम सबूत बनी.

गोडसे ने क्या बताया

बाद में नाथूराम गोडसे ने अपने बयान में गांधी की हत्या करने की बात स्वीकार की. उसके बयान के मुताबिक गोली चलाने से पहले उसने पिस्टल की सेफ्टी कैच हटा दी थी. उसका इरादा बहुत नजदीक से फायर करने का था.

फायरिंग के बाद वहां मौजूद कुछ लोगों ने गोडसे पर हमला किया. पुलिस ने उसे भीड़ से बाहर निकाला. इसी दौरान उसकी पिस्टल कुछ समय के लिए दूसरे व्यक्ति के हाथ में चली गई थी. गोडसे ने खुद उस व्यक्ति को सावधान रहने के लिए कहा कि कहीं पिस्टल चल न जाए.

देश शोक में डूब गया

इस बीच गांधी की हत्या की खबर तेजी से पूरे देश में फैल गई. शहरों और कस्बों में लोग सड़कों पर उतर आए. देश शोक में डूब गया. उसी शाम देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने रेडियो पर राष्ट्र को संबोधित किया. उन्होंने कहा, 'हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है. हर जगह अंधेरा है'.

31 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में गांधी की अंतिम यात्रा निकाली गई. एक मंच पर रखे उनके पार्थिव शरीर के पीछे लाखों लोग मौन, आंसुओं और प्रार्थनाओं के साथ चलते रहे.

यहीं से शुरू हुआ मुकदमा

गांधी की हत्या के बाद इस मामले की जांच और फिर अदालत में मुकदमे की प्रक्रिया शुरू हुई. यहीं से भारत के न्यायिक इतिहास का वह अध्याय सामने आया जिसमें एक हत्या के मामले की पूरी न्यायिक प्रक्रिया देश के सामने आई.

आरोपियों की गिरफ्तारी से लेकर अदालत में हुई सुनवाई, गवाहों के बयान, सामने आए सबूत और अंत में हुई सजा तक की कहानी इसी मुकदमे का हिस्सा बनी.  गांधी मर्डर केस की इस सीरीज के अगले पार्ट में कहानी अदालत तक पहुंचेगी. आरोपियों को कैसे पकड़ा गया, केस कैसे चला, अदालत में क्या-क्या सामने आया और किन आरोपियों को बरी किया गया. इस मामले में ऐसे नाम भी थे जिन्हें बाद में सबूतों के अभाव में बरी किया गया.
 

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