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Diwali के बाद दिल्ली-NCR की हवा क्यों हो जाती है जहरीली? पटाखे, पराली और मौसम का पूरा कनेक्शन समझें

दिवाली के बाद दिल्ली-NCR की हवा खराब होने के पीछे पटाखों के साथ पराली, वाहन, धूल और मौसम की भूमिका होती है. PM2.5, तापमान उलटाव, कम हवा और प्रदूषण के इस पूरे कनेक्शन को समझें.

Written By Renu Akarniya
Published: Oct 03, 2026, 11:06 PM IST | Updated: Oct 03, 2026, 11:23 PM IST
Image Credit: AI GENERATED PHOTO
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Delhi-NCR Pollution: हर साल दिवाली के आसपास दिल्ली-NCR में यही सवाल उठता है कि त्योहार के बाद एयर क्वालिटी इतनी खराब क्यों हो जाती है? इसका जवाब सिर्फ पटाखों या पराली जलाने में नहीं है. दिवाली के आसपास बढ़ा हुआ प्रदूषण पटाखों के धुएं, खेतों में पराली जलाने, गाड़ियों और लोकल प्रदूषण और मौसम की ऐसी स्थितियों के मिलेजुले असर की वजह से होता है, जो हवा में मौजूद प्रदूषकों को आसानी से बाहर नहीं निकलने देते.

सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) और कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM) ने लगातार दिल्ली-NCR के प्रदूषण को लोकल सोर्स, रीजनल प्रदूषण और खराब मौसम के मिले-जुले असर से जोड़ा है.

दिवाली के बाद दिल्ली की एयर क्वालिटी अचानक खराब क्यों हो जाती है?
दिवाली मतौर पर ऐसे समय होती है, जब उत्तर भारत में मौसम गर्मी से सर्दी में बदलता है. रातें ठंडी हो जाती हैं और हवा की रफ्तार अक्सर कम हो जाती है. इससे वातावरण की प्रदूषकों को फैलाने और ले जाने की क्षमता कम हो जाती है. इसलिए, अगर पटाखों का धुआं, गाड़ियों से निकलने वाला धुआं, धूल, कचरा, या बायोमास जलाना एक साथ वातावरण में पहुंच जाता है तो इसका ज्यादा देखने को मिलता है. इसके प्रभाव के आसमान में धुएं की सफेद चादर नजर आती है.

CPCB की एक दिवाली एनालिसिस रिपोर्ट में भी हवा की कम स्पीड और कम मिक्सिंग हाइट जैसी स्थितियों को प्रदूषण फैलने के लिए खराब बताया गया है.

पटाखे: कुछ ही घंटों में PM2.5 और दूसरे पॉल्यूटेंट्स बढ़ा सकते हैं
दिवाली की रात प्रदूषण बढ़ने का सबसे सीधा कारण पटाखे हैं. पटाखों से हवा में PM2.5, PM10 और कई तरह के गैसीय और मेटैलिक पॉल्यूटेंट्स निकलते हैं. पटाखों में इस्तेमाल होने वाले कई केमिकल और मेटैलिक कंपाउंड जलने के बाद बहुत बारीक कणों के रूप में पर्यावरण में फैल सकते हैं.

IIT दिल्ली की एक स्टडी में पाया गया कि दिवाली के दौरान PM2.5 में मेटैलिक कंटेंट में काफी बढ़ोतरी हुई. स्टडी के मुताबिक, दिवाली के दौरान पटाखों का असर खासतौर पर ज्यादा था, लेकिन लगभग 12 घंटों के अंदर इसका असर काफी कम हो गया.

इसका मतलब है कि यह समझना जरूरी है कि भले ही पटाखे प्रदूषण का एक बड़ा तुरंत सोर्स हो सकते हैं, लेकिन दिवाली के कई दिनों बाद तक खराब एयर क्वालिटी की पूरी कहानी सिर्फ पटाखों की वजह से नहीं बताई जा सकती.

पराली का धुआं: दिवाली के आसपास इसका असर क्यों बढ़ जाता है?
दिवाली के आसपास पंजाब, हरियाणा और आसपास के खेती वाले इलाकों में धान की कटाई के बाद पराली जलाने की घटनाएं हो सकती हैं. इससे निकलने वाला धुआं हवा के साथ दिल्ली-NCR की तरफ जा सकता है.

IIT दिल्ली के मुताबिक, उत्तर-पश्चिमी हवाओं के समय पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से दिल्ली के इलाके का प्रदूषण बढ़ सकता है. हालांकि, पराली जलाने का असर हर साल और हर दिन एक जैसा नहीं होता है. यह हवा की दिशा, पराली जलाने के मामले, मौसम और दूसरे प्रदूषण सोर्स पर निर्भर करता है.

CPCB की 2020 की दिवाली रिपोर्ट में भी यह बदलाव देखा गया था. उस साल SAFAR के अनुमान के मुताबिक, दिवाली पर PM2.5 में पराली जलाने का हिस्सा 32% था, जबकि यह अनुपात अलग-अलग सालों और तारीखों में काफी अलग-अलग था. इसलिए, यह कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि दिल्ली में दिवाली के बाद की पूरी प्रदूषण समस्या सिर्फ पराली जलाने की वजह से है.

'पॉल्यूशन का ढक्कन' बन जाता है मौसम 
दिल्ली-NCR में सर्दियों में प्रदूषण की समस्या में मौसम का अहम रोल होता है.

सामान्य हालात में गर्म हवा ऊपर उठती है, जिससे पॉल्यूटेंट पर्यावरम में फैल जाते हैं. हालांकि, सर्दियों में अक्सर तापमान व्युत्क्रमण (Temperature Inversion) होता है. इसमें जमीन के पास की ठंडी हवा ऊपर की तुलना में गर्म हवा के नीचे फंस जाती है. इसके प्रभाव से जमीन के पास के पॉल्यूटेंट ऊपर नहीं उठ पाते और फैल नहीं पाते.

अगर हवा की स्पीड भी कम हो तो हालात और खराब हो सकते हैं.

IIT दिल्ली की स्टडी और इंस्टीट्यूशनल एनालिसिस में भी दिल्ली के पॉल्यूशन में योगदान देने वाले मौसम से जुड़ी जरूरी वजहों के तौर पर कम सरफेस विंड, कम मिक्सिंग डेप्थ और इनवर्जन कंडीशन का जिक्र किया गया है.

सिर्फ बाहरी प्रदूषण ही नहीं, दिल्ली का अपना प्रदूषण भी जरूरी है

दिल्ली-NCR की हवा में प्रदूषण का एक बड़ा हिस्सा लोकल कारण से भी आते हैं.
इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
गाड़ियों से निकलने वाला एमिशन
सड़क और निर्माणकार्यों की धूल
इंडस्ट्रियल एक्टिविटी
कचरा जलाना
घरेलू और दूसरे जलने के कारण

IIT दिल्ली की रिसर्च ने दिल्ली के पर्यावरण में लोकल एमिशन और रीजनल पॉल्यूटेंट, दोनों की भूमिका को डॉक्यूमेंट किया है. इसलिए, जब दिवाली के दौरान पटाखे प्रदूषण को और बढ़ाते हैं तो वे पहले से मौजूद प्रदूषण में एक और परत जोड़ देते हैं.

दिवाली के बाद कई दिनों तक प्रदूषण क्यों बना रह सकता है?

मान लीजिए दिवाली की रात पटाखों से हवा में बहुत ज्यादा पॉल्यूटेंट निकलते हैं. अगर अगले दिन हवा तेज होती है तो ये पॉल्यूटेंट काफी तेजी से खत्म हो सकते हैं. लेकिन, अगर हवा की स्पीड कम है, तापमान कम है, तापमान इनवर्जन है, मिक्सिंग हाइट कम है, धुआं आसपास के इलाकों से भी आ रहा है तो पॉल्यूटेंट पर्यावरण में ज्यादा देर तक रह सकते हैं. इसलिए, पटाखों के तुरंत असर और उसके बाद कई दिनों तक रहने वाले प्रदूषण के बीच फर्क करना जरूरी है.

IIT दिल्ली की एक स्टडी में पाया गया कि दिवाली के बाद लगभग 12 घंटों के अंदर पटाखों का असर काफी कम हो जाता है, जबकि बायोमास जलाने से होने वाला एमिशन बढ़ जाता है. रिसर्चर्स ने यह नतीजा निकाला कि दिवाली के बाद खराब एयर क्वालिटी को समझाने में बायोमास जलाने का अहम रोल है.

क्या सिर्फ पराली जलाने से दिल्ली का AQI खराब होता है?
नहीं. पराली का धुआं दिल्ली-NCR की हवा पर असर डाल सकता है, लेकिन हालात के हिसाब से इसका असर अलग-अलग होता है. अगर हवा पंजाब और हरियाणा से दिल्ली की ओर बह रही है और बड़े पैमाने पर फसल जल रही है तो इलाके के प्रदूषण का असर बढ़ सकता है.

हालांकि, अगर हवा की दिशा बदलती है या तेज हवाएं चलती हैं तो असर अलग हो सकता है. इसी तरह, अगर दिल्ली में लोकल एमिशन ज्यादा है और मौसम पॉल्यूटेंट को फैलने से रोकता है तो लोकल कारण भी खराब AQI में योगदान दे सकते हैं. इस समस्या को रीजनल लेवल पर हल करने के लिए CAQM का 2026 स्टबल-बर्निंग एक्शन प्लान भी लागू किया गया है.

दिवाली के बाद धुंध और स्मॉग क्यों दिखाई देता है?
जब हवा में PM2.5 और दूसरे बारीक पार्टिकल्स का लेवल ज्यादा होता है और पर्यावरण में उमस और स्टेबिलिटी बढ़ जाती है तो विजिबिलिटी कम हो सकती है. पॉल्यूटेंट और उमस मिलकर एक धुंध बनाते हैं, जिसे आमतौर पर स्मॉग कहा जाता है. यह सिर्फ देखने में आने वाली समस्या नहीं है. बहुत छोटे PM2.5 पार्टिकल्स सांस के जरिए अंदर जा सकते हैं, जिससे खराब AQI के दौरान हेल्थ रिस्क बढ़ जाता है.

IIT दिल्ली की रिसर्च ने दिल्ली के पर्यावरण में बायोमास बर्निंग, ट्रैफिक और सेकेंडरी ऑर्गेनिक एरोसोल जैसे अलग-अलग सोर्स की भूमिका को डॉक्यूमेंट किया है.

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About the Author

रेनू अकर्णिया, वर्तमान में Zee News में सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं और दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा की लेटेस्ट, ट्रेंडिंग कंटेंट, यूटिलिटी जुड़ी खबरों पर काम कर रहे हैं. रेनू पिछले 3 सालों से डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं. पत्रकारिता में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने 2022 में Zee News से करियर की शुरुआत की.  लोकल चैनल समाचार प्लस में इंटर्न से शुरुआत की और कारवां बढ़ता हुआ जी न्यूज पहुंचा.
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