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आजकल कम उम्र के लोगों में भी हार्ट अटैक और अन्य हृदय समस्याओं की खबरें सुनने को मिलती रहती है. क्या हृदय रोग केवल बढ़ती उम्र में होते हैं? लेकिन आज हम आपको ऐसे डॉक्टर से मिलाने जा रहे हैं, जो आपको हृदय से जुड़ी हर समस्या के साथ-साथ उसके उपायों के बारे में बहुत ही बारीकी से बताते हैं.
अक्सर आपने देखा होगा कि आज के समय में बड़ी संख्या में लोग हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं. खासकर युवाओं में भी हृदय रोगों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है. ऐसे में हृदय स्वास्थ्य, शुरुआती चेतावनी के संकेतों और बचाव के लिए रोजमर्रा की जिंदगी में अपनाई जाने वाली जरूरी आदतों के बारे में जानना बहुत जरूरी है. आइए आपको डॉक्टर डॉ. स्वप्निल एस. गराडे से इनके बारे में विस्तार से जानते हैं.
डॉ. स्वप्निल एस. गराडे का कहना है कि हृदय रोगों को अक्सर अधिक उम्र से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन युवा वयस्क भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. उन्होंने बताया किय समाज में युवाओं की आबादी बड़ी है. इस आयु-वर्ग में हृदय स्वास्थ्य पर ध्यान देना आवश्यक है.
उन्होंने आगे बताया कि हार्ट अटैक होने के बाद इलाज के लिए चिकित्सा सुविधाएं बेहतर हुई हैं, लेकि बीमारी होने से पहले जोखिम कम करने और जागरूकता बढ़ाने पर भी उतना ध्यान देना चाहिए. उन्होंने कहा कि रोकथाम का अर्थ है, जोखिमों को पहचानना, स्वस्थ आदतें अपनाना और जरूरत के अनुसार जांच और इलाज कराना.
डॉक्टर स्वप्निल ने चार प्रमुख जोखिमों को 'Four S' के रूप में समझाया है.
• Smoking (धूम्रपान): धूम्रपान हृदय और रक्त वाहिकाओं के लिए हानिकारक है. इसे तनाव कम करने या स्टाइल का हिस्सा मानना जोखिम को कम नहीं करता. धूम्रपान छोड़ने में सहायता की आवश्यकता हो तो डॉक्टर से बात करें.
• Sedentary lifestyle (कम शारीरिक गतिविधि): लंबे समय तक बैठे रहना और नियमित व्यायाम न करना स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है. अपनी क्षमता के अनुसार रोजाना सक्रिय रहने की आदत बनाएं.
• Sugar (रक्त शर्करा/मधुमेह): मधुमेह हृदय रोग का महत्वपूर्ण जोखिम कारक है. समय पर जांच, उचित उपचार और डॉक्टर की सलाह के अनुसार रक्त शर्करा नियंत्रित रखना महत्वपूर्ण है.
• Stress (तनाव): लगातार तनाव जीवनशैली और समग्र स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है. पर्याप्त आराम, शारीरिक गतिविधि, सामाजिक सहयोग और आवश्यकता पड़ने पर पेशेवर मदद उपयोगी हो सकती है.
इसके अलावा, उच्च रक्तचाप, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, मोटापा और कुछ अन्य स्वास्थ्य स्थितियां भी हृदय रोग के जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं.
1. सीने में दर्द या दबाव हार्ट अटैक का एक जाना-पहचाना संकेत है, लेकिन हर व्यक्ति में लक्षण एक जैसे नहीं होते है. डॉक्टर स्वप्निल ने बताया कि सांस फूलना, दिल की धड़कन तेज होना, असामान्य थकान और पीठ में दर्द जैसे संभावित चेतावनी संकेतों का भी उल्लेख करते हैं.
2. ऐसे लक्षणों के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन यदि वे नए गंभीर या लगातार बने हुए हों, तो उन्हें नजरअंदाज न करें. हार्ट अटैक का संदेह होने पर तुरंत स्थानीय आपातकालीन चिकित्सा सेवा से संपर्क करें. खुद गाड़ी चलाकर अस्पताल जाने के बजाय आपातकालीन सहायता लें.
डॉक्टर ने बताया कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर हृदय रोग के महत्वपूर्ण जोखिम कारक हैं. मधुमेह रक्त वाहिकाओं को प्रभावित कर सकता है और धमनियों में कोलेस्ट्रॉल जमा होने की प्रक्रिया से जुड़ा हो सकता है. उच्च रक्तचाप भी हृदय और मस्तिष्क से जुड़ी गंभीर समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है.
उन्होंने कहा कि बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल में अक्सर स्पष्ट लक्षण नहीं होते. इसलिए केवल अच्छा महसूस करने के आधार पर कोलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य मान लेना सही नहीं है. डॉक्टर की सलाह के अनुसार, लिपिड प्रोफाइल और अन्य आवश्यक जांच कराएं.
दवाइयों को लेकर भी गलतफहमियां हो सकती हैं. दवा की जरूरत और उसे कितने समय तक लेना है, यह हर व्यक्ति में अलग हो सकता है. डॉक्टर से चर्चा किए बिना दवा शुरू, बंद या उसकी मात्रा में बदलाव न करें.
परिवार में कम उम्र में हृदय रोग, हार्ट अटैक, अचानक मृत्यु, बायपास सर्जरी या एंजियोप्लास्टी का इतिहास हो तो डॉक्टर को अवश्य बताएं.
बातचीत में डॉक्टर ने बताया कि आनुवंशिक कारण कुछ लोगों में बीमारी शुरू होने की उम्र को प्रभावित कर सकते हैं. पारिवारिक इतिहास होने का अर्थ यह नहीं है कि हृदय रोग होना निश्चित है. लेकिन यह डॉक्टर को जोखिम का बेहतर आकलन करने और यह तय करने में मदद कर सकता है कि किस उम्र में और कौन-सी जांच उपयुक्त होगी. स्क्रीनिंग की उम्र और अंतराल व्यक्तिगत जोखिम तथा चिकित्सकीय सलाह के अनुसार तय होने चाहिए.
बातचीत में नींद की अवधि के साथ उसकी गुणवत्ता पर भी जोर दिया गया है. बार-बार नींद खुलना, लगातार थकान, तेज खर्राटे या सोते समय सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याओं को नजरअंदाज न करें. यदि ये समस्याएं नियमित रूप से होती हैं, तो डॉक्टर से सलाह लें.
तनाव को पूरी तरह खत्म करना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन उसे संभालने के तरीके अपनाए जा सकते हैं. जैसे- नियमित व्यायाम, आराम के लिए समय, परिवार या मित्रों से बातचीत और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद.
H- History (पारिवारिक इतिहास): परिवार में हृदय रोग का इतिहास जानें और डॉक्टर के साथ साझा करें.
E- Exercise (व्यायाम): एरोबिक गतिविधियों के साथ, अपनी क्षमता के अनुसार मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम भी शामिल करें.
बातचीत में डॉक्टर नियमित व्यायाम को लगभग 30-40 मिनट प्रतिदिन करने की सलाह देते हैं. अपनी स्थिति के अनुसार उपयुक्त मात्रा तय करने के लिए चिकित्सकीय सलाह लें.
A- Avoid Smoking (धूम्रपान से बचें): धूम्रपान और तंबाकू से दूर रहें. छोड़ने में कठिनाई हो तो सहायता लें.
R- Risk Factors (जोखिम पहचानें): ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, वजन और अन्य संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं पर ध्यान दें.
T- Thoughtful Eating (सोच-समझकर भोजन): भोजन की मात्रा और गुणवत्ता पर ध्यान दें. संतुलित भोजन में प्रोटीन, फाइबर, फल और सब्ज़ियाँ शामिल करें.
डॉक्टर स्वप्निल ने बताया कि 10,000 कदम कोई अनिवार्य लक्ष्य नहीं है. इसे लोगों को अधिक सक्रिय बनाने के लिए प्रेरक लक्ष्य की तरह देखा जा सकता है. बातचीत में 7000-8000 कदमों का भी उल्लेख है, लेकिन हर व्यक्ति की जरूरत, क्षमता और स्वास्थ्य स्थिति अलग होती है.
केवल चलना ही व्यायाम का एकमात्र रूप नहीं है. तेज चाल से चलना, साइकिल चलाना, तैरना या खेल जैसी एरोबिक गतिविधियां और उपयुक्त स्ट्रेंथ ट्रेनिंग. दोनों उपयोगी हो सकते हैं. यदि आपको घुटनों, जोड़ों या हृदय से जुड़ी समस्या है, तो व्यायाम का प्रकार और तीव्रता डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह से तय करें.
बातचीत में डॉक्टर प्लेट को चार हिस्सों में बांटने का एक आसान तरीका बताते हैं: कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, डेयरी और फल या सलाद जैसे खाद्य समूहों को संतुलित मात्रा में शामिल करें. इसे एक सामान्य विचार के रूप में लें. हर व्यक्ति की पोषण संबंधी जरूरतें अलग हो सकती हैं.
प्रोटीन के स्रोतों में दालें, राजमा, छोले, पनीर और आवश्यकता के अनुसार कम तेल में तैयार चिकन या मछली शामिल हो सकते हैं. फल, सब्जियां और फाइबरयुक्त खाद्य पदार्थ भी आहार का हिस्सा हों. अपनी प्लेट में रोटी, चावल या आलू जैसे कार्बोहाइड्रेट की मात्रा पर ध्यान दें और जरूरत से अधिक खाने से बचें.
चाय या कॉफी के बारे में बातचीत में डॉक्टर विशेष रूप से अतिरिक्त चीनी कम करने की बात करते हैं. मधुमेह, किडनी की बीमारी या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं होने पर आहार योजना डॉक्टर या योग्य डाइटीशियन के अनुसार बनाएं.
डॉक्टर बातचीत में लिपिड प्रोफाइल और अन्य रक्त जांचों के महत्व का उल्लेख करते हैं. कुछ लोगों के लिए ECG, इकोकार्डियोग्राफी या ट्रेडमिल टेस्ट जैसी जांचें भी उपयुक्त हो सकती हैं.
हालांकि, इस बातचीत में बताए गए उम्र-आधारित जांच अंतराल को हर व्यक्ति के लिए सार्वभौमिक नियम नहीं मानना चाहिए. कौन-सी जांच, किस उम्र में और कितनी बार करानी है, यह लक्षणों, पारिवारिक इतिहास, जोखिम कारकों और डॉक्टर की सलाह पर निर्भर करता है.
सीने में दर्द, सांस लेने में परेशानी या अन्य गंभीर लक्षण होने पर नियमित चेकअप की तारीख का इंतजार न करें, तुरंत आपातकालीन सहायता लें.
मिथक 1: कोलेस्ट्रॉल बढ़ने पर जरूर लक्षण दिखाई देंगे. ऐसा आवश्यक नहीं है; कोलेस्ट्रॉल बढ़ने पर अक्सर स्पष्ट लक्षण नहीं होते.
मिथक 2: दवा शुरू की तो जीवनभर लेनी ही पड़ेगी. उपचार की अवधि व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करती है. दवा में बदलाव केवल डॉक्टर की सलाह से करें.
मिथक 3: दवाइयां शरीर को कमजोर बनाती हैं. यह सभी दवाओं के लिए सही नहीं है. किसी दवा से परेशानी हो तो डॉक्टर से बात करें.
मिथक 4: स्टेंट लगने के बाद सामान्य जीवन संभव नहीं है. कई लोग उपचार के बाद अपनी गतिविधियों में लौट सकते हैं, रिकवरी और व्यायाम के बारे में उपचार करने वाली टीम की सलाह मानें.
मिथक 5: युवा हैं, इसलिए हृदय रोग का खतरा नहीं है. कम उम्र जोखिम से पूरी तरह सुरक्षा नहीं देती. स्वस्थ आदतें और जोखिमों की समय पर पहचान हर उम्र में महत्वपूर्ण हैं.
डॉक्टर ने बातचीत का मुख्य संदेश दिया है कि हृदय की देखभाल बीमारी होने के बाद ही शुरू नहीं होनी चाहिए. जागरूकता, जोखिमों की पहचान और रोजमर्रा की आदतों में सुधार बचाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं.
परिवार का मेडिकल इतिहास जानें, धूम्रपान से दूर रहें, नियमित शारीरिक गतिविधि करें, संतुलित भोजन लें, पर्याप्त नींद लें और तनाव को संभालने के स्वस्थ तरीके अपनाएं. ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जांच अपनी जरूरत के अनुसार कराएं.
हृदय स्वास्थ्य के लिए किसी एक आदत पर निर्भर रहने के बजाय जीवनशैली, जोखिम प्रबंधन और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय देखभाल को साथ लेकर चलना बेहतर है.
• अपने परिवार का हृदय रोग संबंधी इतिहास जानें.
• धूम्रपान और तंबाकू से दूर रहें.
• रोजमर्रा की दिनचर्या में अपनी क्षमता के अनुसार व्यायाम शामिल करें.
• ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जांच डॉक्टर की सलाह से कराएं
• भोजन में फल, सब्जियां, फाइबर और पर्याप्त प्रोटीन शामिल करें.
• पर्याप्त और अच्छी गुणवत्ता वाली नींद लें.
• तनाव, तेज खर्राटों और लगातार थकान जैसी समस्याओं पर ध्यान दें.
• दवाइयां डॉक्टर के निर्देशानुसार लें.
• हार्ट अटैक के संभावित चेतावनी संकेत पहचानें और आपातस्थिति में तुरंत सहायता लें.
यह ब्लॉग HEART TALKS के उपलब्ध पॉडकास्ट पर आधारित सामान्य स्वास्थ्य-जागरूकता और शैक्षिक सामग्री है. यह सामग्री किसी योग्य डॉक्टर की सलाह, चिकित्सकीय जांच, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है. अपने स्वास्थ्य, जांच या उपचार से संबंधित निर्णय लेने से पहले योग्य चिकित्सा विशेषज्ञ से परामर्श करें. डॉक्टर की सलाह के बिना निर्धारित दवाएं बंद न करें, शुरू न करें और न ही उनकी खुराक में बदलाव करें. हार्ट अटैक के संभावित लक्षण या कोई चिकित्सा आपातस्थिति होने पर तुरंत स्थानीय आपातकालीन चिकित्सा सेवा से संपर्क करें. जागरूक रहें, स्वस्थ आदतें अपनाएं और अपने दिल की देखभाल करें.