)
सिंहस्थ कुंभपर्व के पावन अवसर पर अंतर योग फाउंडेशन के संस्थापक एवं जीवन्मुक्त सद्गुरु ब्रह्मर्षि आचार्य उपेंद्र जी ने गुरुमाँ नीता ताई के साथ नाशिक में आयोजित भव्य धर्मध्वजारोहण रथयात्रा में सहभागिता की. इस आयोजन में एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं के साथ देशभर से अनेक संतों, महात्माओं, आध्यात्मिक मार्गदर्शकों और धार्मिक संस्थाओं ने सहभाग लिया. कुंभपर्व के गहन आध्यात्मिक उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए आचार्य उपेंद्र जी ने कहा कि इसका वास्तविक महत्त्व केवल धार्मिक विधि-विधानों और सामूहिक उत्सवों तक सीमित नहीं है, अपितु इसके आध्यात्मिक प्रयोजन को समझने और उसे जीवन में उतारने में निहित है.
कुंभपर्व का महत्त्व समझाते हुए आचार्य जी ने कहा, 'कुंभ आत्मसाक्षात्कार रूपी अमृत से भरा हुआ एक पवित्र कलश है. कुंभपर्व विभिन्न परंपराओं के गुरुओं, संतों, महात्माओं और साधकों का विशाल आध्यात्मिक संगम है. यहाँ विचारों का आदान-प्रदान होता है, शास्त्रों पर चर्चा होती है और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार होता है. लाखों श्रद्धालुओं की सामूहिक श्रद्धा से ऐसा वातावरण निर्मित होता है, जो प्रत्येक व्यक्ति के भीतर आस्था और आध्यात्मिकता की ज्योति प्रज्वलित कर सकता है. किंतु यह अनुभव तभी सार्थक होता है, जब मनुष्य किसी सच्चे गुरु के मार्गदर्शन में मोक्ष का ज्ञान प्राप्त करे, साधना करे और आत्मसाक्षात्कार की दिशा में अग्रसर हो.'
उन्होंने आगे बताया कि कुंभपर्व भारत की समृद्ध ज्ञान-परंपरा, साधना और संत-समागम की महान परंपरा का प्रतीक है. ऐसे समागम मनुष्य को धर्म, अध्यात्म और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने का अवसर प्रदान करते हैं. श्रद्धा और भक्ति से परिपूर्ण ऐसा सामूहिक वातावरण नास्तिक व्यक्ति को भी आस्था के मार्ग की ओर प्रेरित कर सकता है.
नाशिक के सिंहस्थ कुंभ का विशेष महत्त्व बताते हुए आचार्य जी ने कहा, 'सिंहस्थ कुंभ का संबंध गुरु के सिंह राशि में प्रवेश और सूर्य की उसी राशि में स्थिति से है. आध्यात्मिक दृष्टि से गुरु ज्ञान का तथा सूर्य आत्मतत्त्व का प्रतीक है. इस प्रकार सिंहस्थ केवल ज्योतिषीय घटना नहीं, अपितु आत्मतत्त्व के जागरण और ज्ञानप्राप्ति की दिशा में अग्रसर होने की प्रेरणा देने वाला अवसर है.'
ब्रह्मर्षि आचार्य उपेंद्र जी वर्ष २००५ से भारतीय ज्ञानपरंपरा के पुनरुत्थान, वेद-वेदांत एवं प्राचीन शास्त्रज्ञान के प्रसार तथा गुरुकुल व्यवस्था के पुनरुद्धार के लिए कार्यरत हैं. अभियांत्रिकी में दो उपाधियों के साथ-साथ विभिन्न अभियांत्रिकी शाखाओं, आधुनिक विज्ञान और अर्थशास्त्र का ज्ञान रखने वाले आचार्य जी ने वेद, पुराण, उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र, दर्शनशास्त्र और चालीस से अधिक प्रकार की गीताओं का गहन अध्ययन किया है. आयुष मंत्रालय से प्रमाणित योगचिकित्सक की उपाधि तथा योगसाधना के माध्यम से प्राप्त विभिन्न आध्यात्मिक सिद्धियों का भी उनके कार्यपरिचय में उल्लेख किया जाता है. रोगनिवारण सिद्धि, वाक्-सिद्धि, मेधाशक्ति, संकल्पसिद्धि और श्रीविद्या जैसी साधनाओं का उपयोग वे जनकल्याण के लिए करते हैं. गणेश अथर्वशीर्ष के दस श्लोकों का सबसे विस्तृत एवं गहन विवेचन करने वाला लगभग ६०० पृष्ठों का उनका महाग्रंथ 'श्री गणपति अथर्वशीर्ष महाभाष्य' भी विशेष उल्लेखनीय है.
कुंभपर्व से प्राप्त प्रेरणा को दैनिक जीवन में उतारने का महत्त्व बताते हुए आचार्य जी ने कहा, 'कुछ दिनों तक कुंभपर्व में सहभागिता करने मात्र से मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण नहीं होती. वहाँ से प्राप्त प्रेरणा को नियमित साधना और योग्य गुरु के मार्गदर्शन के साथ अपने दैनिक जीवन का अंग बनाना आवश्यक है. केवल धार्मिक विधि-विधान करना पर्याप्त नहीं; उनके अर्थ को समझकर तदनुसार आचरण करना भी आवश्यक है. यज्ञ, मंत्रजप और पूजन से मन की शुद्धि होती है, किंतु मोक्षप्राप्ति के लिए मुक्ति का ज्ञान आवश्यक है. गुरु के मार्गदर्शन में शास्त्रों का सम्यक् अध्ययन और मनन आत्मज्ञान की ओर ले जाता है, जो मुक्ति का मार्ग दिखाता है. इस अनुभूति को गहन बनाने के लिए ध्यान और आत्मचिंतन भी आवश्यक हैं.'
इसी विचारधारा के साथ अंतर योग फाउंडेशन, फोर्ट, मुंबई कार्यरत है. भारत को स्वस्थ, समृद्ध और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाकर विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित करना इस संस्था का ध्येय है. संस्था कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और ध्यानयोग—योग के चारों मार्गों का ज्ञान जनसामान्य तक पहुँचाने का कार्य कर रही है, जिससे ज्ञानी और आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत व्यक्तियों का निर्माण हो सके. संस्था का कार्य 'जनहिताय स्वयं मोक्षाय च' अर्थात समाज कल्याण करते हुए स्वयं का मोक्ष इस उदात्त सिद्धांत से प्रेरित है.
अंतर योग गुरुकुल के माध्यम से संस्था ज्ञानसत्र, आध्यात्मिक शिविर और विविध साधना कार्यक्रमों का आयोजन करती है. आचार्य जी के मार्गदर्शन में साधक मन की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए यज्ञ, मंत्रजप, पूजन तथा अन्य साधनाएँ करते हैं. अपने शास्त्रसम्मत प्रवचनों के माध्यम से आचार्य जी वेद, उपनिषद्, पुराण, गीता और अन्य शास्त्रों में वर्णित मुक्ति का गहन ज्ञान प्रदान करते हैं. वे प्राचीन शास्त्रों में निहित सनातन ज्ञान को सरल और सुबोध भाषा में समझाकर विज्ञान और अध्यात्म के बीच सेतु स्थापित करते हैं. इससे वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले लोगों में अध्यात्म के प्रति श्रद्धा जागृत होती है, वहीं धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति भी अपने शास्त्रों में निहित विज्ञान को समझकर अंधश्रद्धा से दूर होते हैं.
भगवद् गीता का संदेश 'ज्ञानी भक्त बनो' आचार्य जी की शिक्षाओं का मूल आधार है. इसी कारण विभिन्न धर्मों और विचारधाराओं से जुड़े साधक अंतर योग फाउंडेशन से जुड़ रहे हैं. उनके प्रश्नों का समाधान वैज्ञानिक संदर्भों, तार्किक विवेचन और शास्त्रीय ज्ञान के आधार पर किया जाता है. आचार्य जी के ज्ञानसत्रों में प्राप्त गहन ज्ञान से लाखों साधकों के जीवन के जटिल प्रश्नों को देखने और समझने की दृष्टि बदल रही है. उन्हें अपनी समस्याओं के समाधान के मार्ग मिल रहे हैं. साथ ही, ये शिक्षाएँ उन्हें व्यक्तिगत उन्नति के साथ-साथ समाज और राष्ट्र की प्रगति में योगदान देने के लिए भी प्रेरित करती हैं.
लोगों से अपनी आध्यात्मिक यात्रा आरंभ करने के लिए अगले कुंभपर्व की प्रतीक्षा न करने का आह्वान करते हुए आचार्य जी ने कहा, 'कुंभपर्व का वास्तविक लाभ तभी प्राप्त होता है, जब हम उसके आध्यात्मिक सार को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लेते हैं. अंतर योग फाउंडेशन द्वारा आयोजित ऑनलाइन एवं प्रत्यक्ष शिविरों में सहभागिता करें. जीवन्मुक्त सद्गुरु के मार्गदर्शन में मोक्ष का ज्ञान प्राप्त करें और भारत को विश्वगुरु बनाने के महान संकल्प का अंग बनें. अपनी आध्यात्मिक यात्रा आज ही आरंभ करें!'