कभी हाथों में बंदूकें थीं, जंगलों की खाक छानते थे और खौफ का दूसरा नाम हुआ करते थे, लेकिन आज बस्तर की लाल माटी से बदलाव की एक ऐसी बयार बह रही है, जिसकी उम्मीद शायद किसी ने आज से नहीं की थी. केंद्र सरकार ने एक डेडलाइन तय की थी- 31 मार्च 2026. इस तारीख तक बस्तर सहित पूरे देश से माओवाद को समाप्त करना था और तय तारीख तक देशभर से सशस्त्र माओवाद खतम भी हो गया, लेकिन बस्तर में सशस्त्र माओवाद का दायरा सिमटने के बाद जब आत्मसमर्पण का दौर शुरू हुआ, तो सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या ये लोग समाज की मुख्यधारा में सामान्य जिंदगी जी पाएंगे?
इस सवाल का जवाब बस्तर के ही उन पूर्व माओवादियों ने दिया है, जिन्होंने अपनी हिम्मत और पढ़ाई के दम पर मुख्यधारा में अपनी नई पहचान दर्ज कराई है. हाल ही में छत्तीसगढ़ ओपन बोर्ड से 10वीं की परीक्षा देने वाले 8 आत्मसमर्पित माओवादियों ने जब सफलता हासिल की, तो सिर्फ वे ही पास नहीं हुए, बल्कि बस्तर का एक नया भविष्य भी आकार लेने लगा.
बिना पढ़े बनी थीं 'माओवादी डॉक्टर', अब पास की 10वीं
इस पूरी कहानी का सबसे मानवीय और भावुक पहलू 'गीता नारोटे' हैं. गीता जब छोटी थीं, तब घर में सिर्फ छठी क्लास तक पढ़ाई कर पाई थीं. इसके बाद वो संगठन से जुड़ गईं, लेकिन जंगल के कठिन और खौफनाक माहौल में भी गीता के भीतर किसी की मदद करने का भाव जिंदा रहा. संगठन के भीतर गीता ने प्राथमिक उपचार का काम संभालना शुरू किया. बिना किसी मेडिकल डिग्री या स्कूली पढ़ाई के वो जंगल में सिर्फ व्यावहारिक अनुभव के दम पर 'माओवादी डॉक्टर' के रूप में पहचानी जाने लगीं. मलेरिया, पेट दर्द, उल्टी-दस्त से लेकर खौफनाक मुठभेड़ों में घायल होने वाले माओवादियों का इलाज गीता ही करती थीं.
...लेकिन मुख्यधारा में लौटने के बाद गीता को अहसास हुआ कि अगर समाज में सम्मान से जीना है, तो कलम थामना जरूरी है. गीता ने Zee News से बात करते हुए बताया, 'मैं जंगल में भी कुछ न कुछ पढ़ती रहती थी, ताकि दवाइयों के नाम समझ सकूं, लेकिन आत्मसमर्पण के बाद जब अफसरों ने हौसला बढ़ाया, तो मैंने 10वीं का फॉर्म भरा. इस बार परीक्षा में मुझे 347 अंक मिले हैं. पास होने के बाद अब लगता है कि मैं समाज के लिए वाकई कुछ अच्छा काम कर सकती हूं.' गीता अब आगे 12वीं की पढ़ाई करने के साथ-साथ समाज की सेवा में ही अपना जीवन समर्पित करना चाहती हैं.
पूर्व कमांडर सेतु दादा की बेमिसाल भूमिका
अगर गीता और उनके साथियों ने 10वीं की परीक्षा पास की है, तो इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ सेतु दादा का है. सेतु दादा कभी बस्तर डिवीजन को संभालने वाले एक खतरनाक माओवादी कमांडर हुआ करते थे. संगठन छोड़कर जब वे मुख्यधारा में आए, तो उन्होंने न केवल खुद की जिंदगी बदली, बल्कि अपने साथी आत्मसमर्पित माओवादियों के भविष्य की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर ले ली. पुनर्वास केंद्र में सेतु दादा खुद 'मास्टर जी' की भूमिका में आ गए. वे जगदलपुर के लालबाग पीटीएस (PTS) में रोज सुबह 8 बजे से 11:30 बजे तक और फिर दोपहर 2 बजे से 4:30 बजे तक अपने साथी आत्मसमर्पित माओवादियों को पढ़ाते थे.
सेतु दादा की क्लास का अनुशासन ऐसा था कि 10वीं की परीक्षा देने वाले सभी पूर्व माओवादी रात को 11 बजे तक पढ़ाई करते थे. पुलिस प्रशासन (आईजी और एसपी) द्वारा मिली 50% प्रोत्साहन राशि से किताबें खरीदी गईं और सेतु दादा की दिन-रात की मेहनत का ही नतीजा है कि आज उनके पढ़ाए कई साथी 10वीं पास कर चुके हैं.
रामधर का संघर्ष और सपना
गीता नारोटे के अलावा एक और कहानी रामधर कश्यप की है, जिन्हें संगठन में 'वीर' के नाम से जाना जाता था. रामधर की कहानी भटकने, जेल जाने और फिर सही राह पर आने का एक कड़ा उदाहरण है. रामधर बताते हैं कि बचपन में वे सिर्फ दूसरी कक्षा तक ही पढ़ पाए थे. साल 2009 में वे माओवादी संगठन में शामिल हो गए. 2010 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और वे जगदलपुर सेंट्रल जेल में तीन साल बंद रहे. जेल के भीतर रहते हुए ही उन्होंने चौथी कक्षा की परीक्षा पास की. लेकिन जेल से रिहा होने के बाद वे दोबारा भटककर जंगल की राह पकड़ बैठे.
मार्च 2026 में जब रामधर ने आत्मसमर्पण किया, तब स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने उनका मार्गदर्शन किया. रामधर ने बताया, 'हम रात-रात भर पढ़ते थे. सेतु दादा ने हमें पढ़ाया. अब जब 10वीं का रिजल्ट आ गया है, तो दिल को बहुत तसल्ली मिली है. मैं समाज में कोई छोटा-मोटा धंधा, दुकान या खेतीबाड़ी करके अपने परिवार का पेट पालना चाहता हूं और समाज का एक पढ़ा-लिखा हिस्सा बनना चाहता हूं.'
10वीं पास करने से बढ़ गया सन्नु का हौसला
इस बदलाव की कड़ी में तीसरे अहम चेहरे सन्नु आचला हैं. सन्नु की कहानी यह साबित करती है कि अगर इंसान के भीतर सीखने की ललक हो, तो परिस्थितियां चाहें जितनी विषम हों, रास्ता निकल ही आता है. सन्नु बचपन में अपने घर पर सिर्फ पहली-दूसरी कक्षा तक ही पढ़ पाए थे. जब वे संगठन में गए, तो वहां भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी. वे जंगल में रहते हुए भी पांचवीं, छठवीं और सातवीं की किताबें मंगाकर पढ़ते थे. सन्नु बताते हैं कि संगठन के भीतर समय का बहुत पाबंदी से पालन होता था और वे उसी अनुशासन के बीच पढ़ाई करते रहे.
आत्मसमर्पण के बाद सन्नु ने 10वीं ओपन की परीक्षा दी और 23 तारीख को आए रिजल्ट में पास हो गए. 10वीं पास करने के बाद अब सन्नु का हौसला इतना बढ़ गया है कि वे 12वीं की परीक्षा भी देना चाहते हैं. नौकरी मिलने न मिलने की परवाह किए बिना सन्नु कहते हैं कि चाहे खेतीबाड़ी करूं या कोई दुकान/व्यवसाय शुरू करूं, लेकिन मुझे अब समाज के बीच रहकर एक सम्मानित और पढ़ा-लिखा नागरिक बनकर जीना है.
उम्मीद और बदलाव की नई तस्वीर
स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग के संयुक्त प्रयासों से बस्तर के पुनर्वास केंद्रों में चल रही यह पहल सिर्फ एक परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं है. यह एक सीधा संदेश है कि बंदूक की नली से सिर्फ तबाही निकलती है, जबकि कलम की नोक से एक नया और सम्मानजनक जीवन शुरू होता है. बस्तर में अब गोलियों की गूंज शांत हो रही है और किताबों के पन्ने पलटने की आवाजें नई उम्मीदें जगा रही हैं. (इनपुट- अनूप अवस्थी)