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छत्तीसगढ़ के इस शहर में रावण दहन नहीं, होता है वध, मिट्टी घर ले जाकर पूजा करते हैं लोग

छत्तीसगढ़ के छुईखदान में दशहरे पर रावण दहन नहीं, बल्कि वध की परंपरा निभाई जाती है. वध के बाद श्रद्धालु पुतले की मिट्टी घर ले जाकर पूजा स्थल पर रखते हैं.

Written By Manish Kushawah
Published: Oct 20, 2026, 11:37 PM IST | Updated: Oct 21, 2026, 12:19 AM IST
Image Credit: ZEE NEWS
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पूरे देश में विजदशमी यानी दशहरे के मौके पर रावण दहन की परंपरा सदियों से चली आ रही है, लेकिन खैरागढ़ जिले के छुईखदान में इसे कुछ अलग अंदाज में निभाई जाती है. बताया जाता है कि यहां पर रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि उसका वध किया जाता है.

यहां पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही इस परंपरा के तहत भगवान राम और हनुमान जी के स्वरूप आयोजन में शामिल होते हैं. रावण का सिर अलग करने के बाद उसकी नाभि पर प्रहार कर वध की रस्म पूरी की जाती है. इतना ही नहीं, रावण के पुतले में इस्तेमाल की गई मिट्टी को भी लोग घर ले जाकर पूजा स्थल पर रखते हैं. छुईखदान के दशहरे की यह परंपरा दूसरे स्थानों से अलग है.

रावण के नाभि में अमृत होने की मान्यता

छुईखदान में दशहरे के दिन रावण दहन के बजाय उसके वध की परंपरा निभाई जाती है. यहां के राजा गिरिराज दास ने बताया कि यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी इसका पालन किया जा रहा है.

उन्होंने बताया कि दशहरे के आयोजन में भगवान राम और हनुमान जी के स्वरूप पहुंचते हैं. परंपरा के अनुसार, राजपरिवार के निशान को हनुमान जी के स्वरूप से जोड़कर विशेष महत्व दिया जाता है. इसके बाद रावण का सिर अलग किया जाता है और उसकी नाभि पर प्रहार कर वध की रस्म पूरी की जाती है. यह प्रक्रिया रामायण में रावण की नाभि में अमृत होने की मान्यता से जुड़ी है.

गीली मिट्टी से बनता है पुतला

इस परंपरा का एक और खास पहलू रावण वध के बाद देखने को मिलता है. यहां कुम्हार द्वारा गीली मिट्टी से रावण का पुतला बनाया जाता है. वध के बाद श्रद्धालु पुतले के शरीर पर लगी मिट्टी को अपने घर ले जाते हैं. घर पहुंचकर पहले मिट्टी की पूजा की जाती है, पान अर्पित किया जाता है और फिर उसे पूजा स्थल पर सम्मानपूर्वक रखा जाता है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण को मां लक्ष्मी से भी जोड़कर देखा जाता है.

रावण वध की परंपरा

देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन छुईखदान में रावण वध की परंपरा आज भी निभाई जा रही है. पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा यहां के दशहरा आयोजन की अलग पहचान बनी हुई है.

(रिपोर्टः हेमंत कुमार पाल, खैरागढ़)
 

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मनीष कुशवाह डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी और डिजिटल मीडिया में 5 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (MP-CG) की डिजिटल टीम में सब-एडिटर के रूप में काम कर रहे हैं. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीति, क्राइम, कृषि व्यवस्था और ग्रामीण (हाइपरलोकल) सरोकारों से जुड़ी खबरों की गहराई से कवरेज करना उनकी एक्सपर्टीज है.नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (NIMC) से पत्रकारिता में डिप्लोमा पूरा करने के बाद मनीष ने मीडिया जगत में अपना सफर शुरू किया. ज़ी न्यूज़ से पहले उन्होंने News18 Hindi (Local18), इंडिया न्यूज़ और जनता टीवी जैसे प्रमुख समाचार चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में काम किया है. इस दौरान उन्होंने न्यूज़ प्लानिंग, कंटेंट आइडिएशन और डेस्क मैनेजमेंट की अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं. वे खबरों की प्रामाणिकता और ग्राउंड रियलिटी को प्राथमिकता देते हैं, ताकि पाठकों तक सटीक और भरोसेमंद जानकारी पहुंचे.मनीष कुशवाह से आप Manish2.Kumar@india.com पर ईमेल के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा, एक्स (ट्विटर) और फेसबुक के जरिए भी उनसे सीधा संवाद कर सकते हैं.
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