छत्तीसगढ़ के इस शहर में रावण दहन नहीं, होता है वध, मिट्टी घर ले जाकर पूजा करते हैं लोग
छत्तीसगढ़ के छुईखदान में दशहरे पर रावण दहन नहीं, बल्कि वध की परंपरा निभाई जाती है. वध के बाद श्रद्धालु पुतले की मिट्टी घर ले जाकर पूजा स्थल पर रखते हैं.
पूरे देश में विजदशमी यानी दशहरे के मौके पर रावण दहन की परंपरा सदियों से चली आ रही है, लेकिन खैरागढ़ जिले के छुईखदान में इसे कुछ अलग अंदाज में निभाई जाती है. बताया जाता है कि यहां पर रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि उसका वध किया जाता है.
यहां पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही इस परंपरा के तहत भगवान राम और हनुमान जी के स्वरूप आयोजन में शामिल होते हैं. रावण का सिर अलग करने के बाद उसकी नाभि पर प्रहार कर वध की रस्म पूरी की जाती है. इतना ही नहीं, रावण के पुतले में इस्तेमाल की गई मिट्टी को भी लोग घर ले जाकर पूजा स्थल पर रखते हैं. छुईखदान के दशहरे की यह परंपरा दूसरे स्थानों से अलग है.
रावण के नाभि में अमृत होने की मान्यता
छुईखदान में दशहरे के दिन रावण दहन के बजाय उसके वध की परंपरा निभाई जाती है. यहां के राजा गिरिराज दास ने बताया कि यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी इसका पालन किया जा रहा है.
उन्होंने बताया कि दशहरे के आयोजन में भगवान राम और हनुमान जी के स्वरूप पहुंचते हैं. परंपरा के अनुसार, राजपरिवार के निशान को हनुमान जी के स्वरूप से जोड़कर विशेष महत्व दिया जाता है. इसके बाद रावण का सिर अलग किया जाता है और उसकी नाभि पर प्रहार कर वध की रस्म पूरी की जाती है. यह प्रक्रिया रामायण में रावण की नाभि में अमृत होने की मान्यता से जुड़ी है.
गीली मिट्टी से बनता है पुतला
इस परंपरा का एक और खास पहलू रावण वध के बाद देखने को मिलता है. यहां कुम्हार द्वारा गीली मिट्टी से रावण का पुतला बनाया जाता है. वध के बाद श्रद्धालु पुतले के शरीर पर लगी मिट्टी को अपने घर ले जाते हैं. घर पहुंचकर पहले मिट्टी की पूजा की जाती है, पान अर्पित किया जाता है और फिर उसे पूजा स्थल पर सम्मानपूर्वक रखा जाता है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण को मां लक्ष्मी से भी जोड़कर देखा जाता है.
रावण वध की परंपरा
देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन छुईखदान में रावण वध की परंपरा आज भी निभाई जा रही है. पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा यहां के दशहरा आयोजन की अलग पहचान बनी हुई है.
(रिपोर्टः हेमंत कुमार पाल, खैरागढ़)