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अपनी बात रखना गुनाह है? बालोद में कसही गांव का ‘हुक्का-पानी’ बंद, बच्चों की कॉपी-किताब तक रोकी

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है. जहां बालोद के ग्राम पंचायत टटेंगा में कसही गांव के लोगों का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया है. इतना ही नहीं स्कूली बच्चों के लिए भी झकझोर देने वाला फरमान जारी किया है. आइए जानते हैं इस विवाद के पीछे की कहानी जानते हैं.

Written ByManish Kushawah
Published: Sep 15, 2026, 09:17 PM IST|Updated: Sep 15, 2026, 09:31 PM IST
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अपनी बात रखना गुनाह है? बालोद में कसही गांव का ‘हुक्का-पानी’ बंद, बच्चों की कॉपी-किताब तक रोकी
Image Credit: Tatenga Panchayat News

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Manish Kushawah

Manish Kushawah

मनीष कुशवाह डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी और डिजिटल मीडिया में 5 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (MP-CG) की डिजिटल टीम में सब-एडिटर के रूप में काम कर रहे हैं. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीति, क्राइम, कृषि व्यवस्था और ग्रामीण (हाइपरलोकल) सरोकारों से जुड़ी खबरों की गहराई से कवरेज करना उनकी एक्सपर्टीज है.नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (NIMC) से पत्रकारिता में डिप्लोमा पूरा करने के बाद मनीष ने मीडिया जगत में अपना सफर शुरू किया. ज़ी न्यूज़ से पहले उन्होंने News18 Hindi (Local18), इंडिया न्यूज़ और जनता टीवी जैसे प्रमुख समाचार चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में काम किया है. इस दौरान उन्होंने न्यूज़ प्लानिंग, कंटेंट आइडिएशन और डेस्क मैनेजमेंट की अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं. वे खबरों की प्रामाणिकता और ग्राउंड रियलिटी को प्राथमिकता देते हैं, ताकि पाठकों तक सटीक और भरोसेमंद जानकारी पहुंचे.मनीष कुशवाह से आप Manish2.Kumar@india.com पर ईमेल के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा, एक्स (ट्विटर) और फेसबुक के जरिए भी उनसे सीधा संवाद कर सकते हैं.
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21वीं सदी के इस डिजिटल दौर में छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसे सुनकर कोई भी हैरान रह जाएगा. ग्राम पंचायत टटेंगा का एक गांव कसही के बीच विवाद इतना बढ़ गया है कि कसही के ग्रामीणों का हुक्का-पानी भी बंद कर दिया है. आरोप है कि टटेंगा के कुछ लोगों ने मुनादी करवाकर उनका सामाजिक तौर पर बहिष्कार करने का फरमान जारी कर दिया. ग्रामीणों ने बताया कि अब कसही के लोगों को टटेंगा में राशन, गैस सिलेंडर, मजदूरी और रोजमर्रा की चीजें तक नहीं मिल रही हैं. सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इस विवाद की आंच अब बच्चों तक पहुंच गई है.

ग्रामीणों ने बताया कि पूरे विवाद की शुरुआत पंचायत चुनाव के दौरान हुई थी. कसही के ग्रामीण लंबे समय से अपने गांव को टटेंगा से अलग करने यानी पंचायत बनाने की मांग कर रहे थे. इसको लेकर चुनाव बहिष्कार भी किया गया. ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि इसी बात से खफा होकर टटेंगा के कुछ रसूखदारों ने पूरे गांव को सबक सिखाने की ठान ली. उसके बाद उन्होंने ऐसा फरमान जारी किया, जिससे सांस लेना भी दूभर हो गया है. कसही के मजदूरों का टटेंगा में काम करना बंद करा दिया गया है. इतना ही नहीं स्कूली बच्चों की कॉपी-किताबों से लेकर पेन तक सब कुछ बंद कर दिया.

पौनी-पसारी व्यवस्था पूरी तरह ठप
वहीं ग्रामीणों का कहना है कि पारंपरिक पौनी-पसारी व्यवस्था पूरी तरह ठप कर दी गई है. टटेंगा के किराना-खाद-बीज व्यापारियों ने फरमान सुनाया है कि वे कसही के किसी भी व्यक्ति को सामान न बेचें. आदेश का उल्लंघन करने वाले को सजा भुगतने की चेतावनी दी गई है. इतना ही नहीं कसही में पढ़ने वाले बच्चे पढ़ाई या टटेंगा के लिए कोचिंग जाते हैं, उनके रास्ते रोके जा रहे हैं. इसके अलावा, उन्हें कॉपी-किताब पेन तक नहीं दी जा रही है.

इन लोगों के खिलाफ की शिकायत
इस अघोषित नाकेबंदी और प्रताड़ना से आजिज आकर कसही के सैंकड़ों ग्रामीण आज बालोद कलेक्ट्रेट पहुंचे. ग्रामीणों ने कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत सौंपते हुए टटेंगा के कुछ व्यक्तियों, गैंदालाल देवांगन, कालीचरण सिन्हा, मूलचंद साहू, गब्बर सेन और गोपी रजक के खिलाफ नामजद शिकायत दर्ज कराई है. वहीं ग्रामीणों ने बताया कि अगर प्रशासन ने समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की तो दोनों गांवों के बीच का यह तनाव कभी भी बड़ी अप्रिय घटना हो सकती है.

टुमन साहू ने लगाए गंभीर आरोप
जनपद सदस्य टुमन साहू ने बताया कि कसही गांव के ग्रामीण गंभीर समस्या को लेकर कलेक्टर और एसपी से मुलाकात करने पहुंचे हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि टटेंगा पंचायत के कुछ प्रभावशाली लोग, गेंदालाल देवांगन, कालीचरण सिन्हा, गोरे सिन्हा, मूलचंद साहू, गब्बर सेन और गोपी रजक गांव में कथित तौर पर सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार का फरमान चला रहे हैं. उन्होंने कहा कि करीब दो साल पहले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के दौरान कसही को टटेंगा पंचायत से अलग करने की मांग को लेकर चुनाव बहिष्कार की स्थिति बनी थी. बाद में चुनाव प्रक्रिया शुरू होने पर कसही के ग्रामीणों ने भी इसमें भाग लिया, लेकिन अब पौनी-पसारी व्यवस्था, मजदूरी, किराना दुकानों से सामान की खरीद और आपसी लेन-देन तक कथित रूप से बंद कराया जा रहा है.

स्कूली बच्चों पर पड़ रहा असर
टुमन साहू का कहना है कि कथित बहिष्कार का असर अब स्कूली बच्चों पर भी पड़ रहा है. कसही आश्रित गांव होने के कारण वहां के बच्चे टटेंगा स्थित स्कूलों में पढ़ने जाते हैं. उन्होंने आरोप लगाया है कि मुनादी कर लोगों को कसही के ग्रामीणों को किराना, कृषि सामग्री, गैस और अन्य सामान नहीं देने तथा बच्चों को स्टेशनरी तक नहीं बेचने के लिए कहा गया है. इससे बच्चे डरे और सहमे हुए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग पेड़ कटाई के मामले में उनका नाम जोड़कर उन्हें निशाना बना रहे हैं, जबकि उन्होंने किसी अधिकारी से शिकायत नहीं की. टुमन साहू ने कहा कि ग्रामीण विवाद नहीं, बल्कि दोनों गांवों के बीच भाईचारा और शांतिपूर्ण माहौल चाहते हैं.

(रिपोर्टः दानवीर साहू, बालोद)

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