बिना खाद-बीज लिए किसानों पर लाखों का कर्ज: छत्तीसगढ़ में अन्नदाताओं के खातों से काटे गए हजारों रुपये, जानिए क्या है धान खरीदी से पहले का यह पूरा खेल
छत्तीसगढ़ के सूरजपुर में किसानों ने ना खाद लिया और ना ही बीज लिया, लेकिन उनके ऊपर लाखों रुपये का फर्जी कर्ज चढ़ा दिया गया और धान बेचते ही बैंक खातों से हजारों रुपये की कटौती कर ली गई.
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी का बिगुल बज चुका है और सरकार किसानों से धान खरीदने की तैयारी में जुटी है, लेकिन सूरजपुर में अन्नदाताओं की मेहनत की कमाई पर डाका डालने का सनसनीखेज मामला सामने आया है. प्रतापपुर विकासखंड के मटिगड़ा समेत 10 गांवों के करीब 1000 से 1500 किसान सहकारी समिति और बैंक के कथित गठजोड़ से परेशान हैं. आरोप है कि समिति प्रबंधक संतोष नाविक ने किसानों की जानकारी और सहमति के बिना उनके खातों में लाखों रुपये का फर्जी कर्ज चढ़ा दिया और धान बेचते ही बैंक खातों से हजारों रुपये की कटौती कर ली गई.
हैरानी की बात यह है कि जिन किसानों ने ना खाद लिया और ना ही बीज तक लिया. उनके नाम पर भी कर्ज दर्ज कर दिया गया. किसानों की शिकायत पर प्रशासनिक जांच हुई और आरोप सही पाए जाने के बाद समिति प्रबंधक निलंबित कर दिया गया, लेकिन सवाल यह है कि किसानों की लूटी गई रकम आखिर कब वापस मिलेगी? इस पूरे खेल में शामिल दूसरे जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी?
किसानों के चेहरे पर फसल की कीमत मिलने की खुशी नहीं
छत्तीसगढ़ के सूरजपुर के दवनकरा सहकारी समिति के अंतर्गत आने वाले 10 गांवों में धान बेचने की तैयारी कर रहे किसानों के माथे पर फसल की कीमत मिलने की खुशी नहीं, बल्कि बैंक से होने वाली कटौती का डर है. ग्रामीणों का आरोप है कि समिति प्रबंधक संतोष नाविक ने वर्षों से किसानों के खातों में उनकी जानकारी के बिना फर्जी कर्ज चढ़ाने का खेल चला रखा था. फर्जीवाड़े की बानगी यह है कि एक किसान ने साल 2025 में समिति से खाद लिया ही नहीं, लेकिन उसके खाते में 39 हजार 790 रुपये का खाद ऋण दर्ज कर दिया गया.
दूसरे किसान पर महज 5 हजार 375 रुपये का कर्ज था, उसने 5 हजार 500 रुपये जमा भी कर दिए. इसके बावजूद धान बेचने पर उसके खाते से 14 हजार 400 रुपये से ज्यादा काट लिए गए. यही नहीं किसी किसान के खाते से 40 हजार, किसी से 45 हजार तो किसी से 49 हजार रुपये तक की कटौती किए जाने के आरोप हैं. किसानों का कहना है कि उन्हें न कर्ज की जानकारी दी गई और न ही कटौती से पहले सहमति ली गई. सवाल यह भी है कि समिति में कथित तौर पर फर्जी ऋण चढ़ाने के बाद बैंक खातों से रकम काटने की प्रक्रिया आखिर किसकी अनुमति से पूरी होती रही? पीड़ित किसानों ने चंदौरा थाने से लेकर तहसील, एसडीएम और कलेक्ट्रेट तक शिकायत की, लेकिन रकम वापस नहीं मिलने से अब किसानों का सब्र जवाब देने लगा है.
कार्रवाई के बाद भी किसानों की सबसे बड़ी मांग अब तक अधूरी
किसानों की शिकायत जब प्रशासन तक पहुंची तो मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर सूरजपुर रेना जमाल ने अपर कलेक्टर के अध्यक्षता में जिला स्तरीय जांच टीम गठित की. टीम ने दवनकरा समिति पहुंचकर किसानों के बयान दर्ज किए और दस्तावेजों की जांच की. जांच में किसानों के खातों में दर्ज कथित फर्जी ऋण और अवैध कटौती की शिकायतें सही पाई गईं. इसके बाद प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई करते हुए समिति प्रबंधक संतोष नाविक को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है. उसकी बर्खास्तगी की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है. वहीं सहकारी बैंक मैनेजर की भूमिका पर उठे सवालों के बाद उसे संबंधित शाखा से हटाकर दूसरी जगह पदस्थ किया गया है और उसकी भूमिका की भी जांच की जा रही है. हालांकि, प्रशासनिक कार्रवाई के बाद भी किसानों की सबसे बड़ी मांग अब तक अधूरी है, उन्हें उनकी काटी गई रकम वापस नहीं मिली है.
अब इस पूरे फर्जीवाड़े का गणित समझिए
दवनकरा समिति के दायरे में 10 गांवों के करीब 1000 से 1500 किसान आते हैं. किसानों के आरोपों के मुताबिक, कई खातों से 14 हजार से लेकर 49 हजार रुपये तक की कटौती हुई है. यानी अगर सैकड़ों किसानों के खातों से हुई इस कथित अवैध वसूली का हिसाब लगाया जाए, तो मामला लाखों से कहीं आगे करोड़ों रुपये तक पहुंचने की आशंका है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि समिति प्रबंधक के स्तर पर कथित फर्जी ऋण दर्ज हुआ और बैंक के जरिए किसानों की धान बिक्री की रकम काटी गई
इसके बाद सवाल उठने लगा है कि क्या यह पूरा खेल बिना आपसी मिलीभगत के संभव था? प्रशासन ने समिति प्रबंधक को निलंबित कर दिया, बैंक मैनेजर को दूसरी शाखा भेज दिया, लेकिन क्या सिर्फ तबादले और निलंबन से किसानों को इंसाफ मिल जाएगा? किसानों को अब तक उनकी मेहनत की कमाई वापस नहीं मिली और पूरे मामले में जिम्मेदार हर व्यक्ति की जवाबदेही भी तय होना बाकी है. अब नई धान खरीदी शुरू होने जा रही है. ऐसे में अन्नदाता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस बार धान बेचने पर उसे उसकी पूरी कीमत मिलेगी या फिर फर्जी कर्ज के नाम पर उसकी कमाई पर एक बार फिर सेंध लगेगी?