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शेयर बाजार में IPO क्यों लाती हैं कंपनियां? लिस्टिंग से कंपनी को कैसे मिलता है पैसा और निवेशकों को कमाई का मौका

किसी भी कंपनी के लिए शेयर बाजार में आईपीओ लाए जाने का एक तय प्रोसेस होता है. लेकिन कंपनियों का काम और कारोबार जब ठीकठाक चल रहा है तो कंपनियों की तरफ से आईपीओ क्यों लाया जाता है? आइए जानते हैं पूरी डिटेल-

Written By Kriyanshu Saraswat
Published: Oct 16, 2026, 02:21 PM IST | Updated: Oct 16, 2026, 02:31 PM IST
Image Credit: AI
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Share Market IPO Process: शेयर बाजार में किसी कंपनी के आईपीओ लिस्टिंग से जुड़ी खबर आती है तो निवेशकों के बीच चर्चा होने लगती है कि लिस्टिंग पर प्रीमियम मिलेगा या नहीं? हर किसी की अपनी-अपनी राय होती है. कोई कहता है कि इसमें पैसा लगाना चाहिए तो किसी की राय इससे जुदा होती है. अगले हफ्ते में भी कई कंपनियों के आईपीओ लिस्ट होने जा रहे हैं. लेकिन क्या कभी आने सोचा है कि आखिर कंपनियों की तरफ से IPO क्यों लाया जाता है? कंपनियों को शेयर बाजार में लिस्टिंग की जरूरत क्यों पड़ती है? आइए जानते हैं आईपीओ से जुड़े सभी सवालों के  जवाब-

आईपीओ (IPO) का पूरा नाम इनीशियल पब्लिक ऑफरिंग है. आसान भाषा में इसे आप यूं कह सकते हैं कि जब कोई कंपनी पहली बार अपने शेयर आम निवेशकों को खरीदने के लिए पेश करती है तो इसे ही IPO कहते हैं. इसके जरिए कंपनी शेयर बाजार में लिस्ट होने की तरफ कदम बढ़ाती है. जब आप किसी कंपनी का शेयर खरीदते हैं तो आप उस कंपनी के एक छोटे से हिस्से के मालिक बन जाते हैं. कंपनी में आपकी हिस्सेदारी कितनी होगी, यह आपके पास मौजूद शेयरों और कंपनी के कुल शेयरों पर डिपेंड करता है.

कंपनी को IPO लाने की जरूरत क्यों होती है?

किसी भी कंपनी को बड़ा कारोबार खड़ा करने के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है. नई फैक्ट्री लगानी हो, कारोबार को दूसरे शहर में फैलाना हो, नई टेक्नोलॉजी खरीदनी हो या पुराने लोन का बोझ कम करना हो, सभी के लिए पूंजी चाहिए. शुरुआत में कंपनियां पैसा अपने मालिक, परिवार, प्राइवेट इन्वेस्टर, बैंकों या दूसरे वित्तीय संस्थानों से जुटाती हैं. लेकिन कारोबार बढ़ने के साथ पैसे की जरूरत बढ़ने लगती है. ऐसे में बैंक से लोन लेना अच्छा विकल्प नहीं होता, क्योंकि इस पर ब्याज का भुगतान करना होता है. ऐसे में IPO कंपनी के लिए बड़ा विकल्प बनकर सामने आता है. कंपनियां अपने शेयर निवेशकों को बेचकर पैसा जुटा सकती हैं. आईपीओ से मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल कारोबार बढ़ाने, नए प्रोजेक्ट शुरू करने, कर्ज चुकाने या दूसरी जरूरतों को पूरा करने में किया जाता है.

IPO से कंपनी को कैसे मिलता है पैसा?

मान लीजिए किसी कंपनी का नाम X है और यह कंपनी मसाले तैयार करती है. लेकिन अभी यह कंपनी केवल एक राज्य तक ही सीमित है. यही कंपनी यदि दूसरे राज्य में अपनी फैक्ट्रियां लगाना चाहती है तो मान लीजिए उसे 1,000 करोड़ की जरूरत है. कंपनी के पास इतना पैसा नहीं है और वह पूरा पैसा बैंक लोन लेकर भी नहीं जुटाना चाहती. ऐसे में वह IPO की तरफ से कदम बढ़ाती है. कंपनी अपने कुछ शेयर आम निवेशकों को खरीदने के लिए पेश करती है. यदि निवेशक इन शेयरों के लिए आवेदन करते हैं और IPO सफल रहता है तो कंपनी को जारी किए गए शेयरों के बदले पैसा मिलता है. हर बार IPO में पेश किये गए सभी शेयर नए नहीं होते. कभी कंपनी नए शेयर जारी करती है तो कभी कंपनी के पुराने निवेशक अपने पास मौजूद शेयर की बिक्री करते हैं.

IPO लाने से कंपनी पर कर्ज बढ़ जाता है?

नहीं, शेयर जारी करके बाजार से पैसा जुटाना कर्ज लेने जैसा नहीं होता. जब कोई कंपनी बैंक से कर्ज लेती है तो उसे पैसा ब्याज के साथ लौटाना होता है. लेकिन शेयर जारी करके जुटाई गई रकम को लोन की तरह वापस नहीं लौटाना होता. हालांकि, इसका यह भी मतलब नहीं है कि शेयर जारी करने का कोई असर नहीं होता. नए शेयर जारी होने से कंपनी के पुराने शेयरहोल्डर्स की हिस्सेदारी का रेश्यो घट सकता है. मान लीजिए X कंपनी में फाउंडर की हिस्सेदारी 100 फीसदी है. कंपनी नए शेयर जारी करके 20 फीसदी हिस्सा निवेशकों को देती है तो फाउंडर की हिस्सेदारी घटकर 80 फीसदी रह जाएगी. आईपीओ के जरिये कंपनी को बिजनेस बढ़ाने के लिए पैसा मिलता है.

IPO लाने से कंपनी को क्या फायदा होता है?

IPO में आम निवेशक ही क्यों करते हैं इन्वेस्ट?

कोई भी कंपनी जब प्राइवेट तरीके से काम करती है तो उसके शेयर आम लोगों के लिए उपलब्ध नहीं होते. IPO के जरिये कंपनी अपने शेयर को पब्लिकली खरीदने के लिए पेश करती है. इससे आम निवेशकों को भी कंपनी में हिस्सेदारी लेने का मौका मिलता है. लेकिन IPO में आवेदन का मतलब यह नहीं होता कि आपको शेयर मिल ही जाएंगे. यदि डिमांड शेयरों से ज्यादा होती है तो शेयरों का आवंटन तय नियमों के अनुसार किया जाता है. कई बार निवेशकों को एक भी शेयर नहीं मिलता. शेयर मिलने के बाद निवेशक चाहें तो उन्हें बाजार में लिस्ट होने के बाद बेच सकते हैं.

IPO में शेयर की कीमत कौन तय करता है?

कंपनी और उसके मर्चेंट बैंकर आईपीओ की कीमत को तय करने के प्रोसे में अहम भूमिका निभाते है. इसके लिए कंपनी के बिजनेस, कमाई, लोन, भविष्य की संभावनाओं, बाजार की स्थिति और दूसरी कंपनियों के मूल्यांकन जैसे पहलुओं को देखा जा सकता है. इसलिए IPO में प्राइस बैंड दिया जाता है. यदि किसी शेयर का प्राइस बैंड 90 से 100 रुपये के बीच है तो निवेशक इस तय दायरे के अंदर आवेदन करते हैं. IPO के दाम का आकलन करते समय यह देखना भी जरूरी है कि कंपनी की कमाई के मुकाबले उसकी वैल्यूएशन कितनी है.

क्या हर कंपनी अपना IPO ला सकती है?

नहीं, किसी भी कंपनी के लिए IPO लेकर आने की बात केवल यह तय करने से नहीं होती कि उसे बाजार से पैसा जुटाना है. उसे लागू कानूनों और सेबी के नियमों को फॉलो करना होता है. कंपनी को IPO से जुड़े डॉक्यूमेंट तैयार करने होते हैं. इनमें उसके बिजनेस, फाइनेंशियल स्थिति, रिस्क, प्रमोटरों, मुकदमों और जुटाई जाने वाली रकम के यूज जैसी जानकारियां दी जाती हैं. निवेशकों को ये सभी विवरण इसलिए मुहैया कराए जाते हैं ताकि वे कंपनी के बारे में अच्छी तरह जानकारी कर लें. IPO लाने से पहले कानूनी, ऑडिट, मर्चेंट बैंकर और अन्य प्रोसेस पर भी खर्च होता है.

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About the Author

क्रियांशु सारस्वत वरिष्ठ बिजनेस जर्नलिस्ट (Business Journalist) हैं, उन्हें डिजिटल और प्रिंट मीडिया में 17 साल का अनुभव है. मौजूदा समय में वह Zee News (Hindi) की डिजिटल टीम में बतौर 'असिस्टेंट न्यूज एडिटर' कार्यरत हैं. क्रियांशु को बिजनेस, पर्सनल फाइनेंस, टैक्सेशन, कमोडिटी और सरकारी योजनाओं आदि से जुड़ी खबरों को आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचाने में महारथ हासिल है. Zee News से पहले क्रियांशु ने टाइम्स इंटरनेट, हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और अमर उजाला की वेबसाइट में अहम संपादकीय जिम्मेदारियां निभाई हैं. इस दौरान क्रियांशु ने ऑटो, टेक्नोलॉजी और लाइफस्‍टाइल लीड की जिम्मेदारी संभाली है. अभी क्रियांशु बिजनेस लीड हैं. यूपी से ताल्‍लुक रखने वाले क्र‍ियांशु पत्रकार‍िता में पोस्ट ग्रेजुएट हैं.
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