भाषा चुनें
  • Hindi
  • English
  • Marathi
  • Bengali
  • Tamil
  • Malayalam
  • Gujarati
  • Telugu
  • Kannada
  • Odisha
  • Z Bharat
  • ZEE PHH
  • ZEE Business
  • WION
राज्य चुनें
  • उत्तर प्रदेश
  • उत्तराखण्ड
  • मध्य प्रदेश
  • छत्‍तीसगढ़
  • हरियाणा
  • दिल्ली
  • बिहार
  • झारखण्ड
  • राजस्‍थान
  • हिमाचल प्रदेश
  • हिन्दीEnglishमराठीবাংলাதமிழ்മലയാളംગુજરાતીతెలుగుಕನ್ನಡଓଡ଼ିଶାZ BharatPHHBusinessWION
  • facebookyoutubetwitterlinkedinwhatsapp
Zee News Hindi
App
Zee News Hindi
  • News
  • वीडियो
  • फोटोज़
  • रील्स
  • लाइव ब्लॉग
  • राज्य चुनें

Add Zee Business As A Preferred Source
App
  • लेटेस्ट न्यूज़
  • देश
  • खेल
  • दुनिया
  • मनोरंजन
  • बिजनेस
  • ओरिजनल
  • टेक
  • धर्म
  • ऑटो
  • एजुकेशन
  • एस्ट्रोलॉजी
  • राशिफल
  • LIVE टीवी
  • लेटेस्ट न्यूज़
  • देश
  • खेल
  • दुनिया
  • मनोरंजन
  • बिजनेस
  • ओरिजनल
  • टेक
  • धर्म
  • ऑटो
  • एजुकेशन
  • एस्ट्रोलॉजी
  • राशिफल
  • ज़ी न्यूज़ हिंदी
  • /बिज़नेस
  • /रॉबर्ट ई हॉल और माइकल वुडफोर्ड की रिसर्च: आखिर किस काम के लिए मिला नोबेल पुरस्कार?

रॉबर्ट ई हॉल और माइकल वुडफोर्ड की रिसर्च: आखिर किस काम के लिए मिला नोबेल पुरस्कार?

रॉबर्ट ई हॉल और माइकल वुडफोर्ड की रिसर्च का मुख्य आधार ये है कि देश की बड़ी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के लिए केवल आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय ये समझना जरूरी है कि आम लोग और कंपनियां कैसे फैसले लेते हैं.

Written ByGaurav Singh
Published: Oct 12, 2026, 10:07 PM IST|Updated: Oct 12, 2026, 10:25 PM IST
joinshare
रॉबर्ट ई हॉल और माइकल वुडफोर्ड की रिसर्च: आखिर किस काम के लिए मिला नोबेल पुरस्कार?

About the Author

    Gaurav Singh

    Gaurav Singh

    जी न्यूज में सीनियर सब-एडिटर हैं और वर्तमान में बिजनेस व फाइनेंशियल न्यूज कवर करते हैं.  देश की राजनीति से लेकर दुनिया के बनते-बिगड़ते सत्ता समीकरणों और घटनाओं को कवर कर चुके हैं  पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो UPTU से इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया है. उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले गौरव ने अपने करियर की शुरुआत डिजिटल मीडिया से की और पिछले 6 वर्षों से लगातार इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. आप गौरव सिंह से Gaurav.Singh@India.Com पर ईमेल के जरिए सीधे जुड़ सकते हैं. 
    Read More

    ट्रेंडिंग

    • न्यूज़
    • फोटो
    • वीडियो
    हरियाणा में धान के गेट पास नहीं कटे तो भड़के किसान, करनाल-कैथल रोड किया जाम

    हरियाणा में धान के गेट पास नहीं कटे तो भड़के किसान, करनाल-कैथल रोड किया जाम

    2

    अतीक अहमद के अवैध साम्राज्य पर फिर चला पुलिस का डंडा; मदनलाल के नाम दर्ज 30 करोड़ की 14 बेनामी संपत्तियां कुर्क

    3

    जान से खिलवाड़? घंटों इंतजार के बाद भी नहीं मिली 108 एंबुलेंस, मालवाहक में ऑक्सीजन सिलेंडर बांधकर मरीज पहुंचे अस्पताल

    4

    'गुस्सा और बेबसी महसूस हुई', शिल्पा राव का शो बीच में रोके जाने पर भड़के पति; बोले-हम नहीं भूलेंगे

    5

    'मौत को छूकर टक से वापस आ गया': UK में तूफान बोएलो का खौफनाक मंजर; प्लेन की ऐसी लैंडिंग देख कांप उठी रूह

    logo
    • contact us
    • privacy policy
    • legal
    • investor info
    • advertise with us
    © 1998-2026 Indiadotcom Digital Private Limited, All Rights Reserved.

    Economics Nobel Prize: क्या आपने सोचा है कि दुनिया के सभी देशों की अर्थव्यवस्था कैसे चलती है? देश में खाने-पीने की चीजें सस्ती-महंगी हो जाती हैं, तो कभी लोगों की नौकरियां छूट जाती है. जिससे घर चलाने में लोगों को कई समस्यायों का सामना करना पड़ता है. इन्हीं बड़ी-बड़ी समस्याओं को हल करने और देश की गाड़ी को पटरी पर लाने के लिए 12 अक्टूबर 2026 को अर्थशास्त्र के क्षेत्र में रॉबर्ट ई हॉल और माइकल वुडफोर्ड को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गई. 

    उन्हें ये सम्मान ऐसे आर्थिक मॉडल विकसित करने के लिए मिला जो सरकारों और केंद्रीय बैंकों को ये समझने में मदद करते हैं कि महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक मंदी जैसी समस्याओं से कैसे निपटा जाए. 

    उनकी रिसर्च का मुख्य विचार काफी व्यावहारिक है. अगर हमें पूरे देश की अर्थव्यवस्था को समझना है तो हमें यह भी समझना होगा कि आम लोग और कारोबार करने वाले लोग क्या सोचते हैं और कैसे फैसले लेते हैं.

    पहले के दौर में अर्थशास्त्रियों का ये मानना था कि देश की पूरी अर्थव्यवस्था (जैसे महंगाई, बेरोजगारी और प्रोडक्शन) को ठीक करने के लिए केवल बड़े-बड़े आंकड़ों को देखकर फैसले ले लेने चाहिए. लेकिन, 1970 के दशक में ये तरीका फेल होने लगा क्योंकि आंकड़े उस तरह से काम नहीं कर रहे थे जैसा सोचा गया था. अब इसे आसान भाषा में समझते हैं. इसे इस तरह समझा जा सकता है कि पारंपरिक अर्थशास्त्रियों के रुख और हॉल-वुडफोर्ड के शोध में क्या अंतर है.

    दरअसल, पहले अर्थव्यवस्था को समझने के लिए अर्थशास्त्री अक्सर बड़े-बड़े आंकड़ों को देखते थे. जैसे देश में कितनी महंगाई है, कितना उत्पादन हो रहा है, कितने लोग नौकरी कर रहे हैं और लोग कुल कितना खर्च कर रहे हैं. ये आंकड़े जरूरी हैं लेकिन एक सवाल फिर भी बचता है कि लोग ऐसा कर क्यों रहे हैं?

    उदाहरण के लिए, अगर बाजार में सामान बिकना कम हो गया, तो इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. लोगों की नौकरियां जाने का डर हो सकता है. परिवार भविष्य के लिए पैसे बचाना चाहते होंगे. लोगों को लगता होगा कि आगे महंगाई बढ़ने वाली है. कारोबारियों को डर हो सकता है कि आने वाले दिनों में ग्राहक कम हो जाएंगे. 

    रॉबर्ट हॉल और माइकल वुडफोर्ड के काम ने अर्थशास्त्रियों को इस तरह के सवालों पर ज्यादा ध्यान देने में मदद की. उन्होंने अर्थव्यवस्था के बड़े आंकड़ों को समझने के लिए लोगों और कंपनियों के छोटे-छोटे फैसलों को आधार बनाया. अर्थशास्त्र की भाषा में इसे माइक्रो इकॉनॉमिक फाउंडेशन ऑफ मैक्रो इकॉनॉमिक स्टेबिलाइजेशन कहा जाता है. इसका आसान मतलब है कि देश की बड़ी अर्थव्यवस्था को समझने के लिए यह समझना जरूरी है कि आम लोग और कंपनियां कैसे फैसले लेते हैं.

    महंगाई को रोकने में ये रिसर्च कैसे काम आती है?

    अब सबसे जरूरी सवाल पर आते हैं कि महंगाई को रोकने में यह रिसर्च कैसे काम आती है? मान लीजिए कि पहले एक लीटर दूध 50 रुपये का मिलता था लेकिन कुछ समय बाद उसकी कीमत 60 रुपये हो गई. अब परिवार को उसी दूध के लिए 10 रुपये ज्यादा देने पड़ेंगे. जब बहुत-सी चीजों की कीमतें लगातार बढ़ती हैं तो इसे महंगाई कहते हैं. 

    महंगाई बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं. सामान बनाने की लागत बढ़ सकती है, तेल महंगा हो सकता है या बाजार में मांग और सप्लाई के बीच अंतर हो सकता है. ऐसे में केंद्रीय बैंक, जैसे भारत में भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरों में बदलाव कर सकता है. ब्याज दर का मतलब यहां उस दर से है जिस पर कर्ज लेना या उससे जुड़ी आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं.

    अगर ब्याज दर बढ़ती है तो घर, गाड़ी या कारोबार के लिए कर्ज लेना महंगा हो सकता है. इससे कुछ लोग और कंपनियां खर्च या निवेश कम कर सकते हैं. इससे मांग पर दबाव पड़ सकता है और महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. अगर कंपनियां कम निवेश करती हैं तो कारोबार और नई नौकरियों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है. 

    इसलिए केंद्रीय बैंक के सामने मुश्किल सवाल होता है कि महंगाई भी काबू में रखनी है और अर्थव्यवस्था को जरूरत से ज्यादा धीमा भी नहीं करना है. हॉल और वुडफोर्ड की रिसर्च ऐसे फैसलों को समझने के लिए बेहतर आर्थिक मॉडल बनाने में मदद करती है.

    वुडफोर्ड के शोध में ये बात खास महत्व रखती है कि केंद्रीय बैंक क्या करता है. इसके साथ-साथ लोग उसके फैसलों और भविष्य की योजनाओं को कैसे समझते हैं. केंद्रीय बैंक की साफ और भरोसेमंद जानकारी देना भी इसलिए महत्वपूर्ण हो सकता है.

    आखिर इस रिसर्च को नोबेल पुरस्कार क्यों मिला?

    हॉल और वुडफोर्ड का योगदान यह समझने में है कि देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के लिए सिर्फ बड़े आंकड़ों को देखना काफी नहीं है. यह भी समझना जरूरी है कि लोग और कंपनियां उन परिस्थितियों में कैसे फैसले लेते हैं और सरकारी नीतियों पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं.

    जब अर्थशास्त्री इन बातों को अपने मॉडल में शामिल करते हैं तो वे यह बेहतर ढंग से समझने की कोशिश कर सकते हैं कि महंगाई बढ़ने पर क्या करना चाहिए, मंदी आने पर किस तरह मदद करनी चाहिए और आर्थिक नीतियों का सही समय क्या हो सकता है. 

    उनके काम को अर्थव्यवस्था में तेजी और गिरावट के बड़े उतार-चढ़ाव को कम करने में मदद करने वाले आर्थिक मॉडल विकसित करने के लिए सम्मानित किया गया.

    Add Zee News as a Preferred Source
    TAGS:
    nobel prize