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India Free Trade deal: एक तरफ अमेरिका की ओर से भारत पर टैरिफ का दबाव बढ़ रहा है. हाल ही में रूसी तेल की खरीद को लेकर अमेरिका ने नया बिल तैयार किया है, जिसमें राष्ट्रपति को अधिकार मिल जाएगा, जिससे वो भारत, चीन समेत रूस से कच्चा तेल और गैस इम्पोर्ट करने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगा सकते हैं. ये पहली बार नहीं है, दूसरी बार अमेरिका में राष्ट्रपति की गद्दी पर बैठने के बाद से ही डोनाल्ड ट्रंप टैरिफ का हंटर चला रहे हैं. फरवरी 2025 के बाद से अमेरिका के टैरिफ की तलवार लटकी हुई है. कभी 26%,कभी 50% और अब 100%. ना तो अमेरिका के साथ ट्रेड डील साइन हो पा रहा है और ना ही टैरिफ का ये भूत शांत हो रहा है.

ऐसे में भारत ने अमेरिकी बाजार का विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है. भारत एक के बाद एक फ्री ट्रेड डील साइन कर रहा है. बीते 4 सालों में भारत ने 9 देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट साइन किया है, जो करीब 40 देशों को कवर करता है. नया FTA (Free Trade Aggrement) न्यूजीलैंड के साथ किया गया है.
भारत और न्यूजीलैंड के बीच ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) साइन हो गया है. 20 अक्टूबर 2026 से इसे पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा, यानी भारतीय निर्यातकों के लिए न्यूजीलैंड का बाजार शून्य सीमा शुल्क के साथ पूरी तरह से खुद जाएगा. दोनों देशों के बीच व्यापार जो फिलहाल 2.3 अरब डॉलर का है, उसे बढ़ाकर साल 2030 तक दोगुना करने का है. टैरिफ फ्री आयात-निर्यात के अलावा न्यूजीलैंड भारत में करीब 20 अरब डॉलर का भारी विदेशी निवेश करेगा.

इसके अलावा भारत ने श्रीलंका, थाईलैंड, साउथ कोरिया, मलेशिया, जापान जैसे देशों के साथ भी लंबे वक्त से फ्री ट्रेड साइन किया है. फ्री ट्रेड के जरिए भारत भारत सिर्फ अपने एक्सपोर्ट नहीं बढ़ा रहा, बल्कि बाजार विस्तार कर अमेरिका पर निर्भरता को कम कर रहा है. साल 2025 के बाद से भारत 5 बड़े FTA साइन कर चुका है. जिसमें EU के साथ 'मदर ऑफ ऑल डील'जैसा समझौता भी शामिल है. जिस एक डील में 27 देशों के साथ खुला व्यापार शामिल है.
ट्रंप की वापसी के बाद अमेरिका की ओर से टैरिफ का दबाव बना हुआ है. अमेरिकी बाजार भारतीय निर्यातकों के लिए महंगा और मुश्किल हो रहा है. अमेरिका के साथ व्यापार को लेकर बढ़ते तनाव के बीच भारत दूसरे नए बाजार की तलाश कर रहा है, ताकि अमेरिकी बाजार पर निर्भरता को कम किया जा सके. ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ जैसे देशों के साथ FTA भारतीय निर्यातकों को बड़ा मार्केट उपलब्ध करवाएगी. इन देशों में भारतीय प्रोडक्ट्स की एंट्री मुफ्त और आसान होगी. ऐसे में अगर ट्रंप टैरिफ का दांव खेलते हैं, तो भारत अमेरिका को निर्यात रोक उसके बाजार से दूरी बना सकता है.
अमेरिका ने बिल पास कर रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी टैरिफ का प्रस्ताव रखा है. भारत के कुल तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी 51 फीसदी की है. अमेरिका के टैरिफ दबाव में इससे दूर होना इतना आसान नहीं है. रूस से तेल खरीद रोकने का मतलब ऊर्जा संकट का सामना करना है. होर्मुज तनाव के बीच रूस से तेल की सप्लाई जारी रही है कॉमर्स एंड इंडस्ट्री मिनिस्ट्री के डेटा के मुताबिक जुलाई 2026 में भारत ने रूस से 110.4 लाख टन कच्चा तेल आयात किया. अमेरिका के टैरिफ दबाव में भारत इस तेल को अचानक रोक नहीं सकता. ऐसे में बेहतर है कि अमेरिकी बाजार का विकल्प तलाशा जाए. भारत जिस तरह से धड़ाधड़ FTA साइन कर रहा है , ये इसी बात का इशारा है.
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. साल 2025 में अमेरिका ने भारत से 92 अरब डॉलर का सामान इम्पोर्ट किया.दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर लगभग 140.76 अरब डॉलर पर पहुंच गया. अगर दोनों देशों के बीच ट्रेड डील हो जाती है, तो ये आंकड़ा 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है, लेकिन ट्रंप टैरिफ का मोह पकड़कर बैठे हैं. ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि वो दूसरे बाजारों का विकल्प तलाशे. जैसे -जैसे भारत का फ्री ट्रेड बढ़ रहा है, उन देशों के लिए भारत का निर्यात भी बढ़ रहा है, हालांकि अमेरिका को भेजे जाने वाले निर्यात में भी कोई कमी नहीं आई है.

फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (Free Trade Agreement) में दो देशों के बीच सामान का आयात और निर्यात बिना सीमा शुल्क, बिना ड्यूटी, बिना टैक्स या कम टैरिफ पर होता है. दो देशों के बीच ट्रेड को आसान और सरल बनाने के लिए FTA किए जाता है, जिसमें आयात-निर्यात के तहत उत्पादों पर सीमा शुल्क के अलावा नियामक कानून, सब्सिडी और कोटा भी आसान किए जाते हैं. फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से भारत को दूसरे देशों का खुला बाजार मिलता हैं, जहां भारतीय निर्यातक आसानी से ट्रेड कर पाता है . फ्री ट्रेड डील से मैन्युफैक्चरिंग, प्रोडक्शन, एक्सपोर्ट को बढ़ावा मिलता है और इकोनॉमी को बूस्ट.
फ्री ट्रेड से दो देशों के बीच ट्रेड आसान होता है, विदेशी बाजारों में बिना किसी ड्यूटी के सामान बेचने का मौका मिलता है, जिससे निर्यात के बाजार बढ़ते हैं. एफडीए किसी देश में विदेशी निवेश को आकर्षित करते हैं, जिसका असर घरेलू उत्पादन पर पड़ता है. जरूरी कच्चा माल, मध्यवर्ती उत्पाद और पूंजीगत सामान आसानी से मिलते हैं.