आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) के करीब 61 प्रतिशत शेयर कनाडा की कंपनी को बेचने की मंजूरी दिये जाने के बाद सरकार इसी तरह की एक और बड़ी तैयारी कर रही है. सरकार चार और पीएसयू बैंकों में हिस्सेदारी कम करने का प्लान कर रही है. जिन बैंकों में हिस्सेदारी कम करने की प्लानिंग पर काम चल रहा है, उनमें सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, यूको बैंक, पंजाब एंड सिंध बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंक का नाम बताया जा रहा है. ऐसा सरकार की तरफ से सेबी के मिनिमम पब्लिक शेयरहोल्डिंग नियम के तहत किये जाने का प्लान है. लेकिन सरकार ऐसा क्यों कर रही है, इससे क्या बदल जाएगा? ऐसे तमाम सवाल हैं जिनका जवाब आपको जानना जरूरी है.
इन चारों ही बैंकों में सरकार ने अपनी हिस्सेदारी को घटाकर 75 फीसदी करने का प्रोसेस शुरू कर दिया है. अगले एक साल के दौरान ऑफर फॉर सेल (OFS) के तहत सरकार अपनी हिस्सेदारी को शेयर बाजार में बेचने का प्लान कर रही है. ईटी में प्रकाशित खबर के अनुसार सरकार पब्लिक सेक्टर बैंकों के इंटीग्रेशन पर भी काम कर रही है. इसके तहत दो और सरकारी बैंकों का प्राइवेटाइजेशन किया जा सकता है. यह प्राइवेटाइजेशन उसी तरह से हो सकता है, जिस तरह आईडीबीआई बैंक को लेकर कदम उठाया गया है. लेकिन इससे पहले इन बैंकों में हिस्सेदारी को घटाकर 75 फीसदी पर लाया जाएगा. यानी प्राइवेटाइजेशन के कदम पर आगे बढ़ने में अभी समय लगेगा.
इन चारों बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी काफी है और इनमें हिस्सेदारी को घटाकर 75 फीसदी पर लाने के लिए बड़ी मात्रा में शेयर की बिक्री करनी होगी.

अभी तक सरकार ने बैंकों को सेबी के 25 फीसदी पब्लिक शेयरहोल्डिंग नियम से छूट दे रखी थी. लेकिन इस समयसीमा के निकलने के बाद सरकार की तरफ से अगला नोटिफिकेशन जारी किये जाने की उम्मीद की जा रही है. ऐसे में सरकार इन बैंकों में पब्लिक शेयर बढ़ाने के लिए एक्टिव हो गई है. पब्लिक फ्लोट बढ़ने से बैंकों की वैल्यूएशन में भी सुधार होने की उम्मीद है.
सरकार का प्लान आने वाले समय में देश के अंदर 3 से 4 बड़े सरकारी बैंकों को ही रखना है. सरकार देश के बैंकों को दुनिया के टॉप 10 बैंकों में शामिल करना चाहती है. अभी देश का एक भी बैंक टॉप 10 में शामिल नहीं है. इसी को ध्यान में रखते हुए पिछले दिनो एचडीएफसी बैंक और एचडीएफसी लिमिटेड का मर्जर किया गया था. अपने इस कदम में कामयाबी के लिए सरकार मर्जर और कंसोलिडेशन पर भी काम कर रही है. इस प्रोसेस के दौरान निजीकरण के लिए दो और बैंकों की पहचान किये जाने की उम्मीद है. आईडीबीआई बैंक से जुड़ी डील सामने आने के बाद सरकार बैंकिंग सेक्टर में बड़े बदलाव की तैयारी में जुट गई है.
दुनिया के शीर्ष 10 बैंकों में चीन के पांच बैंक शामिल हैं. पहले नंबर से लेकर चौथे नंबर तक लिस्ट में चीन के बैंकों का कब्जा है.
नीति आयोग तरफ की तरफ से पहले भी प्राइवेटाइजेशन के लिए सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक को शॉर्टलिस्ट किया गया था. अभी ऊपर बताए गए चारों बैंकों में हिस्सेदारी बेचने का फैसला सीधे तौर पर प्राइवेटाइजेशन का नहीं है. यह भी शुरुआती तौर पर सेबी के नियमों को पूरा करने की कोशिश है. यदि आने वाले समय में बैंकों के प्राइवेटाइजेशन पर आगे बढ़ा जाता है तो मौजूदा कानून में बदलाव करने की जरूरत होगी. बैंकों का प्राइवेटाइजेशन करने के लिए बैंकिंग अधिनियम में बदलाव करना होगा. बैंकों को 25% मिनिमम पब्लिक शेयरहोल्डिंग के नियम से पहले ही छूट मिली हुई थी, इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है.
आईडीबीआई बैंक की डील के बाद बैंकों के प्राइवेटाइजेशन को लेकर चर्चा तेज हो गई है. कनाडाई बिलेनियम प्रेम वत्स ने आईडीबीआई में 60.72 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने का करार किया है. यह डील करीब 52878 करोड़ रुपये की है. सरकार बैंकों में अपनी हिस्सेदारी कम करके प्राइवेट बैंकों को बढ़ावा देने के लिए लगातार इस तरह के कदम उठा रही है.
चारों सरकारी बैंकों में यदि सरकार अपनी हिस्सेदारी घटाकर पब्लिक शेयरहोल्डिंग को बढ़ावा देती है, तो निवेशकों को संबंधित शेयरों में ज्यादा लिक्विडिटी और टांसपेरेंसी देखने को मिलेगी. इस कदम से बैंकिंग सिस्टम में कॉम्पिटीशन बढ़ेगा और सर्विस में भी सुधार आएगा. सरकार के कदम से आने वाले महीनों में बैंकिंग सेक्टर में हलचल देखने को मिल सकती है.