App

एस्सार ग्रुप का 'ग्रेट अमेरिकन कमबैक': भारत में हुई थी कंगाल, अब अमेरिका में लगाएगी ₹1.5 लाख करोड़ का सबसे बड़ा स्टील प्लांट

रुइया परिवार अब स्टील के साथ एनर्जी, टेक्नोलॉजी और क्लीन-मोबिलिटी जैसे क्षेत्रों पर फोकस करते हुए नए सिरे से अपना बिजनेस साम्राज्य खड़ा कर रहा है.

एस्सार ग्रुप का 'ग्रेट अमेरिकन कमबैक': भारत में हुई थी कंगाल, अब अमेरिका में लगाएगी ₹1.5 लाख करोड़ का सबसे बड़ा स्टील प्लांट

Essar Steel Comeback Story : लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती... सोहनलाल द्विवेदी की ये पंक्तियां इस वक्त Essar ग्रुप पर सटीक बैठ रही हैं. एक समय भारत के सबसे बड़े निजी कारोबारी समूहों में गिने जाने वाले रुइया परिवार ने साल 2019 में एस्सार स्टील का नियंत्रण खो दिया था. लेकिन, सात साल बाद कहानी ने ऐसा मोड़ लिया है, जिसकी कल्पना शायद उस समय मुश्किल थी. 

28 सितंबर 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आयोवा में 15 बिलियन डॉलर (करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये) की लागत से स्टील कॉम्प्लेक्स बनाने की बात कही है. इसे 'मेसाबी मैटेलिक्स' बनाएगी. इसके साथ मिनेसोटा में चल रहे आयरन-ओर के प्रोजेक्ट को जोड़ें तो कुल निवेश लगभग $18 अरब का है. Essar ग्रुप के मुताबिक, इस प्लांट से पहले फेस के तहत सालाना 75 लाख टन स्टील का प्रोडक्शन शुरू होने की उम्मीद है और इसकी क्षमता बढ़कर 1 करोड़ टन सालाना तक पहुंचने की भी उम्मीद है. इसके प्रोडक्शन शुरू करने का टारगेट 2030 रखा गया है. इसको दुनिया भर में Essar स्टील की वापसी के तौर पर देखा जा रहा है. लेकिन, असल कहानी इससे कहीं लंबी है.

ये कहानी है एक ऐसे कारोबारी परिवार की, जिसने 1969 में चेन्नई से शुरुआत की. इंफ्रास्ट्रक्टर से शिपिंग, स्टील, आयल, पावर और टेलीकॉम तक पहुंचा. फिर भारी एक्सपेंशन और कर्ज के दौर में संकट में फंसा. एक दौर ऐसा आया जब भारत में अपना सबसे बड़ा स्टील एसेट खो दिया और उसी दौरान अमेरिका में शुरू की गई एक असफल परियोजना को पूरी तरह छोड़ने के बजाय धीरे-धीरे दोबारा खड़ा किया और अब उसी अमेरिकी एसेट के आधार पर Iowa में एक नया स्टील एम्पायर बनाने का दावा किया जा रहा है.

1969: चेन्नई के एक छोटे से कॉन्ट्रैक्ट से शुरुआत

इस कहानी की शुरुआत आज से करीब 57 साल पहले होती है. 1969 में शशि रुइया और रवि रुइया ने Essar की नींव रखी. कंपनी का शुरुआती कारोबार आज से बिल्कुल अलग था. पहला बड़ा काम था चेन्नई पोर्ट पर आउटर ब्रेकवाटर का कंस्ट्रक्शन, जिसकी कीमत करीब ₹2.5 करोड़ थी. Essar के इतिहास के मुताबिक, ये उस समय किसी भारतीय कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, क्योंकि इतने बड़े और मरीन कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स में विदेशी कंपनियों का दबदबा था. यहीं से रुइया परिवार ने एक ऐसा बिजनेस मॉडल बनाना शुरू किया जिसमें इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के साथ-साथ धीरे-धीरे नए इंडस्ट्रियल सेक्टर्स में एंट्री की गई.

1976 में Essar ने शिपिंग बिजनेस में कदम रखा और अपना टैंकर खरीदा. इसके बाद इंफ्रास्ट्रक्चर और इंजीनियरिंग से आगे बढ़कर ग्रुप ने स्टील, ऑयल, पावर, पोर्ट्स, टेलीकॉम और दूसरे क्षेत्रों में विस्तार किया यानी Essar का DNA शुरू से ही सिर्फ एक प्रोडक्ट या एक इंडस्ट्री पर निर्भर रहने का नहीं था. वो एक डाइवर्सिफाइड इंडस्ट्रियल ग्रुप बनना चाहता था.

1980 और 1990 का दौर: इंफ्रास्ट्रक्चर से स्टील और एनर्जी तक का सफर

भारत की अर्थव्यवस्था में बदलाव के साथ Essar ने भी अपना विस्तार तेज किया. 1980s में ग्रुप ने एनर्जी और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट्स में कदम बढ़ाया. 1990s में स्टील और टेलीकम्यूनिकेशन में विस्तार हुआ. बाद में आयल रिफाइनिंग, पावर जनरेशन, पोर्ट्स और माइनिंग जैसे क्षेत्रों में भी बड़े इन्वेस्टमेंट हुए. स्टील में गुजरात के हजीरा में बड़ा प्लांट इस ट्रांसफॉर्मेशन का महत्वपूर्ण हिस्सा था.

टेलीकॉम सेक्टर में Essar ने Hutchison Essar के जरिए तेजी से बढ़ते भारतीय मोबाइल मार्केट में जगह बनाई, बाद में वोडाफोन के साथ पार्टनरशिप बनी और वोडाफोन-Essar देश की बड़ी टेलीकॉम ऑपरेशन में शामिल हुआ यानी 1990s और 2000 तक आते-आते Essar सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर कांट्रेक्टर नहीं रहा था. वो एक बड़े स्केल का इंडस्ट्रियल कांग्लोमरेट बन चुका था.

वोडाफोन से $5.46 अरब और फिर बड़े एक्सपेंशन का दौर

Essar की टेलीकॉम स्टोरी इस बात का उदाहरण है कि ग्रुप किस तरह किसी बिजनेस को बनाने के बाद में मोनेटाइज करता था. 2011 में Essar ने वोडाफोन-Essar में अपनी 33% हिस्सेदारी मोनेटाइज की और करीब $5.46 अरब हासिल किए. Essar के मुताबिक, उस समय वोडाफोन-Essar के सब्सक्राइबर्स 135 मिलियन से अधिक थे. लेकिन, ये पैसा सिर्फ बैलेंस शीट को मजबूत करने के लिए नहीं था. Essar ग्रुप ने स्टील, आयल एंड गैस, पावर और पोर्ट्स जैसे कोर सेक्टर में बड़े कैपिटल एक्सपेंडिचर प्रोग्राम को आगे बढ़ाया था. यहीं से कहानी का दूसरा पक्ष सामने आता है. विस्तार जितना बड़ा होता गया, कैपिटल की जरुरत और कर्ज का दबाव भी उतना बढ़ता गया.

Essar ने अगले वर्षों में कई बड़े इंडस्ट्रियल एसेट्स खड़े करने की कोशिश की. इनमें से कुछ प्रोजेक्ट्स सफल हुए, कुछ बाद में बेचे गए और कुछ फाइनेंशियल और मार्केट कंडीशन के कारण मुश्किलों में चले गए.

2017 में एस्सार ने अपने सबसे बड़े लेन-देन में से एक पूरा किया. एस्सार ऑयल में लगभग 98.26% हिस्सेदारी रोसनेफ्ट और ट्रैफिगुरा-यूसीपी समूह को करीब 12.9 अरब डॉलर में बेची गई. इस सौदे में गुजरात की वाडीनार रिफाइनरी, बंदरगाह से जुड़ा बुनियादी ढांचा, बिजली संयंत्र और हजारों फ्यूल स्टेशनों का नेटवर्क शामिल था. इस रिफाइनरी की क्षमता करीब 2 करोड़ टन प्रति वर्ष बताई गई थी. ये लेन-देन उस समय भारत के एनर्जी सेक्टर में हुए सबसे बड़े विदेशी निवेश लेन-देन में से एक था. लेकिन, इसी दौर में एस्सार स्टील की वित्तीय स्थिति एक अलग दिशा में जा रही थी और यहीं से रुइया परिवार के स्टील बिजनेस का सबसे कठिन अध्याय शुरू हुआ.

कर्ज का दबाव बढ़ गया

स्टील कारोबार में एस्सार ने बहुत बड़ा निवेश किया था. एस्सार स्टील भी वित्तीय दबाव से बाहर नहीं रह सकी. 2017 में एस्सार स्टील इंडिया दिवालियापन की कार्यवाही में चली गई. इसके बाद कंपनी के लिए एक लंबी समाधान प्रक्रिया शुरू हुई. दिलचस्प बात ये है कि  2019 में दिवालियापन प्रक्रिया के तहत रुइया परिवार ने Essar स्टील को खो दिया. उस वक्त आर्सेलर मित्तल और निप्पॉन स्टील इंडिया ने कंपनी को 42,000 करोड़ रुपये में अधिग्रहण कर लिया और इसे आर्सेलर-मित्तल निप्पॉन स्टील इंडिया का हिस्सा बना दिया.

Essar Group

अमेरिका में एस्सार की एंट्री कब हुई?

अमेरिकी स्टील कारोबार में रुइया परिवार की एंट्री की कहानी भारत में शुरू हुए एस्सार के दिवालिया संकट से पहले की है. एस्सार ने 2007 में मिनेसोटा स्टील इंडस्ट्रीज का अधिग्रहण किया था. इसमें आयरन ओर की खदान, पेलेट प्लांट और स्टील प्रोडक्शन प्लांट शामिल थे. प्रोजेक्ट पर निर्माण कार्य 2008 में शुरू हुआ.

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआती योजना के तहत हर साल 41 लाख टन पेलेट उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था और प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब 1.8 अरब डॉलर थी. बाद में एस्सार ने प्रस्तावित क्षमता बढ़ाकर 70 लाख टन कर दी. इससे प्रोजेक्ट की लागत बढ़कर करीब 2.2 अरब डॉलर हो गई थी. इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए करीब 26 करोड़ डॉलर की अतिरिक्त फंडिंग की जरूरत थी.

इसी दौरान बाजार की परिस्थितियां भी प्रतिकूल होती चली गईं. आयरन ओर की कीमतों में गिरावट आई. चीन से आने वाले सस्ते स्टील आयात ने अमेरिकी बाजार पर दबाव बढ़ाया और पेलेट की डिमांड कमजोर पड़ गई. एस्सार को मिनेसोटा सरकार से समर्थन मिला था. लेकिन, समय के साथ प्रोजेक्ट और राज्य सरकार के बीच मतभेद बढ़ गए. विवाद कंपनी की खनिज लीज तक पहुंच गया. परियोजना तय समयसीमा पर आगे नहीं बढ़ पाई तो मिनेसोटा के तत्कालीन गवर्नर मार्क डेटन ने कंपनी की लीज समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की. इसके खिलाफ एस्सार ने फैसले को चुनौती दी थी.

Essar मुश्किल में कैसे फंसा?

Essar ने स्टील, तेल रिफाइनिंग, बिजली, टेलीकॉम, बंदरगाह, शिपिंग और BPO जैसे क्षेत्रों में आक्रामक तरीके से विस्तार किया था. 2017 तक समूह पर करीब 1.38 लाख करोड़ रुपये का कर्ज हो गया था. स्टील और पावर कारोबार में समस्याएं खास तौर पर गंभीर थीं. 

Essar ग्रुप के चार बड़े दांव

एनर्जी अभी भी ग्रुप का सबसे बड़ा ऑपरेटिंग पिलर है. इसकी प्रमुख संपत्ति ब्रिटेन के लिवरपूल के पास स्थित स्टैनलो रिफाइनरी है. इसे Essar ने 2011 में अधिग्रहण किया था. अब इस रिफाइनरी को एनर्जी-ट्रांजिशन हब के रूप में नए सिरे से विकसित किया जा रहा है. इसके लिए 2035 तक 4.3 अरब पाउंड के निवेश कार्यक्रम की योजना है. इसमें हाइड्रोजन, घरों और कारखानों के लिए लो-कार्बन हीटिंग, कार्बन कैप्चर, इलेक्ट्रिफिकेशन और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल शामिल हैं. 

ब्रिटेन में रिटेल नेटवर्क बढ़ा रहा है Essar ग्रुप 

Essar ग्रुप अपने डाउनस्ट्रीम कारोबार का भी विस्तार कर रहा है और रिफाइनरी कारोबार के साथ-साथ ब्रिटेन में अपना रिटेल नेटवर्क बढ़ा रहा है. एनर्जी सेक्टर  में कंपनी गुजरात में 1200 MW का कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट भी संचालित करती है. इसे 1,600 MW और बढ़ाने की योजना है. हाल ही में जारी एक कॉरपोरेट प्रेजेंटेशन में कंपनी ने थर्मल, रिन्यूएबल और गैस आधारित बिजली को मिलाकर 5 GW का इकोसिस्टम बनाने की योजना बताई है. 

इंफ्रास्ट्रक्चर अब Essar के विस्तार के दौर की तुलना में छोटा कारोबार है. Essar पावर इस समय भारत में लगभग 1.2 GW की कैपिसिटी ऑपरेट करती है और थर्मल, गैस और रिन्यूएबल बिजली उत्पादन को मिलाकर 5 GW का पोर्टफोलियो बनाने का लक्ष्य रखे हुए है. 

टेक्नोलॉजी कारोबार ग्रुप की लिस्टेड टेक्नोलॉजी कंपनी ब्लैक बॉक्स के जरिए संचालित होता है. ये कारोबार डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, नेटवर्किंग, साइबर सिक्योरिटी और डेटा-सेंटर सॉल्यूशंस के क्षेत्र में काम करता है. Essar ग्रुप, ब्लू एनर्जी मोटर्स, ग्रीनलाइन मोबिलिटी और अल्ट्रा गैस एंड एनर्जी के जरिए एक क्लीन-मोबिलिटी इकोसिस्टम भी तैयार कर रहा है. ब्लू एनर्जी LNG और इलेक्ट्रिक ट्रक बनाती है, जबकि ग्रीनलाइन भारत में बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों के लिए 1,000 से अधिक ग्रीन-एनर्जी ट्रक संचालित करती है. Essar ने 10,000 ट्रकों और 100 अल्टरनेटिव-फ्यूल और चार्जिंग हब का लक्ष्य तय किया है. 

अल्ट्रा गैस के जरिए Essar एक अल्टरनेटिव-फ्यूल डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम भी तैयार कर रहा है. इसमें LNG फिलिंग स्टेशन, संस्थागत ग्राहकों को LNG की आपूर्ति और भविष्य में इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग, बैटरी स्वैपिंग और हाइड्रोजन फ्यूल तक विस्तार शामिल है. ये यूनिट Essar के क्लीन-मोबिलिटी इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि समूह के पास ट्रक निर्माण और फ्लीट मैनेजमेंट से जुड़ा कारोबार भी है.

कंपनी में कौन-कौन क्या संभाल रहा है?

को-फाउंडर शशि रुइया के निधन के बाद समूह को उनके भाई रवि चला रहे हैं. शशि के बेटे प्रशांत Essar के ग्लोबल पोर्टफोलियो के मैनेजमेंट में एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं. वो Essar कैपिटल का प्रबंधन करते हैं. ये भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में समूह की संपत्तियों में निवेश का अलॉटमेंट करता है. 

उनके दूसरे बेटे अंशुमान Essar के BPO और पावर कारोबार को देखते हैं. रवि रुइया के बच्चे रेवंत रुइया और स्मिति कनोडिया भी कारोबार से जुड़े हुए हैं. रेवंत रुइया Essar के खनन और मेटल कारोबार की रणनीति और विस्तार पर काम करते हैं. वहीं, स्मिति कनोडिया, एस्सार में कॉरपोरेट कम्युनिकेशन, HR और CSR से जुड़े कामों में सक्रिय हैं. वो एस्सार फाउंडेशन के माध्यम से समूह के CSR में भी शामिल हैं.

स्टील कारोबार में वापसी!

Essar उस स्टील कारोबार में वापस लौट रहा है, जिसने कभी ग्रुप को लगभग बर्बाद कर दिया था. लेकिन, इस बार रुइया परिवार ऐसे एसेट्स और भौगोलिक क्षेत्रों के इर्द-गिर्द कारोबार खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, जहां उन्हें स्ट्रेटेजिक फायदे दिखाई देते हैं. साथ ही पोर्टफोलियो को एनर्जी ट्रांजिशन, मेटल्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी के आस-पास केंद्रित रखा जा रहा है. 18 अरब डॉलर की अमेरिकी परियोजना सिर्फ एक और विस्तार की घोषणा नहीं है. ये इस बात का टेस्ट भी है कि क्या Essar अपने कर्ज संकट के बाद मजबूत हुई बैलेंस शीट को एक नए प्लेटफॉर्म में बदल सकता है.

Add Zee News as a Preferred Source

About the Author

Gaurav Singh

Gaurav Singh

जी न्यूज में सीनियर सब-एडिटर हैं और वर्तमान में बिजनेस व फाइनेंशियल न्यूज कवर करते हैं.  देश की राजनीति से लेकर दुनिया के बनते-बिगड़ते सत्ता समीकरणों और घटनाओं को कवर कर चुके हैं  पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो UPTU से इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया है. उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले गौरव ने अपने करियर की शुरुआत डिजिटल मीडिया से की और पिछले 6 वर्षों से लगातार इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. आप गौरव सिंह से Gaurav.Singh@India.Com पर ईमेल के जरिए सीधे जुड़ सकते हैं. 
Read More