औंधे मुंह गिरेगा कच्चा तेल, $40 के नीचे आएगा भाव, अमेरिका के दावे में कितना दम, कौन-कैसे तय करता है तेल का रेट? समझिए
Crude Oil: कच्चे तेल की कीमतें 96 डॉलर के पार जा चुकी है, लेकिन अमेरिका ने दावा किया है कि जल्द ही तेल के भाव 40 डॉलर प्रति बैरल से नीचे पहुंच जाएगी. अमेरिका के दावे में कितना दम है? कैसे कच्चे तेल की कीमत तय होती है?
Crude Oil prediction: कच्चे तेल की कीमतों ने खूब तबाही मचाई है. खाड़ी युद्ध और होर्मुज संकट के चलते क्रूड की कीमत 96 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी है. एक वक्त वो भी आया, जब क्रूड ने 120 डॉलर के आंकड़े को छू लिया था. अब अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट दावा कर रहे हैं कि जल्द ही कच्चे तेल की कीमत 40-50 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच सकती है.
40 डॉलर प्रति बैरल पर बिकेगा तेल
स्कॉट बेसेंट का मानना है कि ईरान युद्ध खत्म होने के बाद कच्चे तेल की सप्लाई तेजी से बढ़ेगी. सप्लाई बढ़ने से कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की जाएगी.. उनका मानना है कि तेल की कीमतें 40 डॉलर प्रति बैरल तक नीचे आ सकती हैं. उन्होंने कहा कि तेल की ओवरसप्लाई से तेल के दाम गिरेंगे. उनका दावा है कि युद्ध खत्म होने के बाद होर्मुज का रास्ता खुल जाएगा. होर्मुज खुलते ही तेल की सप्लाई बढ़ेगी, जिससे कीमतों में भारी गिरावट आएगी.
अमेरिका के दावे में कितना दम ?
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव ने दावा किया है कि तेल के दाम 40 डॉलर तक गिर सकते हैं, लेकिन उनके इस दावे में कितना दम है, इसे भी समझना जरूरी है. खाड़ी युद्ध के चलते गल्फ देशों की तेल रिफाइनरियों, तेल उत्पादन पर असर पड़ा है. इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचने से तेल उत्पादन में कमी आई है. युद्ध खत्म होने के बाद इसे दुरुस्त होने में वक्त लगेगा. यानी खाड़ी युद्ध खत्म होने के बाद भी तेल की कीमत एकदम से 40-50 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच जाएगी, इसकी संभावना बेहद कम है.
कैसे तय होता है कच्चे तेल के दाम ?
आप जिस भाव पर पेट्रोल-डीजल खरीदते हैं, उसमें तेल की बेस कीमत का हिस्सा सिर्फ 48 फीसदी का होता है. बाकी 35 फीसदी एक्साइज ड्यूटी, 15 फीसदी सेल्स टैक्स, 2 फीसदी कस्टम ड्यूटी जैसे फैक्टर्स होते हैं. तेल के इस बेस फेयर में भी कच्चे तेल की कीमत के अलावा प्रॉसेसिंग चार्ज और उसकी रिफाइनिंग करने वाली रिफाइनरियों का चार्ज जुड़ा रहता है.
कच्चे तेल के दाम तय करने वाले फैक्टर्स
सप्लाई और डिमांड: तेल की मांग बढ़ती है, तो कीमतों में तेजी आ जाती है. जब मांग घटती है और सप्लाई बढ़ती है, तो तेल के दाम बढ़ते हैं.
ओपेक, ओपेक+ संगठनों का तेल पर कंट्रोल: तेल उत्पादन करने वाले देशों के समूह OPEC (Organization of the Petroleum Exporting Countries) तेल के बाजार को कंट्रोल करता है. ये समूह तय करता है कि कितना तेल निकालना है, कितने तेल की सप्लाई करनी है. यानी तेल की सप्लाई इन ओपेक देशों के हाथों में है. तेल सप्लाई के बेस पर ही कीमत तय होती है.
जियो पॉलिटिकल टेंशन: भू राजनीतिक तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमत में उतार-चढ़ाव होता है. राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध आदि की स्थिति में तेल के दाम बढ़ जाते हैं.
अमेरिकी डॉलर की स्थिति: कच्चे तेल की कीमत पर डॉलर की कमजोरी और मजबूती का असर पड़ता है.
क्या है तेल का स्पॉट प्राइस , फ्यूचर प्राइस से कितना अलग ?
स्पॉट प्राइस वह मौजूदा बाज़ार मूल्य होता है जिस पर किसी वस्तु या कमोडिटी को तुरंत खरीदा या बेचा जा सकता है.जबकि ऑयल फ्यूचर्स एक तरह का फाइनेंशियल कॉट्रैक्स होता है, जिसमें खरीदार और सेलर भविष्य की किसी तारीख के लिए आज ही तेल की कीमत तय कर लेते हैं. इसमें ये पहल से तय होता है कि कितने बैरल तेल खरीदे-बेचे जाएंगे. कीमत भी आज ही तय कर ली जाती है. कॉंट्रैक्ट की आखिरी तारीख तय होती है.
ब्रेंट और WTI में क्या अंतर
तेल उत्पादन करने वाले देश अपना-अपना तेल का रेट तय नहीं करते हैं. हर देश अपने तेल के लिए अलग-अलग ग्लोबल प्राइस नहीं तय कर सकता है. ऐसे में इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेंचमार्क तय किया गया. जिसके आधार पर देश ग्लोबल मार्केट में अपना तेल बेचते हैं.
दुनिया के तीन प्रमुख बेंचमार्क क्रूड में...
ब्रेंट: मुख्य रूप से यूरोप और अटलांटिक बेसिन में तेल कारोबार का प्रमुख बेंचमार्क है.
WTI (West Texas Intermediate): अमेरिका अपना तेल WTI बेंचमार्क पर बेचता है.
Dubai/Oman: खाड़ी और एशियाई बाजारों में दुबई/ओमान प्रमुख बेंचमार्क हैं.