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दिल्ली के भारत मंडपम में आने वाली 12 और 13 सितंबर 2026 को ब्रिक्स (BRICS) का 18वां शिखर सम्मेलन होने जा रहा है. दुनिया की नजरें इस सम्मेलन पर हैं, इस बार BRICS का आर्थिक एजेंडा सीधे ग्लोबल ट्रेड और पेमेंट सिस्टम को प्रभावित कर सकता है. भारत की अध्यक्षता में होने वाले सम्मेलन के दौरान नेशनल करेंसी में व्यापार, सीमा-पार डिजिटल पेमेंट पर अहम चर्चा होने की उम्मीद है. इस बार ऐसा कोई फैसला हो सकता है जो भारतीय व्यापारियों, निर्यातकों और कंपनियों को सीधा फायदा पहुंचाए. इसका सीधा मतलब है कि इस बाद दिल्ली में होने जा रहे BRICS सम्मेलन के दौरान ऐसा फैसला हो सकता है, जिससे सदस्य देश अपनी-अपनी करेंसी में कारोबार कर सकें.
यदि BRICS देश लोकल करेंसी में व्यापार करने, सस्ता क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट करने के लिए कोई स्ट्रक्चर तैयार कर पाते हैं तो इसका असर केवल डॉलर पर निर्भरता कम होने तक ही सीमित नहीं रहेगा. इससे भारतीय निर्यातकों, आयातकों, बैंकों, फिनटेक कंपनियों और छोटे कारोबारियों के लिए भी नए मौके बन सकते हैं. कजान 2024 और रियो 2025 सम्मेलन के दौरान सदस्यों देशों ने बार-बार डॉलर पर निर्भरता कम करने की बात कही थी. अब भारत की अध्यक्षता में होने जा रहे दिल्ली सम्मेलन के दौरान उन वायदों को हकीकत में बदला जा सकता है.
मौजूदा समय में इंटरनेशनल ट्रेड का बड़ा हिस्सा डॉलर में होता है. इसका सीधा मतलब यह है कि जब दो देशों के बीच किसी चीज को लेकर बिजनेस होता है तो पेमेंट और सेटलमेंट के लिए डॉलर की जरूरत पड़ती है. उदाहरण के तौर पर कोई भारतीय कंपनी रूस को सामान की बिक्री करती है. पेमेंट डॉलर में होने पर कंपनी को डॉलर-रुपये के उतार-चढ़ाव का रिस्क उठाना पड़ सकता है. इसमें बैंकिंग और करेंसी कन्वर्जन कॉस्ट भी आती है. यही कारण है कि BRICS स्म्मेलनों में लंबे समय से यह चर्चा चल रही है कि आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाया जाए. 2024 के कजान शिखर सम्मेलन के दौरान BRICS देशों ने लोकल करेंसी में सेटलमेंट को बढ़ावा देने और क्रॉस बॉर्डर पेमेंट सिस्टम को मजबूत करने की बात कही थी.
साल 2024 में कजान और 2025 में रियो में हुए ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन के दौरान नेताओं ने कहा था कि हम डॉलर पर कम निर्भर रहेंगे और धीरे-धीरे अपनी करेंसी में व्यापार बढ़ाएंगे. अब ये बातें 12-13 सितंबर 2026 को दिल्ली में आयोजित होने जा रहे ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान असल रूप ले सकती हैं. पिछले दो सम्मेलन के दौरान 'ब्रिक्स पे' (BRICS Pay) जैसी योजनाओं की चर्चा हुई. रियो में ब्राजील की अध्यक्षता के दौरान ग्लोबल साउथ के देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया. दोनों सम्मेलन के दौरान यही फोकस रहा कि डॉलर का खर्च घटाओ और व्यापार को आसान बनाओ. लेकिन यह सिस्टम अभी तक नहीं बन पाया है. भारत-रूस के बीच रुपये-रूबल में कुछ व्यापार चल रहा है. लेकिन पूरे ब्रिक्स (BRICS) का एक साथ काम करने वाला सिस्टम अभी दूर है. इस बार भारत के सामने चुनौती है कि इन चर्चाओं को एक सिस्टम के तहत बदला जाए. केवल यह कहने से काम नहीं चलेगा कि डॉलर का इस्तेमाल कम करना है. असली सवाल ये हैं-
भारत में इस साल आयोजित होने जा रहे सम्मेलन की थीम 'Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability' है. यह थीम प्रधानमंत्री मोदी के 'Humanity First' दृष्टिकोण पर फोकस्ड है. इस सम्मेलन के दौरान नेशनल करेंसी ट्रेड से जुड़ा बहुत अच्छा मौका है. दिल्ली सम्मेलन के दौरान नया पेमेंट सिस्टम या क्लियरिंग सिस्टम पर सहमति बन सकती है. भारत पिछले कई महीनों से मंत्रियों और अधिकारियों की मीटिंग के दौरान इस मुद्दे को आगे बढ़ा रहा है. यदि कोई ठोस फैसला निकलता है तो भारतीय कंपनियों के लिए यह बड़ी राहत हो सकती है.
BRICS के अंदर लोकल करेंसी में पेमेंट को आसान करने के लिए BRICS Pay जैसे प्रपोल पर पहले से चर्चा होती रही है. इसके पीछे मल्टी करेंसी क्रॉस बॉर्डर (Multi Currency Cross Border) पेमेंट सिस्टम तैयार करना है. इसमें सदस्य देशों के नेशनल पेमेंट सिस्टम आपस में जुड़ सके. हालांकि, अभी BRICS देशों की कोई एक करेंसी नहीं है. न ही दिल्ली सम्मेलन के दौरान कोई नई BRICS करेंसी लॉन्च करने का प्लान है. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अगस्त 2026 में कहा था कि BRICS देश अपने अपने फास्ट पेमेंट सिस्टम और Central Bank Digital Currencies (CBDCs) को जोड़ने की संभावना पर चर्चा कर रहे हैं.
भारतीय निर्यातक BRICS देशों को कई तरह के सामान का निर्यात करते हैं. इनमें इंजीनियरिंग, फार्मास्युटिकल्स, टेक्सटाइल, केमिकल्स और अन्य प्रोडक्ट शामिल हैं. भारतीय निर्यातक लंबे समय से डॉलर के मजबूत होने और रुपये में गिरावट आने से परेशान हैं. इससे निर्यातकों की लागत बढ़ गई है. अपनी करेंसी में यदि व्यापार शुरू होता है तो इसके कई फायदे मिलने की उम्मीद है-
डॉलर कन्वर्जन की जरूरत कम होगी: यदि भारतीय कंपनी रुपये में भुगतान ले और सामने वाला देश अपनी करेंसी में भुगतान करे तो हर लेनदेन को डॉलर के जरिये घुमाने की जरूरत कम हो जाएगी.
करेंसी रिस्क कम होगा: डॉलर की कीमत में तेज उतार-चढ़ाव आने से कारोबारियों के लिये परेशानी बनती है. लोकल करेंसी में सीधे सेटलमेंट होने पर कुछ मामलों में यह रिस्क घटा सकता है. पूरी तरह करेंसी रिस्क खत्म नहीं होगा, क्योंकि रुपये और दूसरी संबंधित करेंसी के बीच विनिमय दर में बदलाव बना रहेगा.
पेमेंट की लागत घट सकती है: यदि पेमेंट का सिस्टम ज्यादा आसान और डिजिटल होता है तो बैंकिंग और इंटरमीडियरी लागत कम होने की संभावना है.
पैसा जल्दी मिल सकता है: फास्ट पेमेंट सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा वर्किंग कैपिटल पर पड़ सकता है. छोटे कारोबारियों के लिए यह अहम है क्योंकि पैसा जल्दी मिलने से वे अगला ऑर्डर और प्रोडक्शन तेजी से शुरू कर सकते हैं.
उदाहरण के लिए रूस या UAE को सामान बेचने वाली कंपनियां सीधे रुपये या उनकी मुद्रा में पैसा ले सकेंगी. इससे कंपनियों का प्रॉफिट बढ़ेगा और छोटे व्यापारी भी बड़े बाजार में आसानी से काम कर पाएंगे. दवा कंपनियों के लिए यह और ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है.
यदि डॉलर के अलावा दूसरी किसी करेंसी या अपनी मुद्रा में व्यापार करने पर सहमति बनी तो इससे बैंक और फिनटेक कंपनियों के लिए काम करने के नए अवसर खुलेंगे. इससे नए पेमेंट गेटवे, क्रॉस-बॉर्डर सॉल्यूशंस और डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने का मौका मिलेगा. इतना ही नहीं देश का UPI मॉडल ब्रिक्स देशों में फैल सकता है. फिनटेक स्टार्टअप्स के लिए रियल-टाइम पेमेंट, मल्टी-करेंसी वॉलेट और ट्रेड फाइनेंस जैसे प्रोडक्ट्स की डिमांड बढ़ेगी. बैंकों और फिनटेक कंपनियों को नए प्रोडक्ट विकसित करने होंगे. जैसे-
यह सब प्लान करना और इसे इम्पलीमेंट करना आसान नहीं है. कुछ देशों की मुद्रा अस्थिर रहती है. अलग-अलग देशों के नियम एक जैसे नहीं हैं, इसलिए सबके साथ तालमेल बैठ पाना थोड़ा मुश्किल तो है. सबसे अहम भारत और चीन के बीच व्यापारिक असंतुलन को लेकर है. यदि व्यापार एकतरफा ही रहा तो फायदा पूरा नहीं मिलेगा. ब्रिक्स में कोई भी फैसला सभी की सहमति के आधार पर होता है.
हाल-फिलहाल तो ऐसा कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. BRICS का मकसद डॉलर को खत्म करना नहीं, बल्कि इंटरनेशनल ट्रेड में ऑप्शन बढ़ाने का प्लान है. आने वाले समय में यह स्थिति हो सकती है कि किसी BRICS देश के साथ भारत का कुछ बिजनेस डॉलर में हो, कुछ रुपये में और कुछ उसी देश की करेंसी में हो. इससे कंपनियों को पेमेंट के ज्यादा ऑप्शन मिल सकते हैं. इसे ब्रिक्स देशों की तरफ से डॉलर से मुकाबले करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
यदि दिल्ली में होने जा रहे सम्मेलन में कुछ ठोस आधार निकलता है तो साल 2026 के बाद ब्रिक्स देशों के साथ व्यापार में अपनी मुद्रा का हिस्सा 10-15 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. यह एक अनुमान जताया जा रहा है लेकिन भारत-रूस और भारत-UAE के अनुभव को देखकर लगता है कि यह करना मुमकिन है. आने वाले समय में भारतीय सामान और सस्ता व कॉम्पटेटिव बनेगा. इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव भी कम होगा. दिल्ली में होने जा रहे सम्मेलन के दौरान यदि BRICS देशों के नेता मिलकर यदि कोई ठोस सिस्टम बनाते हैं तो दिल्ली का यह कारोबारियों के लिए अहम मोड़ साबित होगा.