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25 सितंबर से 10 अक्टूबर तक गयाजी में आयोजित होगा श्राद्ध मेला, आखिर इसी शहर में क्यों होता है पिंडदान? जानें पौराणिक महत्व

क्या आपने कभी ये सोचा है कि आखिर बिहार का गयाजी पिंडदान के लिए इतना महत्व क्यों रखता है? नहीं, तो ये खबर आपके काम की है. आइए जानते हैं कि इसके पीछे की मान्यता क्या है और क्यों गयाजी को पिंडदान के लिए चुना गया है.

Written By Ranjana Kumari
Published: Sep 07, 2026, 10:01 AM IST | Updated: Sep 07, 2026, 10:17 AM IST
Image Credit: गयाजी में ही क्यों किया जाता है पिंडदान? (AI Generated News)
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पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष प्राप्ति के लिए पिंडदान किया जाता है, इसका विशेष महत्व है. वैसे तो देश भर में कई तीर्थ स्थलों पर श्राद्ध कर्म किए जाते हैं, लेकिन बिहार के गयाजी में फल्गु नदी के तट पर स्थित गयाजी को पिंडदान के लिए सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च माना गया है. कई पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में भी इसका जिक्र मिलता है. इसकी कहानी गयासुर से जुड़ी हुई है. 

पौराणिक कथाओं की माने, तो गयासुर ने भगवान विष्णु की घोर तपस्या कर यह वरदान प्राप्त किया था कि जो भी मनुष्य उसके शरीर का दर्शन या स्पर्श करेगा, वह पापों से मुक्त होकर सीधे स्वर्ग जाएगा. इस वरदान के प्रभाव से पापी से पापी व्यक्ति भी बिना किसी सत्कर्म के मोक्ष प्राप्त करने लगे, जिससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया. फिर क्या था, देवताओं और ब्रह्माजी ने इस संतुलन को बनाए रखने के लिए गयासुर से यज्ञ करने के लिए उसकी पवित्र देह मांगी. गयासुर इसके लिए तैयार हो गया और भूमि पर लेट गया.

गयासुर ने भगवान विष्णु से मांगा वरदान
जब यज्ञ के बाद भी गयासुर का शरीर हिलने लगा, तब भगवान विष्णु ने स्वयं अपने दाहिने चरण से उसे स्थिर किया. भगवान के स्पर्श से गयासुर पावन हो गया और उसने प्रभु से वरदान मांगा कि यह स्थान उसके नाम से जाना जाए. साथ ही, जो कोई भी यहां आकर अपने पितरों के निमित्त पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म करेगा, उसके पूर्वजों को नरक के कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी.  भगवान विष्णु ने तथास्तु कहकर उसके मस्तक पर अपने चरण चिह्न छोड़ दिए, जिन्हें आज 'विष्णुपद' के रूप में पूजा जाता है. विष्णुपद मंदिर में स्थित भगवान नारायण के चरण चिह्नों पर अर्पित किया गया पिंड सीधे पितरों तक पहुंचता है.

फल्गु नदी और अक्षयवट वृक्ष का महत्व
इसके अलावा, यहां की फल्गु नदी और अक्षयवट वृक्ष का भी विशेष महत्व है. मान्यता है कि अक्षयवट की छाया में किया गया पिंडदान अक्षय फल देता है, यानी उसका प्रभाव कभी समाप्त नहीं होता. रामायण काल में स्वयं भगवान श्रीराम और माता सीता ने भी इसी पवित्र भूमि पर महाराज दशरथ का पिंडदान किया था. यही कारण है कि पितृपक्ष के दौरान लाखों श्रद्धालु अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने और उनकी आत्मा की चिर शांति के लिए गयाजी की ओर चले आते हैं.

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About the Author

रंजना कुमारी Zee Bihar Jharkhand की डिजिटल टीम में बतौर Sub-Editor अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं. बिहार के सिवान जिले के जीरादेई से ताल्लुक रखने वाली रंजना स्थानीय और जमीनी मुद्दों पर गहरी पकड़ रखती हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में वे मुख्य रूप से राजनीति, क्राइम, यूटिलिटी और देश-दुनिया की अहम रूटीन खबरों को प्रमुखता से कवर करती हैं. Zee Media का हिस्सा बनने से पहले रंजना ने न्यूज इंडिया 24x7 में भी डेढ़ साल तक अपनी सेवाएं दी थीं. एकेडमिक की बात करें तो रंजना GJU से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही हैं.
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