Opinion: बिहार में बेटियां असुरक्षित क्यों? 'सुशासन' के दावों पर भारी पड़ती कानून-व्यवस्था की तस्वीर
जमुई से समस्तीपुर तक महिलाओं और नाबालिगों से बदसलूकी के मामले और वायरल होते वीडियो गंभीर सवाल खड़े करते हैं. गिरफ्तारियां हो रही हैं लेकिन सवाल है कि क्या अपराध से पहले कानून का डर कायम है?
बिहार में इन दिनों सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अपराधी कौन हैं. सवाल यह है कि आखिर अपराधियों के भीतर कानून का डर कहां है?
जमुई, समस्तीपुर, बांका और किशनगंज से सामने आए लड़कियों से बदसलूकी के मामले एक-दूसरे से अलग घटनाएं हो सकती हैं लेकिन इन सबमें एक डरावना पैटर्न दिखाई देता रहा है कि सरेआम बदसलूकी, उसका वीडियो बनाना, सोशल मीडिया पर फैलाना और फिर पुलिस का सक्रिय होना.
बिहार पुलिस ने आठ वायरल वीडियो मामलों में 18 आरोपियों की गिरफ्तारी, पांच नाबालिगों को निरुद्ध करने और 521 आपत्तिजनक वीडियो हटाने की जानकारी दी है लेकिन असली सवाल गिरफ्तारी की संख्या नहीं अपराध से पहले मौजूद कानून के डर की अनुपस्थिति है.
किसी सरकार की कानून-व्यवस्था की असली परीक्षा अपराध होने के बाद नहीं अपराध होने से पहले होती है.
अगर दिनदहाड़े किसी लड़की के साथ बदसलूकी होती है और आसपास मौजूद लोग तमाशबीन बने रहते हैं, अगर आरोपी बेखौफ होकर वीडियो बनाते हैं और फिर उसे सोशल मीडिया पर डालते हैं तो यह सिर्फ अपराधियों की मानसिकता का सवाल नहीं है.
यह उस पूरे सिस्टम की परीक्षा है जिसे नागरिकों को सुरक्षा देनी है. पुलिस बाद में पहुंचकर गिरफ्तारी कर ले, यह जरूरी है लेकिन उससे पहले पुलिस की मौजूदगी और अपराधी के मन में कानून का भय होना उससे भी ज्यादा जरूरी है.
‘सुशासन’ का मतलब क्या?
बिहार सरकार के सामने इसलिए सवाल सीधा है कि क्या ‘सुशासन’ का मतलब केवल अपराध के बाद तेज कार्रवाई है या अपराध रोकने की क्षमता भी है?
हाल की घटनाओं के बाद पुलिस ने कार्रवाई की, जांच और स्पीडी ट्रायल की बात कही और सोशल मीडिया से सैकड़ों वीडियो हटवाए. यह कार्रवाई होनी भी चाहिए लेकिन 521 वीडियो का आंकड़ा एक उपलब्धि के साथ-साथ एक चेतावनी भी है.
आखिर इतनी बड़ी संख्या में आपत्तिजनक सामग्री बनी, साझा हुई और लोगों तक पहुंची ही क्यों?
और यहीं से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की जवाबदेही का सवाल उठता है. अप्रैल 2026 में मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद चौधरी ने गृह विभाग भी अपने पास रखा है.
यानी बिहार की कानून-व्यवस्था से जुड़े सवालों की राजनीतिक जवाबदेही सीधे मुख्यमंत्री के कार्यालय तक जाती है.
ऐसे में सरकार को यह बताना होगा कि सड़क पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए गिरफ्तारी के अलावा रोकथाम की कौन-सी ठोस व्यवस्था जमीन पर दिखाई दे रही है.
यहां एक और असहज सवाल है कि क्या बिहार में पुलिस अब सोशल मीडिया के जरिए अपराध की जानकारी मिलने के बाद ही सक्रिय होती है?
समस्तीपुर के एक मामले में पुलिस ने वीडियो सामने आने के बाद तकनीकी जांच के जरिए आरोपियों की पहचान की और करीब छह घंटे के भीतर चार आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.
यह पुलिस की त्वरित कार्रवाई का उदाहरण है लेकिन यही सवाल भी पैदा करता है कि अगर वीडियो सामने नहीं आता तो क्या घटना उतनी ही तेजी से पुलिस के रडार पर आती?
आधुनिक पुलिसिंग का लक्ष्य वायरल वीडियो का इंतजार करना नहीं बल्कि अपराध को पहले ही रोकना होना चाहिए.
महिलाओं के खिलाफ अपराध
महिलाओं के खिलाफ अपराध का मुद्दा बिहार में अचानक पैदा नहीं हुआ है. एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या 2020 में 15,259 से बढ़कर 2024 में 27,359 हो गई. यानी 2020 से 2024 के बीच दर्ज मामलों में करीब 78 प्रतिशत की वृद्धि हुई.
आंकड़ों को उनके संदर्भ में पढ़ना जरूरी है कि एफआईआर में बढ़ोतरी कभी-कभी बेहतर रिपोर्टिंग और शिकायत दर्ज कराने की क्षमता का संकेत भी हो सकती है लेकिन इन आंकड़ों के साथ हाल की सरेआम घटनाओं को रखकर देखें तो महिला सुरक्षा पर सरकार से अधिक जवाबदेही मांगना स्वाभाविक है.
बिहार की बेटियों की सुरक्षा को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनाकर छोड़ देना सबसे आसान रास्ता है. सरकार कह सकती है कि आरोपियों को गिरफ्तार किया जा रहा है. विपक्ष कानून-व्यवस्था पर सवाल उठा सकता है.
दोनों बातें खबर बन सकती हैं लेकिन जनता को इससे आगे का जवाब चाहिए कि कितने मामलों में समय पर चार्जशीट हुई? कितने मामलों में दोषसिद्धि हुई?
महिला हेल्पलाइन और साइबर सेल कितने प्रभावी हैं? और जहां पुलिस की लापरवाही सामने आती है वहां क्या जवाबदेही तय होती है?
इसी तरह महिलाओं की सुरक्षा सिर्फ पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है. परिवार, स्कूल, कॉलेज, स्थानीय प्रशासन, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और समाज सभी की भूमिका है. लेकिन इन सभी को जोड़कर प्रभावी व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी आखिरकार सरकार की ही है.
‘सुशासन’ की परीक्षा
‘सुशासन’ किसी सरकार का दिया हुआ प्रमाणपत्र नहीं, जनता के अनुभव से मिलने वाली मान्यता है. बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार के सामने सबसे कठिन सवाल यही है कि क्या राज्य की बेटियां बिना डर के सड़क पर चल सकती हैं?
क्या परिवार बिना चिंता के अपनी बेटियों को स्कूल, कॉलेज और काम पर भेज सकते हैं? और क्या अपराधी कानून को चुनौती देने से पहले दस बार सोचता है? इन सवालों का जवाब भाषणों, ट्वीट्स या गिरफ्तारियों की सूची से नहीं मिलेगा.
जवाब तब मिलेगा जब बिहार की किसी बेटी को घर से निकलते वक्त यह सोचना न पड़े कि सड़क पर उसे कानून बचाएगा या उसका अपना डर.
बिहार की राजनीति में सरकारें बदलती हैं, नारे बदलते हैं, चेहरे बदलते हैं लेकिन बेटियों की सुरक्षा पर सरकार की जवाबदेही नहीं बदल सकती.
आज बिहार को आश्वासन से ज्यादा भरोसा चाहिए और भरोसा तभी बनेगा जब कानून का डर अपराधी के भीतर और सुरक्षा का भरोसा आम नागरिक के भीतर दिखाई दे.