भागलपुर: 24 अक्टूबर 1989 बिहार के भागलपुर के इतिहास में सिर्फ एक दंगे की शुरुआत नहीं थी, बल्कि हजारों परिवारों की जिंदगी में ऐसा अंधेरा लेकर आई, जिसकी छाया दशकों बाद भी पूरी तरह नहीं मिट सकी. गलियों में फैला डर, गांवों में पसरा सन्नाटा, अपनों को खोने का दर्द और घर छोड़ने की मजबूरी, भागलपुर ने वह सब देखा, जिसे कोई भी समाज अपनी स्मृतियों में जगह नहीं देना चाहेगा. यही नहीं, भागलपुर दंगों ने बिहार की राजनीति को बदलकर रख दिया था. मुख्य धारा की पार्टी कांग्रेस हाशिये पर चली गई और आज छोटे दलों की छोटी सहयोगी के रूप में अपनी किस्मत पर आंसू बहा रही है. इस दंगे के बाद से कांग्रेस की बिहार की सत्ता पर पकड़ कमजोर होती गई और आज वह हाशिये पर पहुंच चुकी है. दूसरी ओर, लालू प्रसाद यादव ने इस दंगे के बाद खुद को उभारा और 1990 में उनके नेतृत्व में जनता दल की अपनी सरकार बनी थी.
अक्टूबर का महीना था. देश में राम मंदिर आंदोलन की गूंज तेज हो रही थी. रामशिला यात्राएं निकल रही थीं और अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए ईंटें जुटाई जा रही थीं. बिहार का भागलपुर भी इसी तनावपूर्ण माहौल से गुजर रहा था. धार्मिक जुलूस निकल रहे थे, राजनीतिक बयानबाजी तेज थी और समुदायों के बीच अविश्वास की खाई गहरी होती जा रही थी. इसी माहौल में 24 अक्टूबर को भागलपुर के तातारपुर इलाके में एक पूजा के जुलूस के दौरान तनाव की खबर सामने आई. इसके बाद बम विस्फोट और लोगों के घायल होने की सूचनाएं फैलीं. जल्द ही अफवाहों ने घटनाओं को और भयानक रूप दे दिया.

कहीं हमले की खबर उड़ी, तो कहीं छात्रों की हत्या की बात कही गई. इन खबरों ने लोगों के भीतर भय और गुस्सा भर दिया. देखते ही देखते हालात बेकाबू होने लगे. अगले दिन से हिंसा ने व्यापक रूप ले लिया. जो शहर कभी अपने सामाजिक और सांस्कृतिक मेल-जोल के लिए जाना जाता था, वहां डर ने लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर कब्जा कर लिया. भागलपुर शहर से लेकर आसपास के गांवों तक हिंसा की खबरें पहुंचने लगीं. कई इलाकों में घरों को निशाना बनाया गया, परिवार उजड़ गए और लोगों को जान बचाने के लिए अपने घर छोड़ने पड़े.
भागलपुर दंगों की सबसे दर्दनाक तस्वीरें ग्रामीण इलाकों से सामने आईं. कई स्थानों पर सामूहिक हत्याओं की घटनाएं हुईं. लोगाइन हत्याकांड इस हिंसा की सबसे चर्चित और भयावह घटनाओं में शामिल रहा. इस मामले में हत्या के बाद शवों को छिपाने और घटना के सबूत मिटाने के गंभीर आरोप सामने आए. बाद की न्यायिक प्रक्रिया में इस मामले ने पूरे देश का ध्यान खींचा. दंगों में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों समेत बड़ी संख्या में लोगों की जान गई. कई परिवारों ने अपने प्रियजनों को खो दिया. जिनकी जान बच गई, उनके सामने जीवन दोबारा शुरू करने की चुनौती थी. घर छूटे, कारोबार बर्बाद हुए और पीढ़ियों से बसे परिवार विस्थापन का दर्द झेलने को मजबूर हुए.

आधिकारिक आंकड़ों में मृतकों की संख्या करीब एक हजार बताई जाती है, जबकि हजारों परिवार हिंसा से प्रभावित हुए और बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित होना पड़ा था. राहत शिविरों में शरण लेने वाले लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल था कि क्या वे कभी अपने घर लौट पाएंगे और क्या उनकी जिंदगी फिर सामान्य हो सकेगी? भागलपुर की त्रासदी केवल जान-माल के नुकसान तक सीमित नहीं रही. इसने सामाजिक रिश्तों को भी गहरे जख्म दिए. पड़ोसियों के बीच भरोसा टूटा और कई इलाकों में लंबे समय तक भय और अविश्वास बना रहा. जब हिंसा फैल रही थी, तब पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे.
तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक केएस द्विवेदी पर आरोप लगा कि उनकी भूमिका निष्पक्ष और प्रभावी नहीं रही तथा हिंसा को नियंत्रित करने में प्रशासन नाकाम रहा. इन आरोपों को लेकर वर्षों तक राजनीतिक और सामाजिक बहस होती रही. उस समय बिहार और केंद्र दोनों जगहों पर कांग्रेस की सरकारें थीं. हिंसा के दौरान कानून-व्यवस्था संभालने और प्रभावित लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में प्रशासन की विफलता को लेकर राज्य सरकार की भी आलोचना हुई थी. राजीव गांधी के भागलपुर दौरे और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हुई कार्रवाई के बावजूद हिंसा से हुए नुकसान की भरपाई संभव नहीं थी. सवाल यह था कि जब हालात बिगड़ रहे थे, तब समय रहते पर्याप्त कदम क्यों नहीं उठाए गए? पीड़ितों को सुरक्षा देने, हिंसा रोकने और दोषियों को कानून के कटघरे में लाने में इतनी मुश्किलें क्यों आईं?

इन सवालों के जवाब तलाशने की प्रक्रिया वर्षों तक चलती रही. दंगों के बाद राहत और पुनर्वास के प्रयास हुए, लेकिन प्रभावित परिवारों की शिकायतें और न्याय की मांग लंबे समय तक कायम रहीं. 1990 में बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ और लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने. दंगों के बाद मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस से दूर होकर जनता दल की ओर गया. लालू यादव ने धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बनाया. हालांकि, दंगों से जुड़े मामलों की जांच और न्यायिक कार्रवाई को लेकर उनके शासनकाल पर भी सवाल उठते रहे. विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि कुछ आरोपियों को राजनीतिक संरक्षण मिला और कई मामलों में न्याय की प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ी.
कामेश्वर यादव का नाम भी इस राजनीतिक विवाद में सामने आया था. उन पर दंगों से जुड़े मामलों में आरोप लगे थे. 2004 में सोनपुर मेले में उन्हें प्रशस्ति पत्र दिए जाने की घटना को लेकर राजनीतिक विवाद भी हुआ था. बाद में लोगाइन हत्याकांड में उन्हें दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. भागलपुर के पीड़ितों की शिकायत यही रही कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद सभी मामलों में न्याय की प्रक्रिया समान गति से आगे नहीं बढ़ी. जिन परिवारों ने अपने लोगों को खोया था, उनके लिए राजनीतिक बयानबाजी से अधिक महत्वपूर्ण था दोषियों को सजा मिलना और अपने जीवन को दोबारा खड़ा करने के लिए पर्याप्त सहायता मिलना. नवंबर 2005 में बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार आई. इसके बाद भागलपुर दंगों से जुड़े पुराने मामलों की समीक्षा, जांच और पीड़ितों को राहत देने के प्रयासों को नए सिरे से गति देने की बात सामने आई.

फरवरी 2006 में राज्य सरकार ने न्यायमूर्ति एनएन सिंह की अध्यक्षता में जांच आयोग का गठन किया था. आयोग को दंगों के दौरान हुई घटनाओं, प्रशासन की भूमिका और पीड़ितों को राहत देने से जुड़े पहलुओं की जांच करनी थी. आयोग की अंतरिम रिपोर्ट 2007 में आई, जबकि अंतिम रिपोर्ट 2015 में बिहार विधानसभा में पेश की गई. नीतीश सरकार के कार्यकाल में दंगों से जुड़े पुराने मामलों की दोबारा जांच और कानूनी कार्रवाई पर जोर दिया गया. लोगाइन हत्याकांड में हुई कार्रवाई को इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना गया. इस मामले में 2007 में 14 लोगों को दोषी ठहराया गया था. कामेश्वर यादव को भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. इन कार्रवाइयों से पीड़ित परिवारों के बीच यह उम्मीद जगी कि वर्षों से लंबित मामलों में भी न्याय संभव है.
हालांकि, किसी मामले में दोषसिद्धि और पूरे दंगा पीड़ित समुदाय को न्याय मिलना दो अलग-अलग बातें हैं. सभी मामलों की स्थिति, आरोपियों की जिम्मेदारी और न्यायिक परिणामों का आकलन अलग-अलग करना जरूरी है. दंगों के बाद पीड़ितों के पुनर्वास और आर्थिक सहायता का सवाल लगातार महत्वपूर्ण बना रहा. कई परिवारों को मुआवजा दिया गया, पेंशन से जुड़ी सहायता बढ़ाई गई और विस्थापित लोगों की समस्याओं को दूर करने के प्रयास किए गए. सरकारी स्तर पर पुराने मामलों को आगे बढ़ाने और पीड़ित परिवारों तक राहत पहुंचाने की पहल भी हुई. फिर भी, राहत की रकम और न्याय की अनुभूति के बीच बड़ा अंतर था. जिन लोगों ने अपने परिवार के सदस्यों को खोया, उनके लिए मुआवजा उस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता था. जिनकी जमीन या घर छूट गए, उनके लिए आर्थिक सहायता के साथ सुरक्षित पुनर्वास और संपत्ति पर अधिकार भी जरूरी था. कई प्रभावित परिवारों की शिकायत रही कि उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हुआ. कहीं पुनर्वास अधूरा रहा, तो कहीं पुराने मामलों में न्यायिक प्रक्रिया लंबी चली.
आयोग की सिफारिशों पर अमल, प्रशासनिक जवाबदेही और सभी पात्र परिवारों तक सहायता पहुंचाने जैसे सवाल भी चर्चा में बने रहे. यही वजह है कि भागलपुर दंगों का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने लोगों को मुआवजा मिला या कितने मामलों में सजा हुई? असली कसौटी यह है कि पीड़ित परिवारों को सुरक्षा, सम्मान, न्याय और सामान्य जीवन जीने का अवसर कितना मिला? भागलपुर दंगों को 37 साल बीत चुके हैं. इस दौरान बिहार में कई राजनीतिक बदलाव हुए. कांग्रेस के बाद जनता दल और फिर राष्ट्रीय जनता दल तथा जनता दल यूनाइटेड के नेतृत्व वाली सरकारों ने राज्य की राजनीति को अलग-अलग दिशाओं में प्रभावित किया. एनडीए और महागठबंधन की राजनीति के बीच भागलपुर की त्रासदी बार-बार चर्चा में आती रही?
किसी के लिए यह घटना कांग्रेस शासनकाल में प्रशासनिक विफलता का उदाहरण है. किसी के लिए यह लालू प्रसाद यादव के शासन में न्याय की गति पर सवाल उठाने का आधार है. वहीं, नीतीश कुमार के समर्थक पुराने मामलों को दोबारा आगे बढ़ाने और पीड़ितों को राहत देने की कोशिशों को अपनी सरकार की उपलब्धि बताते हैं, लेकिन राजनीतिक दावों से परे एक बड़ा सवाल अब भी कायम है की क्या इतने लंबे समय बाद सभी पीड़ित परिवारों को न्याय मिल पाया? क्या हर विस्थापित परिवार सुरक्षित जीवन जी पा रहा है? क्या प्रशासनिक जवाबदेही तय करने और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त सबक लिए गए? इन सवालों के जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड, आयोग की सिफारिशों, न्यायालयों के फैसलों और पीड़ित परिवारों की वास्तविक स्थिति के आधार पर तलाशे जाने चाहिए.
भागलपुर दंगों की कहानी केवल अतीत का एक अध्याय नहीं है. यह याद दिलाती है कि सांप्रदायिक तनाव के माहौल में अफवाहें कितनी तेजी से हिंसा को जन्म दे सकती हैं. जब बिना पुष्टि की खबरें सच मान ली जाती हैं, जब राजनीतिक बयानबाजी सामाजिक विभाजन को गहरा करती है और जब प्रशासन समय पर निष्पक्ष कार्रवाई करने में विफल रहता है, तब इसकी कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है. इस त्रासदी में सबसे ज्यादा नुकसान उन लोगों का हुआ, जिनका हिंसा की राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था. वे परिवार, जो अपने बच्चों की पढ़ाई, रोजी-रोटी और शांतिपूर्ण जीवन में व्यस्त थे, अचानक मौत, विस्थापन और असुरक्षा के बीच फंस गए.
आज जरूरत इस बात की है कि भागलपुर दंगों की चर्चा केवल चुनावी भाषणों या राजनीतिक आरोपों तक सीमित न रहे. पीड़ितों की समस्याओं का दस्तावेजीकरण हो, लंबित मामलों की स्थिति सार्वजनिक हो, राहत और पुनर्वास की समीक्षा की जाए और प्रशासनिक जवाबदेही को गंभीरता से लिया जाए, क्योंकि इतिहास को याद करने का असली उद्देश्य केवल अतीत के दोषियों की पहचान करना नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसी त्रासदी को रोकना भी है.
भागलपुर से अश्वनी कुमार की रिपोर्ट