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17 सितंबर को देश में विश्वकर्मा पूजा मनाई जाएगी. देवताओं के शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा का जन्म दिवस होने के कारण इस दिन मुख्य रूप से कामगार और व्यवसायी अपने औजारों और उपकरणों की पूजा करते हैं. इंजीनियर, वास्तुकार, कारीगर, शिल्पकार, फैक्ट्री कर्मचारी और औजारों, मशीनों व तकनीकी कार्यों से जुड़े लोग इस दिन को काफी धूमधाम से मनाते हैं. भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से पहले कारखानों, कार्यालयों और अन्य कार्यस्थलों पर मशीनरी की सफाई और सजावट की जाती है. कभी बिहार के डालमियानगर से मोकामा तक विश्वकर्मा पूजा की धूम हुआ करती थी और हजारों मजदूर एक साथ अपने औजारों की पूजा किया करते थे, लेकिन 90 के दशक में सारे उद्योग-धंधे बंद होने से आज यहां सन्नाटा पसरा रहता है.
कभी औद्योगिक हब हुआ करता था बिहार
80 के दशक में बिहार के अंदर चीनी, जूट और कागज मिलों समेत भारी इंजीनियरिंग से जुड़े कई उद्योग संचालित हुआ करते थे. उस वक्त देश में जितनी चीनी का उत्पादन होता था, उसमें करीब 30% हिस्सा बिहार से था. उद्योग जगत में बेगूसराय का बड़ा नाम था. यहां पावर प्लांट के अलावा बरौनी रिफाइनरी, बरौनी खाद कारखाना, बरौनी डेयरी संचालित हुआ करती थी. इसके अलावा सिंदरी में खाद कारखाना, हटिया (रांची) में एचईसी, बोकारो में स्टील प्लांट, पतरातू में पावर प्लांट और चीनी मिलें हुआ करती थीं. सीमेंट के भी कई कारखानें गुलजार थे. इनकी मदद से कई छोटी औद्योगिक इकाइयां भी चला करती थीं, जिनसे हजारों लोगों को रोजगार मिलता था.
लालू यादव के शासनकाल में बर्बाद हुए उद्योग!
90 के दशक में समाजवाद को मजबूत करने के चक्कर में लालू प्रसाद यादव उद्योग-धंधे को एकदम भूल गए. राजनीतिक अस्थिरता, प्रशासनिक अक्षमता, कमजोर बुनियादी ढांचा, भ्रष्टाचार और बढ़ती जनसंख्या के कारण प्रति व्यक्ति संसाधन कम हुए. भ्रष्टाचार और अपराध की स्थिति गंभीर होती चली गई, जिसका सीधा असर उद्योग-धंधों पर पड़ा. 80 के दशक तक जो क्षेत्र औद्योगिक सेंटर के नाम से जाने जाते थे, समय के साथ-साथ उनकी पहचान ही समाप्त हो गई. पटना जिले का औद्योगिक हब रहे मोकामा की पहचान क्राइम कैपिटल के रूप होने लगी. यह इलाका रेल वैगन निर्माण और चमड़ा उद्योग के लिए प्रसिद्ध था. 90 के दशक के शुरुआती सालों में मढ़ौरा में चार फैक्ट्रियां (मॉर्टन फैक्ट्री, सारण इंजीनियरिंग वर्क्स, चीनी मिल और उससे जुड़ी डिस्टिलरी) थीं, जो 1997 आते-आते बंद हो गईं.
अब 17 सितंबर को पसरा रहता है सन्नाटा
इसी तरह से रोहतास जिले के डालमियानगर में भी कभी दिन की शुरुआत फैक्ट्रियों में बजने वाले हूटर के साथ हुआ करती थी. यहां सीमेंट, कागज, चीनी, वनस्पति घी, केमिकल और एस्बेस्टस की फैक्ट्रियां संचालित हुआ करती थीं और लगभग 10,000 से अधिक मजदूर एक साथ काम करते थे. विश्वकर्मा पूजा के दिन पूरी कॉलोनी को दुल्हन की तरह सजाया जाता था. साल 1984 में कानून-व्यवस्था, बिजली संकट और वित्तीय घाटे के कारण यह पूरा हब बंद हो गया और आज यहां की विशाल मशीनें कबाड़ बन चुकी हैं. 17 सितंबर के दिन स्थानीय मजदूर काफी भावुक हो जाते हैं. वे अब भी बंद पड़ी फैक्ट्रियों के गेट पर जाकर प्रतीकात्मक रूप से अपने औजारों की पूजा करते हैं. उन्हें उम्मीद है कि शायद इन खंडहरों में फिर से जिंदगी और रोजगार की गूंज सुनाई देगी.