मायावती और चंद्रशेखर के अखाड़े में दम दिखा पाएंगे चिराग?: 403 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान रणनीति या दबाव की राजनीति
लोजपा के टूटने से मिले झटके से चिराग पासवान उबर चुके हैं. उन्होंने अपनी पार्टी को वहां फिर से स्थापित कर दिया है, जहां उनके पिता रामविलास पासवान छोड़कर गए थे. अब चिराग पासवान की छटपटाहट यहां से अपनी पार्टी को आगे की ओर ले जाना है और इसके लिए वे अपने तरीके से रणनीतिक फैसले ले रहे हैं.
केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान का कहना है कि उनका दल उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है. उनके इस दावे ने उत्तर प्रदेश की सियासी फिजा में रोमांच ला दिया है. उनका कहना है कि एनडीए में गठबंधन के तहत पर्याप्त सीटें नहीं मिलीं तो पार्टी सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने से पीछे नहीं हटेगी. चिराग पासवान के इस बयान को उत्तर प्रदेश के 21 प्रतिशत दलित वोटरों को साधने और वहां अपनी दखल बढ़ाने के नजरिए से देखा जा रहा है. यूपी का दलित वोटर आज बसपा, भीम आर्मी, भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच बंटा दिख रहा है और चिराग पासवान इसमें अपने लिए अवसर खोज रहे हैं. हालांकि, इतिहास गवाह है कि लोजपा जब भी अपने दम पर चुनावी मैदान में गई है, उसे मुंह की खानी पड़ी है.
बिहार में अपने दम पर 3 चुनाव लड़ चुकी है चिराग की पार्टी
लोजपा रामविलास (पूर्व में लोजपा) जब भी चुनावी मैदान में अकेले गई है, उसने दूसरों का खेल खराब तो कर दिया, लेकिन खुद कभी सफल नहीं हो पाई. बिहार विधानसभा में लोजपा सर्वाधिक 29 सीटें फरवरी, 2005 में हुए चुनावों में जीत पाई थी. तब उसने 178 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे और 12.6 प्रतिशत वोट शेयर हाथ लगा था. इससे राष्ट्रीय जनता दल का खेल खराब हो गया और त्रिशंकु विधानसभा अस्तित्व में आई. तब रामविलास पासवान किंगमेकर की भूमिका में थे. उस समय एनडीए और यूपीए दोनों को रामविलास पासवान की जरूरत थी, लेकिन उन्होंने मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने की शर्त रख दी और इस पर कोई भी धड़ा राजी नहीं हुआ. नतीजा यह हुआ कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया.
राष्ट्रपति शासन खत्म होने के बाद अक्टूबर 2005 में फिर से विधानसभा चुनाव कराए गए, जिसमें पार्टी ने 203 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे और किसी भी दल से गठबंधन नहीं किया था. तब केवल 10 सीटों पर लोजपा प्रत्याशियों ने जीत हासिल की थी. यही नहीं, वोट शेयर भी 12.6 प्रतिशत से गिरकर 11 प्रतिशत पर आ गया था. इस चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ था और अकेले चुनाव लड़ने का दम भरने वाली लोजपा तब 10 सीटों पर सिमट गई थी.
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी लोजपा अकेले चुनाव मैदान में उतरी थी. तब चिराग पासवान की ओर से लगातार नीतीश कुमार को निशाना बनाया जा रहा था. पार्टी ने उस चुनाव में 135 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन केवल एक प्रत्याशी ही जीत पाया था. उस चुनाव में चिराग पासवान खुद को पीएम मोदी का हनुमान घोषित करते रहे थे. भाजपा प्रत्याशियों के खिलाफ चिराग पासवान ने कम उम्मीदवार उतारे तो जेडीयू के सभी प्रत्याशियों के खिलाफ अपने उम्मीदवार खड़े किए थे. हालांकि, इससे जेडीयू की सीटें 43 पर सिमट गई थी. लोजपा के एकमात्र विधायक राजकुमार सिंह भी बाद में जेडीयू में शामिल हो गए थे. उसके कुछ दिनों बाद ही पार्टी दो टुकड़ों में बंट गई थी.
यूपी की दलित राजनीति चिराग पासवान को क्यों आकर्षित कर रही?
दरअसल, चिराग पासवान अपनी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर दलितों की सबसे बड़ी पार्टी बनाना चाहते हैं और खुद को सबसे बड़े दलित चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट करने की मंशा रखते हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में 5 सीटों पर प्रत्याशी उतारकर सभी 5 सीटें जीतने वाले चिराग पासवान का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ गया है. खुद को राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़े दलित नेता के रूप में उभारने के लिए उत्तर प्रदेश से बेहतर जमीन कोई और नहीं हो सकती. इसलिए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर वे महत्वाकांक्षी दिख रहे हैं.
चिराग पासवान की मंशा मायावती के गिरते ग्राफ के बीच खुद को स्थापित करने की भी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में मायावती की पार्टी 9 से 10 प्रतिशत वोटों के इर्द गिर्द सिमटी रही और एक भी सीट उसके खाते में नहीं आई. इसके अलावा चिराग पासवान की नजर गैर जाटव वोटरों जैसे पासी, वाल्मीकि, कोरी और खटीक पर है, जिनकी संख्या 45 प्रतिशत बताई जाती है. पासी और पासवान बिरादरी का पूर्वांचल और अवध में विशेष प्रभाव है तो पश्चिमी यूपी में जाटवों का बोलबाला है.
मायावती और चंद्रशेखर के रहते उत्तर प्रदेश में चिराग पासवान के लिए राह आसान नहीं है. ये दोनों नेता अपने वोटरों को लेकर बहुत आक्रामक हैं और इसमें किसी तीसरे के लिए जगह बना पाना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है. मायावती का ग्राफ अब भले ही गिरा है, लेकिन जमीन पर बसपा का कैडर अब भी मौजूद है. मायावती को सिरे से खारिज करना किसी के लिए भी आत्मघाती हो सकता है.
दूसरी ओर, भीम आर्मी के चंद्रशेखर ने भी लोकसभा चुनाव, 2024 में नगीना सीट से शानदार जीत हासिल कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलित युवाओं में खासी लोकप्रियता हासिल की है. वे दलित युवाओं के मुखर, आक्रामक और सड़क पर उतरने वाले नेता बन चुके हैं. वे अब बसपा के वोटबैंक में सेंधमारी करने की फिराक में हैं.
इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी गैर जाटव दांव से और समाजवादी पार्टी पीडीए का दांव खेलकर दलितों को अपनी ओर लुभाने की जुगत कर रही है. लोकसभा चुनाव, 2024 में तो समाजवादी पार्टी का यह प्रयोग सफल भी हुआ था. भाजपा अपने लोक कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से दलितों के एक तबके में लोकप्रिय बनी हुई है.
कही यह चिराग की प्रेशर पॉलिटिक्स तो नहीं
यह भी संभव है कि चिराग पासवान ने सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने वाला बयान एनडीए के भीतर गठबंधन के तहत चुनाव में उतरने और अधिक से अधिक सीटें हथियाने की नीयत से दिया हो. राजनीति में इस तरह की रणनीति आम तौर पर सभी दल आजमाते हैं. चिराग पासवान अच्छी तरह जानते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में पैठ बनाना आसान काम नहीं है, इसलिए वे एनडीए के बैनर तले चुनावी मैदान में उतरने की रणनति पर काम कर सकते हैं, ताकि इसी बहाने राज्य में कुछ प्रत्याशी जीत जाएं. हो सकता है कि वे भाजपा को यह भी जताना चाह रहे हों कि अगर यूपी में 10 से 15 सीटें उन्हें नहीं दी गईं तो वे वोटकटवा बनकर उसका खेल बिगाड़ सकते हैं.
क्या कहते हैं जानकार?
लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार मुरली मनोहर श्रीवास्तव का कहना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति पर देश की राजनीति टिकी हुई होती है. यहां की सियासत में कई एंगल देखने को मिल रहा है. यूपी चुनाव में दलित कार्ड एकमुश्त होता तो इसका असर पड़ता, लेकिन यह तीन भागों में बंटने से वोट का बिखराव होगा, जिसका फायदा भाजपा को सीधे तौर पर मिल सकता है. प्रदश में एनडीए और इंडिया ब्लॉक की आमने सामने की लड़ाई हो सकती है, क्योंकि दूसरी तरफ दलित वोटों का बिखराव का असर देखने को मिलेगा. एनडीए में जदयू के अलग से 60 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान का कितना असर होगा, यह देखना पड़ेगा. जैसे जैसे चुनाव करीब आएगा, एनडीए और इंडिया ब्लॉक अपनी बिसात बिछाने की कोशिश करेंगी.